प्यारे बच्चों, आज मैं तुम्हें कछुआ और खरगोश की एक कहानी सुनाता हूं। इस कहानी में कछुआ नहीं बल्कि खरगोश ने दौड़ प्रतियोगितिया में बाजी मारी। वह कैसे तो सुनो नदी के किनारे जंगल में एक कछुआ और एक खरगोश साथ- साथ रहते थे। साथ -साथ नदी में डुबकी लगाते हैं और एक साथ बैठकर पढ़ाई भी करते हैं। एक दिन कछुए ने खरगोश से कहा ‘तुम्हें याद है एक बार मेरे दादा ने तुम्हारे दादा को दौड़ में हराया था’। खरगोश ने कहा ‘यह भी कोई बोलने वाली बात है मित्र ऐसे ही घटनाओं से हम जीवन में बहुत सारी अच्छी बातें सीख जाते हैं।
कछुआ बोला किसने कहा वह सब छोड़ो! अब क्या तुम मेरे साथ दौड़ लगाओगे। खरगोश ने हामी भर दी दूसरे दिन नियत समय पर एक कवि की देखरेख में दौड़ प्रतियोगिता शुरू हुई। कछुआ अपनी धीमी गति से चला जबकि खरगोश तब तक दौड़ता रहा जब तक वह दौड़ प्रतियोगिता में निर्धारित मंजिल तक नहीं पहुंचा गया।
कछुआ धीरे-धीरे लगातार चलता रहा और जब वह मंजिल पर पहुंचा, तो क्या देखता है कि खरगोश मंजिल पर पहुंचकर आराम फरमा रहा है।कछुआ बोला, मित्र, इस बार तुम जीत गए लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आयी। कौन सी बात मित्र से पूछा मैंने कहा, तुमने अपने दादा की तरह बीच में पेड़ की छांव में आराम क्यों नहीं किया! खरगोश बोला, मित्र मेरे दादा हमेशा मुझसे कहते रहते थे कि आराम हराम है। गांधीजी भी यही कहा करते थे कि जो सोवत है वह खोवत है। मित्र और आज का युग भी पहले जैसा नहीं रहा। आज के युग में लक्ष्य प्राप्ति के लिए तत्परता निरंतरता के साथ ही शीघ्रता भी अति आवश्यक है। इसलिए मैंने मंजिल पर पहुंचकर ही आराम करना उचित समझा।







