पर्दे के पीछे से आज़म का दांव! 

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  • वसीम रिज़वी के बयानों से मुसलमानों में हो रही एकता स्थापित
  • भाजपाई शिया उलमा भी मदरसों और बाबरी मस्जिद के फेवर मे आ गये
  • सवाल उठे- दाउद इब्राहिम भाजपा परस्ती करे तो वो राष्ट्रवादी हो जायेगा
  • रिवर्स गेम तो नहीं खेल रहा आज़म का चेला
नवेद शिकोह 
लखनऊ,12 जनवरी। सब जानते है कि मौलाना कल्बे जव्वाद के संरक्षण में ही वसीम रिज़वी को शिया वक्फ बोर्ड का डमी अध्यक्ष बनाया गया था। साइलेंट कमिटमेंट तो ये था कि मजहब और सियासत की खिचड़ी की ये हांडी(शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन का पद) रहेगी तो तुम्हारे हाथ में लेकिन किसको खिचड़ी दें और किसको ना दें ये अख्तियार मेरा रहेगा। मौलाना जव्वाद और वसीम के बीच का ये कमिटमेंट कुछ सालों बाद फेल हो गया था।  वसीम कठपुतली के धागों को तोड़कर आजाद होना चाहते थे। मौलाना से बगावत के बाद कौम और हुकुमत कहीं के नहीं रहते वसीम। लेकिन चतुराई से उसने सपा की हुकुमत में मौलाना से बगावत का टाइम चुना। इस सरकार में मुस्लिम मामलात के वजीर ही नही मुस्लिम मामलों में वजीरे आला जैसा पावर रखते है आजम खान। आजम खां अपनी हुकुमत में उलमा का दखल बर्दाश्त नहीं करते है। मौलाना बुखारी के बाद मौलाना जव्वाद ऐसे धार्मिक नेता हैं जो हुकूमतों पर दबाव बनाते रहे हैं। नाफरमानी कर रहे वसीम को पद से हटाने के लिए सपा सरकार पर जव्वाद ने जितना दबाव बनाया आजम वसीम को उतनी ही ताकत देते रहे।
इस दौरान आजम को राजनीतिक गुरु बनाकर सियासत की चालबाजियों सीखने लगे वसीम रिजवी। वक्त ने करवट ली,  सपा सत्ता से बेदखल हो गयी। भाजपा हुकुमत का निज़ाम आया तो भाजपा विरोधी रहे मुस्लिम समाज पर तेजी से भगवा रंग चढ़ता दिख रहा था। खासकर शिया समाज तो पूरी तरह भाजपाई होता दिखाई दे रहा था। जो कभी पानी पी-पीकर कर भाजपा को कोसते थे वो बड़े-बड़े उलमा और मुस्लिम धार्मिक नेता भी भाजपा के कसीदे पढ़ने लगे। कभी कोई मोदी के दर पर पहुंच गया तो कोई योगी की चौखट के चक्कर काटने लगा।
इस माहौल को काटने के लिए आजम ने बड़ी खामोशी से रामपुरी चाकू चला दिया। सियासत के इस कैरम के स्टीकर बने आजम के चेले वसीम रिजवी। यहां वसीम रिजवी के रिवर्स गेम में तमाम गोटे आजम के पाले में गिरने लगीं।
राम मंदिर के पक्ष में, मदरसों और  उलमा के खिलाफ लगातार बयान देने से आज़म ख़ान किस तरह अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं जानिये :
  1. उलमा के तमाम शिकायतों,  सुबूतो और आरोपों के आधार पर वसीम के खिलाफ सख्त कार्रवाई ठंडी पड़ गयी।जिससे की वक्फ बोर्ड के पिछले कारनामों की पर्ते नहीं खुल पायीं। आरोप साबित होते तो वसीम के साथ आजम खान और सपा सरकार भी बुरी फंसती।
  2. जो शिया उलमा भाजपा की हिमायत में भाजपा सरकारों का सहयोग कर रहे थे वो भी मदरसों के पक्ष मे और राम मंदिर निर्माण की रुकावट बनकर खड़े हो गये।
  3. भाजपा विरोध और भाजपा समर्थन में शिया-सुन्नी के बीच जो खाई गहरी हो रही थी, वसीम विरोध में शिया सुन्नी एकता स्थापित होने लगी।
  4. मौलाना कल्बे जव्वाद, यासूब अब्बास और शिया पर्सनल लाॅ बोर्ड जो भाजपा नीतियों का समर्थक बनता जा रहा था वो भाजपा नीतियों (मदरसों और राम मंदिर इत्यादि पर) के खिलाफ बयान देने लगा।
  5. संघ और भाजपा में वसीम का बढ़ता कद देखकर भाजपा के शिया मंत्री और और अन्य मुस्लिम भाजपायों मे बेचैनी नजर आने लगी।
  6. इन मुस्लिम भाजपाईयों को अपनी अहमियत की असुरक्षा तो महसूस हो ही रहे है भाजपा में दो-चार प्रतिशत जो मुस्लिम जनसमर्थन था वो खिसकती दिखाई देने लगा।

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