एक राजा था। उसे अपने सौंदर्य पर, ऐश्वर्या पर और अपने राजपाट पर बड़ा गर्व था। वह हर घड़ी अभिमान के नशे में चूर रहता था। दूर-दूर तक लोग जानते थे कि उसके बराबर घमंडी राजा और कोई नहीं है। वह सब को अपने से छोटा और तुच्छ मानता था। एक दिन एक साधु राजा के दरबार में आया बड़े अभिमान से राजा ने पूछा ‘तुम्हें क्या चाहिए। साधु को पता था कि वह राजा बड़ा भी अभिमानी है उसने मुस्कुराते हुए कहा ‘तेरे पास है क्या जो मुझे देगा’। साधु के यह शब्द सुनते ही राजा आग बबूला हो गया।
इस साधु की इतनी मजाल कि उसके वैभव को उसी के मुंह पर इस प्रकार चुनौती दे। भरे दरबार में उसका अपमान करें। पर साधु के चेहरे पर इतना तेज था कि राजा अपने क्रोध को प्रकट नहीं कर सका। साधु ने राजा की भाव भंगिमा को देखा पर तनिक भी विचलित नहीं हुआ। अत्यंत धीर-गंभीर वाणी से बोला- ‘मैंने जो कहा है वह ठीक ही कहा है। जरा ठंडे दिमाग से सोच देख। तुझे जो सौंदर्य मिला है वह तेरा नहीं है तेरे माता-पिता का दिया हुआ है। क्यों है न! राजा एक साथ इसका उत्तर नहीं दे सका।
साधु ने आगे कहा तेरे भंडार धन -धान्य से परिपूर्ण है पर वह तेरे कहां है। वह तो तुझे धरती माता ने दिया है। क्यों है ना? राजा चुप। साधु ने फिर कहा जिसे तू अपना राजपाट कहता है वह भी तेरा कहां है वह तो तुझे प्रजा ने दिया है तेरे शरीर में जो प्राण है वह भी निरंतर कोई और ही है तू नहीं! अरे पगले याद रख अपना वह होता है जो अपने साथ जाता है। इस दुनिया में ना कोई साथ आया है और ना कोई साथ जाएगा। इतना कहकर साधु वहां से चला गया और उसके बाद साधु की बात का राजा पर बड़ा असर पड़ा। उस दिन से राजा की जीवनधारा बदल गई।







