कई साल पहले विजय नगर में एक राजा राज्य करता था। उनका नाम था श्री कृष्ण देवराय। उनका एक दरबारी बहुत बुद्धिशाली और हाजिर जवाब था। उसका नाम तेनाली रामकृष्ण था। दरबार में लोग उनका बहुत आदर करते थे।
एक बार राजा श्री कृष्ण देव राय ने एक कलाकार से अपना चित्र बनवाया। उस कलाकार का नाम राज वर्मा था। राज वर्मा ने राजा का हूबहू चित्र बनाया था। चित्र देखकर राजा बहुत खुश हुआ, उसने राज वर्मा को अपना मंत्री बना दिया।
राज वर्मा कलाकार था, इसलिए राज्यों के कार्य में अक्सर गड़बडी हो जाती थी। इससे प्रजा दुखी हो गयी। लोग तेनाली रामकृष्ण के पास गए और उसने उस से प्रार्थना की कि वे राज वर्मा को राज कार्य से मुक्त करा दें। तेनाली रामा ने लोगों से कहा राजा श्री कृष्ण देव राज वर्मा को बहुत चाहते हैं। अतः जरा सोचना पड़ेगा अभी तो आप लोग जाइए!
थोड़े दिन बाद तेनाली रामा ने राजा श्री कृष्ण देवराय को अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया। राजा ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया। तेनाली रामकृष्ण ने भोजन बनाने के लिए बढ़ईयों को बुलाया था, निश्चित समय पर राजा अपने परिजनों के साथ तेनाली रामकृष्ण के घर भोजन करने पधारे।
सब लोग भोजन करने बैठे। भोजन परोसा गया। मेहमानों ने जैसे ही पहला कौर मुंह में डाला कि तुरंत ही सिसकार उठे। उनकी आंखों में पानी आ गया। राजा गुस्से से बोले अरे रामकृष्ण! यह कैसा भोजन बनवाया है तुमने! क्या तुम हमें मार डालना चाहते हो? भोजन किसे बनाया है? तेनाली रामकृष्ण ने जवाब दिया महाराज यह भोजन तो बढ़इयों ने बनाया है!
राजा बोले अरे बढ़इयों को कहां से आएगा! यह तो लकड़ी काटना जानते हैं, इनका काम नहीं है यह! तुम पागल हो गए हो क्या? तेनाली ने चतुतुराई से कहा कि महाराज जब कलाकार मंत्री बन सकता है और राज काज संभाल सकता है तो बढ़ाई भोजन क्यों नहीं बना सकते!
राजा कृष्णदेव राय तेनाली रामकृष्ण की बात समझ गए इसके बाद से उन्होंने राज वर्मा को मंत्री पद से हटा दिया।







