दक्षिण भारत के घने वन में एक मोटा-ताजा हिरन रहा करता था। वह सारा दिन हरी घास चरता, रात को झाड़ियों में छिपकर सो जाया करता था। एक दिन दूसरे वन से आने वाले एक गीदड़ ने उस हिरन को देखा। उसे देखकर गीदड़ के मुँह में पानी भर आया। वह सोचने लगा, “इस हृष्ट-पुष्ट हिरन का माँस कितना स्वादिष्ट होगा? पर वह खाने को मिले तो कैसे? बहुत सोच-विचार के बाद उस गीदड़ ने उसे मित्र बनाकर उसका विश्वास जीतने का निश्चय किया। जल्दी ही उस भोले-भाले हिरन के साथ उस गीदड़ ने मित्रता कर ली।
अब गीदड़ नित्य हिरन को नए-नए स्थानों पर चरने के लिए ले जाने लगा। ऐसा करते समय एक दिन गीदड़ ने एक हरा-भरा खेत देखा। यह भी देखा कि खेत का मालिक नित्य एक डंडा लेकर उस खेत की देखभाल करता है। यह सब देखकर गीदड ने सोचा, “यदि हिरन को इस खेत में चरने ले जाया जाए, तो खेत का स्वामी उसे डंडे से अवश्य मार गिराएगा। तभी मुझे उसका माँस खाने के लिए मिल पाएगा, इसके अलावा अन्य कोई चारा नहीं।” यह सोचकर गीदड़ ने दो-चार दिनों तक हिरन को बातों में फुसलाया।
फिर एक दिन खेत के मालिक के आने से पहले ही हिरन को खेत पर ले जाकर बोला, “मित्र! देखो, कितना हरा-भरा खेत है? तुम कछ है। यहीं पर चरो। मैं एक आवश्यक कार्य करके कुछ ही देर में आता हूँ।” कहकर गीदड़ खेत से बाहर जाकर किनारे की झाड़ियों में छिपकर खेत के स्वामी के आने की प्रतीक्षा करने लगा। हिरन चरने लगा। चरते-चरते वह उस किनारे के निकट जा पहुंचा, जहाँ झाड़ियों में गीदड़ छिपा बैठा था। इतने में हाथ में मोटा डंडा लिए खेत का मालिक भी आ पहुँचा। हिरन को खेत में चरते देख गुस्से से भर वह उसकी ओर भाग। भागने की आवाज सुनकर हिरन उठकर भागा। खेत के मालिक ने भागते हिरन की ओर कसकर डंडा फेंका परंतु वह डंडा हिरन को नहीं लग पाया और झाड़ी में छिपे बैठे गीदड़ के सिर पर जालगा। सिर फटने से गीदड़ मर कर वहीं ढेर हो गया। हिरन भागकर जंगल में जा घुसा। (शिक्षा-बुरे काम करने का अंत बुरा ही होता है।)







