नीतू सिंह
बहुत समय पहले की बात है एक गांव में एक हट्टाकट्टा लकड़हारा रहता था। एक दिन की बात है वह जंगल में लकड़ी काटने के लिए गया। वह जंगल मे लकड़ी काट ही रहा था की अचानक उसने देखा कि लकड़ी काटते-काटते उसने पूरा जंगल ही साफ कर दिया। दूर- दूर तक कही भी पेड़ पौधे का नामो- निशान ही नहीं था। हर तरफ कटे वृक्ष, लकड़ी और फूल पत्ते ही दिख रहे थे।
गर्मी का महीना था धूप बहुत तेज हो रही थी। और लकड़हारा प्यास और धूप से बहुत परेशान था। एक समय तो उसे लगा कि प्राण ही निकल जायेंगे। वह भयंकर गर्मी और उमस से बेहद परेशान था। हर तरफ कटे जंगल का ही नज़ारा उसे दिख रहा था। जब उससे अत्याधिक गर्मी सहन नहीं हुयी तो वह बोला: मुझे बहुत गर्मी लग रही है क्या करूं मै बहुत परेशान हो गया हूं! ना यहां पानी की सुविधा है और न ही छाँव की कोई उम्मीद! उस पर मुझे पसीना भी बहुत आ रहा है।
काफी देर तक वह परेशान रहा और आखिर में उसे लगा की अब उसके प्राण ही निकल जायेंगे। उसने कहा लगता है मैं मर ही जाऊंगा। अचानक कटे पेड़ों के बीच से एक आवाज आई:- ‘ लकड़हारे भइया! अभी मेरे पत्तों में थोड़ी सी जान बाकी है आप चाहो तो मेरे इन पत्तों को उठाकर अपने शरीर को ढांक लीजिए इससे आपको छाँव और ठंडक मिल जाएगी। और आपके प्राण भी बच जायेंगे।
इतना सुनते ही उसने पीछे पलटकर देखा कि वह आवाज उन कटे हुए लकड़ियों के पत्तों से आ रही थी। उसने सोचा कि मैंने तो इन्हे काट दिया था। फिर भी यह हमारे लिए इतनी बड़ी बात कर रहे हैं!
गर्मी से बचने के लिए उसने फिलहाल तो उन पत्तों से उसने अपने शरीर को ढांक लिया और जब तक शाम नहीं हुयी और सूरज नहीं डूबा, तब तक उन पत्तों से अपने शरीर को ढके बैठा रहा। इससे उसको छांव मिलती रही और अंत में उसने राहत की सांस महसूस की। क्योंकि उसके प्राण अब बच गए थे।
इसके बाद थोड़ी देर में ही उसे अपनी गलती का अहसास हो गया और उसकी आँखों से आंसू बह निकलें। वह उन कटे पत्तों से बोला कि मैंने तुम्हें काट दिया है और इसके अलावा सारा जंगल भी तहस -नहस कर दिया फिर भी तुमने मुझे बचा लिया। मुझे माफ कर दीजिए मैं आप सबका बहुत बड़ा गुनहगार हूं। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है और अब मुझे पश्चाताप करना है!
तब उन पत्तों ने कहा कि यदि वास्तव में तुम पश्चाताप करना चाहते हो इस जंगल को फिर से हरा-भरा कर दो। वह लकड़हारा उदास मन से घर गया और कोई लकड़ी भी नहीं ले गया और रात भर सोचता रहा कि जंगल को कैसे हरा-भरा किया जाए सुबह उठकर उसने बाजार से छोटे-छोटे ढेर सारे पौधे लिए और चल पड़ा उसी जंगल की ओर जहां उसने पूरा जंगल नस्ट कर डाला था। वहां पहुँच कर उसने जमीन में छोटे-छोटे पौधे को पौधारोपण कर दिया। और उसमे पानी डाला। इस प्रकार वह रोज उसमें पानी डालता। सुबह शाम उनकी रखवाली करता।
इस प्रकार जब तक वह पेड़ बड़े नहीं हो गए। तब तक वह उनकी खूब सेवा करता। फिर एक ऐसा भी आया जब एक नया जंगल आबाद हो गया। इस प्रकार लकड़हारे का पश्चाताप भी पूरा हो गया और उसे भरपूर ख़ुशी भी हुयी कि उसने जंगल को फिर से हरा भरा कर दिया। इसके बाद उसने प्रण लिया कि आज के बाद मैं कभी भी किसी को इस जंगल से कोई भी वृक्ष नहीं काटने दूंगा। और लोगो को इस बात के लिए प्रेरित करूँगा कि हमेशा पेड़ पौधे लगाएं। बस यही लोगों को नेक सलाह दूंगा। पेड़ पौधे लगाएं इससे पृथ्वी की रक्षा भी होगी और हमें अपना पर्यावरण भी शुद्ध मिलेगा।
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