पंकज चतुर्वेदी
बादल भी नहीं थे, आकाश साफ था। वह बिल्कुल सही समय से उडना शुरू हुआ था। रफ्तार भी बिल्कुल ठीक थी। कुल सवा घंटे का सफर था। सही समय दिल्ली भी पहुँच गया।
उसने अंगड़ाई ली, ‘‘ चलों अब कुछ देर आराम करूंगा। सुबह पांच बजे से उड़ रहा हूं। उड़ने से पहलेे तैयारी के लिए तीन बजे ही नींद से उठा दिया था। अंग-अंग दुख रहा है। समुद्र के ऊपर से उड़ो तो नमकीन हवा शरीर को खंरोचती है। ’’
वह अभी नीचे देख कर आराम करने की कल्पना ही कर रहा था कि विजय की आवाज ने उसे जैसे सपने से उठा दिया । विजय घोषणा कर रहे थे, ‘‘ फिलहाल नीचे हवाई अड़्डे पर जगह की कमी है । हमें लगभग आधा घंटे आसमान में ही रहना होगा । इस देरी के लिए हमें खेद है। ’’
जल्दी-जल्दी उतर कर अपने घरों की तरफ भागने को आतुर यात्रियों के चेहरे से खुशी गायब हो गई। वे तो अपना सामान समेटने में लगे थे, अब उन्हें फिर से सीट पर बैठ कर सीट बैल्ट बांधने को मजबूर होना पड़ा। हर एक के मुंह से आवाज निकली ‘‘ उफ्फ, फिर देर हो गई। ’’
यात्री तो आपस में शिकायत कर रहे थे। विजय भी अपने ग्राउंड स्टाफ को उलाहना दे रहा था। लेकिन वह किससे कहे ? एक लंबा गोता हवा में भरा और नीचे झांका । हवाई अड्डे की सभी पट्टियां भरी हुई थीे ।
बेवजह बाएं, फिर दाएं । कहां तो वह कंक्रीट के जंगल के बीच टहल रहा था और उसे फिर से हरे जंगलों की ओर जाना पड़ा। सुंदर दृश्य भी अब मन को नहीं भा रहे थे। उसे आराम की सख्त जरूरत थी- डर रहा था कि यूं ही भटकते -भटकते कहीं नींद न आ जाए।
तभी आवाज आई , ‘‘ यार, तुम मुझसे दूर-दूर क्यों रहते हो ? मेरा भी कोई दोस्त नहीं है । और तुम तो अकेले ही भटकते हो । हमसे हाथ मिला लो ना !’’
‘‘ऐ-ऐ दूर , बिल्कुल दूर । पास नहीं आना । मुझसे दूर ही रहो। जो भी बात करना है दूर से और दूर से ! ’’
‘‘ भई ऐेसी भी क्या नाराजगी ? हम भी आकाश के राजा हैं और तुम भी । हम तो इतने छोटे से हैं और तुम इतने बड़े । हमसे डरो मत । अच्छा ,बताओ तो कहां-कहा धूम कर आ गए ।’’
‘‘ सही बात बताएं, मेरा भी बहुत मन करता है तुमसे बात करने का । देखो ना बगैर कारण यूंह ही आकाश में भटक रहा हूं। लेकिन मजबूरी है । ’’
‘‘ अरे, हमारे दोस्त बन जाओ। फिर दोस्ती में कैसी मजबूरी ?’’
‘‘ देखो तुम तो हो अपनी मर्जी के मालिक । जब जहां चाहो जा सकते हो । पर मेरी कोई मर्जी नहीं चलती मुझे विजय जहां चाहता है, वहीं मैं जा सकता हूं । वो जब चाहता है तभी मैं उड़ता हूं और उसकी मर्जी पर मुझे जमीन पर आना पड़ता है।’’
‘‘ अरे, बाप रे, तुम तो इतने बड़े हो और किसी के गुलाम हो। अपने मन से आराम भी नहीं कर सकते? भरोसा नहीं होता। ’’
इन दोनों की बात चल ही रही थी कि तभी विजय ने माईक पर घोशणा कर दी। ‘‘ नई दिल्ली हवाई अड्डे पर अब स्थान खाली होने की सूचना मिल गई है। हम कुछ ही पलों में हवाई अड्डा पर उतर रहे है।। अपना जरूरी सामान, चश्मा, पुस्तकें आदि संभाल लें। विलंब के कारण आपको हुई असुविधा का हमें खेद है। ’’
‘‘ चलें भाई। आदेश आ गया। लो, अब मुझे जमीन पर उतरना होगा ।’’
‘‘अजीब है तुम्हारी भी कहानी। इतना बड़ा शरीर, मुझसे भी ऊंचा उड़ने की ताकत। फिर भी अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं।
‘‘हां, ऐसा ही होता है। जो जितना अधिक बलशाली होता है, उसे उतने ही अधिक नियंत्रण में रहना पड़ता है। ठीक चलता हूं। फिर कभी मिलेंगें।
‘‘ ठीक है, जरूर जल्दी फिर से मुलाकात होगी। अच्छा अलविद से पहले हाथ तो मिला लें ।’’
जहाज ने सिर नीचे किया, ‘‘ ना , बिल्कुल नहीं । मेरे पास कतई न आना ।’’
‘‘ये कैसी दोस्ती ! कह रहे हो पास न आना ।’’
विमान ने ठहाका मारा, ‘‘ यदि तुम मुझसे टकरा गए तो जो कुछ होगा उसकी तुम्हें कल्पना भी नहीं है। तुम्हारा जो कुछ होगा, वह तो होगा ही। मैं भी नहीं बचूंगा ।’’
‘‘लेकिन तुम तो इतने बड़े और मैं कहां ?’’
उसके पहिंए बाहर आ गए थे, ‘‘ यही तो डर बना रहता है । तभी तो कहता हूं कि तुमसे दूर की ही दोस्ती भली । ’’
हवाई जहाज सरपट रनवे पर दौड़ रहा था और पंछी आसमान में चक्कर लगाते हुए सोच रहा था कि यह कैसा पंछी है !







