हास्य कथा: चतुर किसान, व्यापारी परेशान

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अरविन्द कुमार ‘साहू’

बहुत पहले की बात है। बुन्देलखंड में एक बेहद चालाक व्यापारी रहा करता था। बेईमानी और सूदखोरी के नये-नये तरीके खोजकर वह किसानों को खूब ठगता और जमकर लाभ उठाता। उनकी गाढ़ी कमाई की फसल खूब सस्ते दामों में खरीदता, कम तौलता और हिसाब में भी गड़बड़ी कर देता, फिर भी उसका मन ना भरता। वह अपने मुनीमों से हमेशा नये-नये तरीके पूछता रहता था। उधर किसान बेचारे बेहद परेशान रहते और सोचा करते कि  इतनी कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें इतना कम पैसा क्यों मिलता है ?

एक दिन गाँव की चौपाल में यही चर्चा चल रही थी, तभी दीनू काका भी आ गये। वह गाँव के सबसे बुजुर्ग और समझदार किसान थे। बोले – ‘भाई, मुझे तो पक्का विश्वास है कि व्यापारी हम लोगों को हर तरह से बेवकूफ बना कर मोटा मुनाफ़ा काट रहा है और हमें बच्चों का पेट पालना भी मुश्किल हो गया है।’ रामू काका बोले – “हाँ भाई , दीनू ! पर हम करें तो क्या करें ? यहाँ दूर-दूर तक कोई दूसरा व्यापारी नहीं है, जो हम सबका माल खरीद कर उचित पैसे दे सके।” हरिया काका बोले – “पर इस व्यापारी को सुधारने के लिये कोई तो तरीका निकालना पड़ेगा ,वरना भूखो मरने की नौबत आ जायेगी।”

–“ हाँ भाई, कुछ तो सोचो। ” सभी  किसान चिन्तित थे।

दीनू काका बोले – “एक तरीका है। “ जैसे को तैसा ” का तरीका अपनाना पड़ेगा।अर्थात् व्यापारी को भी बेवकूफ बनाना पड़ेगा, तभी उसकी समझ में आयेगा कि दूसरों को उल्लू बनाना कितनी गलत बात है ?” रामू काका बोले – “सो तो है , यही ठीक भी रहेगा। बोलो तरकीब क्या है ? “

दीनू काका बोले – “सुनो ! किसान की पीड़ा व्यापारी को समझाने के लिये उससे भी किसानी करवानी पड़ेगी।”

-“ हाँय ! क्या कहते हो दीनू ? इतना बड़ा व्यापारी भला किसानी क्यों करेगा ? वह तो ऐसे ही हम लोगों से मोटा माल काट रहा है।” – रामू  काका बोले।

दीनू ने कहा  – “उसका भी एक तरीका है। लालची व्यापारी जल्दी ही और ज्यादा पैसा कमाने के लिये हमारे चक्कर में फँस जायेगा। मेरी योजना चुपचाप सुनो और उस पर अमल करो।”

“फुस – फुस ,  फुस – फुस…….”  होने लगी। सब कान  लगा कर बैठ गये। दीनू ने पूरी योजना समझा दी। सभी एक स्वर से “ वाह – वाह “ करने लगे। तय हो गया कि व्यापारी को इसी प्रकार से सबक सिखाया जायेगा। अगले दिन रामू काका ने  खेत से एक बोझ गन्ना काटा और उसे लेकर व्यापारी के सबसे चहेते मुनीम के घर जा पहुँचे।

  • “ राम – राम , मुनीम जी।”
  • “राम – राम , रामू काका। आज इधर कैसे ?” –  मुनीम ने पुछा।
  • “ अरे मुनीम जी, इस बार खेत में गन्ने की बड़ी अच्छी फसल हुई है।…उसी में से आपके बच्चों के लिये भी गन्ने ले आया। ”
  • “ पर रामू ! मैं इस गन्ने के पैसे नहीं दे पाउँगा।”
  • – “ अरे छोड़ो भी मुनीम जी ! मैने बाज़ार से नहीं खरीदा है। आप हम लोगों का  हिसाब – किताब में कितना ख्याल रखते हैं। इसे उपहार समझ कर रख लीजिये। “

“ लेकिन फिर भी …” – मुनीम ने संकोच करने का नाटक किया। रामू काका बोले – “ मुनीम जी ! मैं आपके व्यापारी की तरह पैसे देकर थोड़े खरीदता हूँ। ये तो खेत में मुफ्त में उगते हैं। बस, तोड़कर ले आये। खुद भी खाया और पैसे भी बना लिये। किसानी का यही तो  फायदा है। …..लेकिन व्यापार के लिये तो ढेर सारी रकम चाहिये,… आपके सेठ जी की तरह।”

-“हाँ, सो तो है ।…… सचमुच खेत से तो मुफ्त ही मिलता होगा।”

-“ बस ,खाद – बीज  की बहुत मामूली सी लागत आती है।..और हाँ,  एक – एक  बीज से सौ –सौ  बीज पैदा होते हैं। सीधे सौ गुना का मुनाफा होता है।”

  • “ अच्छा , इतना तो मैंने कभी सोचा ही नहीं। मिट्टी से अनाज उगाना तो बड़े ही फायदे का काम है।” – मुनीम आश्चर्य चकित रह गया।
  • “ अच्छा मुनीम जी। चलता हूँ , फिर मिलूंगा।” – मुनीम को सोचता छोड़ रामू काका निकल लिये।

तीर एकदम सही निशाने पर लगा था। मुनीम ने सोचा, अगर यह तरकीब सेठ जी की समझ में आ जाये तो वह और अधिक मालामाल हो जायेंगे। मुनीम ने दुकान पर पहुँचते ही सेठ जी को खेती – किसानी  का फार्मूला समझाया। लालची व्यापारी को लगा कि सही बात है। यदि सीधे खेत से ही अनाज मिल जाये तो किसानों को पैसे ही नहीं देने पड़ेंगे। बस फायदा ही फायदा। माल बेचते रहो और नोट कमाते रहो।

पर समस्या यह थी कि व्यापारी और मुनीम स्वयं तो खेती कर नहीं सकते थे। वे इसके बारे में कुछ जानते भी नही थे। जोतना, बोना, खाद, बीज, सिंचाई और फिर काट – पीट कर फसल तैयार करना उनके बस का नहीं था। किसानों का माल कम तौलना और हिसाब – किताब में गड़बड़ी कर देना तो उनकी पुश्तैनी सीख थी।

लेकिन मुनीम ने इसका भी तरीका सेठ को समझा दिया। खाद – बीज देकर किसानों से ही खेती करवायेंगे, और फसल का बंटवारा कर  लेंगे। एक-एक  दाने का सौ-सौ  दाना होगा। आधा – आधा  बँटवारे के बाद भी तो पचास गुना  फायदा मिलेगा।

“….अच्छा  धंधा है। ”- सेठ को बात तो समझ में आ गयी , पर स्वभाव  के अनुसार उसकी लालची बुद्धि कुछ ज्यादा ही कमाना चाहती थी। उसने मुनीम से कहा –“तेरी बात तो ठीक है .., लेकिन कोई ऐसा जुगाड़ नही है कि हम पूरा का पूरा सौ गुना ही हड़प लें ?”

मुनीम सिर खुजाता हुआ कुछ सोचने लगा। फिर जल्द ही उसकी गोल – मटोल आँखों में  चमक आ गयी। उसने सेठ जी के कान में एक तरकीब बताई जिसे सुनकर वह एकदम से तैयार हो गया।—“ठीक है , आज ही बात पक्की कर लो।लेकिन शर्त लगा देना कि फसल का बँटवारा हमारी मर्जी के अनुसार होगा।”

शाम होते ही मुनीम रामू काका के पास गया और बोला कि सेठ जी तुम्हारे साथ खेती करना चाहते है किन्तु बँटवारा उनकी मर्जी से होगा।

रामू काका ने कहा – “ठीक है , लेकिन हमारी भी एक शर्त रहेगी। फसल हम अपनी मर्जी से बोयेंगे ताकि पैदावार अधिक हो सके।” मुनीम को कोई संदेह नही हुआ। वह मान गया और खेती शुरू करने का निर्देश देकर ख़ुशी – ख़ुशी चलता बना।

रात को चौपाल में फिर चर्चा हुई। सभी को व्यापारी का काइयांपन पता था। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि व्यापारी यहाँ भी उन्हें बेवकूफ बनाने की  कुछ ना कुछ तिकड़म जरुर भिडायेगा। किसानों ने भी नहले  पर दहला मारने का निश्चय कर लिया था। आखिर  सबने सहमति दे दी और साझे की खेती के लिये हर शर्त पर तैयार हो गए।

व्यापारी ने पहली ही फसल में बंटवारे की बड़ी अजीब शर्त रख दिया कि फसल का दाना आधा – आधा तौलकर बाँटने के बजाय खेत में ही इस तरह बंटवारा होगा कि पौधे के ऊपर का हिस्सा वह ले लेगा और नीचे का हिस्सा किसानो  को मिलेगा। अजीब शर्त थी पर किसानों को मानना पड़ा। व्यापारी की  चालाकी थी कि फसल के दाने तो पौधे के ऊपर ही होते हैं , धान – गेहूँ – बाजरा  सब में ऊपर का दाना उसको मिल जायेगा। बाकी पेड़ का तना तो भूसा और लकड़ी होता है। ले जायें किसान। उसका क्या ? वह तो दाने बेंच कर मालामाल हो जायेगा। किसान भूसा ले जाये चाहे जो करे  , उसकी बला से। व्यापारी खुश था। लेकिन किसानों ने भी पूरी तैयारी से योजना बनाई थी। वे सभी परिस्थितियों से निपटने को तैयार थे। आखिर किसानी उनका भी पुश्तैनी धंधा था। किसानों को शर्त के अनुसार फसल अपनी मर्जी से  बोना था। सो उनहोंने  सोच – विचार के बाद खेत में आलू के बीज डाल दिया। खाद – बीज की लागत व्यापारी से वसूल लिया।

जब फसल तैयार हुई तो खेत में से जमीन के ऊपर का सारा पौधा काट कर व्यापारी के घर भेज दिया गया और जमीन के नीचे से सारा आलू खोद कर शर्त के अनुसार किसानों ने ले लिया। व्यापारी को पहली ही बार जबरदस्त घाटा लग गया ।आलू के पौधे तो जानवर भी नहीं खाते। वह क्या करता। मुनीम को बुलाकर डाँटने लगा कि यह कैसा फायदा हुआ ? मुनीम ने सिर झुकाकर कहा – “ आप ही ने तो ऊपर का हिस्सा मांगा था। मैं क्या करता।”

“ ओफ्फोह “ – व्यापारी ने झल्लाकर कहा – “ तुमने बताया नहीं था कि ये फसल जमीन के नीचे  पैदा होती है।”

“अब ये तो किसानों की मर्ज़ी से हुआ , पर कोई बात नहीं।”- मुनीम ने सलाह दी – “ सेठ जी , अबकी  हम लोग नीचे का हिस्सा  लेंगे। तभी ठीक रहेगा।”

इस बार सेठ ने शर्त बदल दी। किसानों ने सोचा – “ वाह सेठजी , तुमनें बेवकूफ बनाने का नया तरीका सोचा है। चलो फिर से देखते हैं।”

इस बार किसानों ने गेहूँ बो दिया। फिर खाद – बीज की लागत व्यापारी से लिया। फसल तैयार हुई तो ऊपर का हिस्सा जिसमें दाने की बालियाँ  होती  हैं, किसानों ने काट कर अपने हिस्से में कर लिया और नीचे का जड़ व तना – भूसा सब व्यापारी के घर भेज दिया।

“ यह क्या …….?”- व्यापारी फिर मुनीम पर  चिल्लाने लगा कि नीचे  का हिस्सा लेने पर भी उसे घाटा क्यों हो गया?” मुनीम ने सिर झुकाकर कहा – ‘सेठ जी , गलती हो गई। शर्त के अनुसार किसानो  ने फसल अपनी मर्जी से बोयी थी ।”

झल्लाकर सेठ ने पूछा – “ घाटा निकालने का फिर क्या तरीका है ? बताओ सोचकर।” मुनीम ने काफी देर तक सिर खुजाया ,फिर काफी सोचकर बोला – “ अच्छा तरीका तो यही है कि हम फसल में से जमीन के नीचे का हिस्सा और सबसे ऊपर का हिस्सा दोनों ले लें , तभी लाभ होगा।  चाहे किसान अब धान , गेहूँ , बाजरा बोयें या आलू , शकरकंद बोयें , हमें घाटा नहीं होगा।”

  • “ ठीक है। किसानों से शर्त बदल दो।”

इसबार नई शर्त सुनकर किसान पहले तो चकराये फिर आपस में विचार – विमर्श करके थोड़ी ना नुकर के बाद तैयार हो गए ताकि व्यापारी को अच्छी तरह सबक सिखाया जा सके।

इस बार किसानों ने खेत में मक्का बो दिया। खूब जमकर फसल हुई। हरियाली देखकर व्यापारी खुश था। उसे नहीं पता था कि मक्के के पौधे में सबसे ऊपर दाने की बाली नहीं होती बल्कि दिखावटी लम्बी बाली जैसे सिर्फ फूल होते हैं। दानों की बालियाँ तो पौधों के बीच – बीच तने में लगी होती हैं। बहरहाल, फसल तैयार होने पर उसमें से दाने वाली पत्तों से ढकी हुई बालियाँ जिन्हें

“ भुट्टा ’’ कहते हैं , किसानों ने तोड़कर अपने घर में रख लिया  और ऊपर के फूल वाली बालियां और जड़ समेत पूरे पौधे व्यापारी के घर भेज दिया।

इसे देखते ही व्यापारी ने अपना माथा पीट लिया। मक्के की खेती की असलियत जानकर वह मुनीम पर खूब चिल्लाया कि तूने मुझे कंगाल करवा दिया। किसान मुझे माल भी नहीं बेच रहे। खेती से भी मुझे कुछ नहीं मिला। खाद – बीज में पैसे अलग से गये। कुछ भी हो अब खेती बन्द। या , तो सारी की सारी फसल मुझे चाहिए। उसका  फल ,फूल ,दानों की बाली या भुट्टा और उसकी जड़ भी। ये किसान बहुत चालाक हैं पर मैं भी अपना घाटा निकाल कर ही रहूँगा।”

  • “ पर सेठ जी ! किसानों को क्या बचेगा ? वह क्यों मानेंगे ? ’’
  • “ मैं कुछ नहीं जानता। किसानों से बात करो , वरना मैं बरबाद हो जाऊंगा। इसबार तो मुझे फायदा मिलना ही चाहिए।’’

“ ठीक है ’’- मुनीम ने जाकर किसानों से बात की कि इसबार किसानों को सेठ जी की बात माननी ही पड़ेगी, वरना घाटे से सेठ जी बर्बाद हो जायेंगे।

किसानों का तीर सही निशाने पर लग रहा था। बस एक आखिरी बाजी थी जिसे जीतना जरूरी था। किसानों नें कहा – “ ठीक है। सब कुछ सेठ जी ले लें पर उसकी खुशबू पर तो हमारा अधिकार बनता ही है , बंटवारे और मेहनत के नाम पर। हम उसके खुशबू वाले अर्क से फायदा निकाल लेंगे। बाकी सब कुछ व्यापारी ले लें।”

“ ठीक है ’’ – अपने मन की बात पूरी होने से व्यापारी खुशी – खुशी तैयार हो गया। धान , गेहूँ , आलू , शकरकंद , और किसी भी फसल की खुशबू से उसे घाटा नहीं हो सकता था। उसने काफी-

सोच-विचार कर आखिरी बार फिर खेती के लिये हाँ कर दी।

इस बार किसानों ने काफी होशियारी का परिचय देते हुए खेत में पिपरमिन्ट के पौधे लगा दिये। खूब जमकर हरियाली हुई। पौधे खूब बढ़े। बाद में किसानों ने उन्हें काटकर उसका खुशबू देने वाला तेल पेराई करके निकाल लिया और शेष सारा पौधा जड़ समेत व्यापारी के घर भिजवा दिया। सारी बात समझ कर व्यापारी बेहोश हो गया। वह कंगाल होने की कगार पर पहुँच गया था। मुनीम से जानकारी पाकर सारे किसान व्यापारी के घर पहुँचे और व्यापारी को पिपरमिन्ट का तेल सुंघा – सुंघा कर होश में लाये। व्यापारी सिर धुन रहा था।

किसानों ने उसे समझाया कि आप परेशान न हों। वे उसे सारी फसल बेच देंगे। पर उचित दाम और सही तौल करके। उन्होंने समझाया कि खेती करके फसल पैदा करना बड़ी ही मेहनत और बुद्धिमत्ता का कार्य है। किसान अन्न उपजाकर “ अन्नदाता ’’ हो जाता है और “ अन्नदाता ’’ ईश्वर का दूसरा नाम है। किसानों को उसकी फसल का उचित मूल्य न देना व उसके साथ बेइमानी करना

अन्नदाता यानी ईश्वर का अपमान करने जैसा है। रुपया चाहे जितना कमा लिया जाये लेकिन जीने के लिये तो फसलों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। अतः किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलना ही चाहिये।

बस, उसी दिन से व्यापारी कि आँखों पर बंधी लालच की पट्टी खुल गयी। उसने किसानों से क्षमा मांगी। किसानों ने फिर से उसको फसलें बेचना शुरू कर दिया और व्यापारी का कारोबार अब ईमानदारी के साथ चलने लगा। इसके बाद  सभी लोग खुशी से जीवन व्यतीत करने लगे।

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