पहली किताब की महक क्या होती है, महसूस कर चुका हूं: अविनाश मिश्र

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पहली किताब की महक क्या होती है, महसूस कर चुका हूं. उसे हाथ में लेना और परिचितों को ‘सप्रेम’ लिखकर देना क्या होता है, जान चुका हूं.

इस दरमियान कई दोस्तों ने टैग, मेंशन, इनबॉक्स और फोन करके यह जानना चाहा कि उन तक यह पहली किताब कैसे पहुंच सकती है. आभार की हकदार इस जिज्ञासा का जवाब देने में, सच कहूं तो एक हद के आगे बेबस हूं. यह किताब साहित्य अकादेमी ने प्रकाशित की है और दिल्ली ही नहीं कई शहरों के दोस्त इसे थोड़े प्रयत्न के बाद पा सकते हैं, लेकिन किताब ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है. इसके लिए साहित्य अकादेमी को लिखना पड़ सकता है.

बहरहाल, अब जो कह रहा हूं, वह परस्पर-विरोधी लग सकता है, लेकिन है नहीं. एक गुजारिश है कि इसे अन्यथा न लिया जाए.

हिंदी में प्रतिवर्ष एक से बढ़कर एक प्रकाशनों से सैकड़ों किताबें छपती हैं, उनमें से अगर एक भी काल से होड़ ले पाए, तब भी इसे हमारी भाषा का सौभाग्य क्यों न माना जाए? लेकिन यह भी मुमकिन नहीं हो पाता. यह पहली किताब भी कुछ इस प्रकार की ही है. हिंदी प्रकाशकों की नजर में सबसे उपेक्षित विधा यानी कविता की यह किताब है और हिंदी कविता की विभ्राट और गौरवशाली परंपरा में यह कहीं नहीं है.

…और फिर आप दोस्तों ने तो लगभग इसमें शामिल सारी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स वगैरह पर पढ़ ही रखी हैं, नया इसमें कुछ नहीं है, सिवाय इनके एक जिल्द में होने के. वैसे भी मेरी कविताएं बहुत खराब हैं, उनके लिए लिखी गई भूमिका भी खराब है और मैं भी बहुत खराब हूं.

दरअसल, इस पहली किताब के प्रकाशित होने में मेरी योग्यता कम है, संयोग ज्यादा… और यह सब लिखते हुए अगर यह भूल जाऊं कि शुभा और गिरिराज किराडू की अब तक पहली किताब नहीं आई है, तब मैं और खराब नजर आऊंगा.

यह सब लिखते हुए यह भी नहीं भूल सकता कि 25 बरस से ज्यादा हो गए देवी प्रसाद मिश्र और संजय चतुर्वेदी जैसे कवि अपनी पहली किताब पर ही रुके हुए हैं, जबकि यह सच्चाई अब हिंदी साहित्य संसार में भला किससे छुपी है कि इन 25 सालों में वे अपनी कविताओं से हिंदी कविता को वहां ले गए हैं, जहां वह पहले कभी नहीं गई थी.

यह सब लिखते हुए यह भी नहीं भूल सकता कि मेरे साथियों में मुझसे कई गुना बेहतर कवि महेश वर्मा, मोनिका कुमार, उस्मान खान, सुधांशु फ़िरदौस और शुभम श्री की अब तक पहली किताब नहीं आई है.

यह सब कहने का औचित्य बस इतना ही है कि मेरी किताब अगर आपके हाथ में नहीं है, तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि बहुत सारी किताबें जिन्हें आपके हाथ में होना ही चाहिए, अब तक प्रकाशित नहीं हुई हैं, जबकि उन्हें कब का प्रकाशित हो जाना चाहिए था.

इस पहली किताब के प्रति उमड़ी आपकी जिज्ञासाओं से हिंदी कविता के लिए आपके प्यार का पता मिलता है, लेकिन आप इस किताब को फिलहाल छोड़िए और हिंदी कविता जो आज संसार की श्रेष्ठ कविता के मुकाबिल है उसे खोजिए, पढ़िए और सराहिए, उससे प्यार कीजिए, उसके लिए लड़िए और उस पर मर मिटिए.

…और हो सके तो कवियों पर नहीं, कविता पर बात कीजिए.

इन दिनों हिंदी कवियों पर हमले बढ़े हैं. मानसिक रूप से रोगी और दिवालिए हमलावर की भूमिका में हैं.

सम्मानित कवि साक्ष्यहीन मानहानियों के शिकार हो रहे हैं. कविताओं से बाहर उनके गैरजरूरी व्यक्तिगत प्रसंगों की पड़ताल की जा रही है. लुंपेन उनका सरेआम अपमान करके सीना फुलाए झूमते हुए चले जा रहे हैं.

लेकिन कवियों की व्यक्तिगत दुनिया बहुत अजीब है, इसलिए उसे समझने के फेर में मत पड़िए. उनकी व्यक्तिगत दुनिया के सूत्र भी उनकी कविता में ही मिलेंगे, इसलिए उससे उलझिए, उसे सम्मान दीजिए— अगर वह इस लायक लगे तो, क्योंकि अंततः कवि नहीं कविता ही बचेगी, अगर वह बचने लायक हुई तो…

शुक्रिया.

[ होश में न होने के निष्कर्ष ]

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