जी क़े चक्रवर्ती
बचपन हमारा बचपन, वर्तमान समय का हमारे बच्चों का बचपन चीख- चीख कर कह रहा है हम एक बच्चे हैं हम तुम्हारी दुनिया दारी से बेखबर हमे किसी से कुछ लेना-देना नही है, फिर भी आज हम से हमारा बचपन क्यों छीन लिया जाता है? हजारो लोगों के बीच चलने वाली कुछ निगहें हमारे बाल मन से हमारा बचपन कियूं छीन लेना चाहता है। हम तो अपने भोले पन से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते है हमारी ओर जब किसी के दोनों हाथ उठा कर हमें अपने पास बुलाते है हम निश्छल बिना कुछ भी सोचे समझे आनन्दित होते हुये उनके गोद मे समा जाते है दिन भर खेलने कूदने के बाद दूध पान करके अपने मां के आंचल तले निश्चिंत निडर सो जाते है। हमारी ऐसी उम्र होती है, जब हम बगैर किसी तनाव के मस्ती से दिन दुनिया से बेखवर कोमल जिंदगी का आनन्द उठाते रहते है। नन्हे होंठों पर फूलों सी खिलती हँसी, वो मुस्कुराहट, वो शरारत, पल -पल में रूठना, मनाना, जिद पर अड़ जाना ये सब बचपना ही हमारे बच्चे होने की निशानी है। सच कहें तो बचपन ही प्रत्येक व्यक्ति का वह वक्त होता है, जब हम दुनियादारी के झमेलों से दूर अपनी ही मस्ती में मस्त अठखेलियां करते रहते हैं।क्या कभी हम और आपने सोचा है कि आज आपके, हमारे बच्चों का वो बेखौफ आनन्दित बचपन कहीं खो गया सा लगता है? कियूं? आज नन्हे मुख पर मुस्कुराहट के बजाय चेहरों पर उदासी व तनाव के लकीरें क्यों उभरी हुई दिखाई देती है? अपनी छोटी सी उम्र में मां दादी के गोद मे और पापा, दादा के कंधों की सवारी करने वाले बच्चे आज अपने कंधों पर अपने से ज्यादा भारी भरकम बस्ते टाँगे बच्चों से खचाखच भरी स्कूल बस की सीढ़ियों पर अपने नन्हें-नन्हे पैरों के सहारे चढ़ते उतरते बस की सवारी कर स्कूल पहुंचने कर सबसे आगे के बेंच पर बैठने के लिये उत्साहित-लालायित उतेजना से इधर से उधर दौड़ते भागते फिरते हैं।
एक छोटी सी उम्र में ही नन्हे-नन्हों को आज के प्रतिस्पर्धा की दौड़ में शामिल कर दिया जाता है और इसी प्रतिस्पर्धा में सबको पीछे छोड़ने के चाह में उन्हें स्वयं को दूसरों से आगे निकलने की अंधी दौड़ में उन्हें भी शामिल होना पड़ता है। इसी प्रतिस्पर्धा व कश्मकश में नन्हे बच्चों का नन्हा बचपन कहीं विलीन हो जाता है।

बड़े-बड़े शहरों में और भी बुरा हाल है मां-बाप अपने अपने काम-काज व्यस्त होने के कारण अपने आप को स्वत्रंत रखने के लिए अपने बच्चों को गुल्ली-डंडे, लट्टू, कैरम व बेट-बॉल की जगह वीडियोगेम, कंप्यूटर थमा देते हैं, बच्चों के खेलने और उनके मनोरंजन के साधन उनके प्राकृतिक स्वाभाविक स्वभाव को उग्र बना देते हैं। अधिकतर ऐसा देखने में आता है कि दिनभर वीडियोगेम से बहुत अधिक देर तक चिपके रहने वाले बच्चों में सामान्य बच्चों की अपेक्षा चिड़चिड़ापन व क्रोधी प्रवृत्ति एवं छोटी-छोटी बातों पर आवेश पूर्ण स्वभाव का परिचय देना एक साधारण सी बात है।
अक्सर लोगों को हम यह कहते-सुनते देख सकते है कि अमुक बच्चा आज स्कूल से घर लौट कर नही आया उन्हें ढूंढते-ढूंढते जब उनके संरक्षक वहाँ पहुंच जाते हैं जहां पर बच्चा अन्य अनजान बच्चों के साथ खेलते हुए मिलता है या कुछ खाते पीते हुये बैठा मिलता है। इसके अलावा ऐसी परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए दूसरे अनजान लोगों द्वारा बच्चे को लालच दिये जाने से बच्चा लालच में फंसकर अनजान अपरिचित लोगों के साथ उनके अनुसार चल देता है। ऐसे समय का लाभ उठाते हुये लोग बच्चों के साथ कुकृत्य तक कर डालते है और फिर पकड़े जाने के डर से कभी-कभी तो उनका कत्ल तक कर देते हैं। ऐसे अनेको घटनाओं से हम और आप भली भांति परचित हैं।
आज वर्तमान समय मे आयोजित होने वाले यथार्थ परक प्रदर्शन (Reality show) भी बच्चों के कोमल ह्रदय में प्रतिस्पर्धा की उतेजना पूर्ण भाव को बढ़ाने में सहायक होते हैं। वर्तमान समय मे नन्हे बच्चों के ऊपर पहले से ही अपने पढाई-लिखाई का बोझ का तनाव तो हैं ही इसके साथ ही प्रतिस्पर्धा में हारने-जीतने और आगे निकलने का दबाव में रहने से बच्चे अल्प आयु में ही अपने आयु से बहुत बड़ा व गंभीर हो जाते है। ऐसे में उन्हें अपने बराबर के सभी बच्चे उनके प्रतिस्पर्धी नजर आने लगते हैं और बच्चे के अंदर दूसरे बच्चे के प्रति बुरा से बुरा करने की भावना उत्पन्न हो जाने से वह इसके लिए सदैव तैयार रहते हैं। (जिसके उदाहरण स्वरूप हम आपको हरियाणा के रिहान मन्टेसरी स्कूल में घटित उस घटना का स्मरण दिलाना चाहेंगे।) नौकरीपेशा करने वाले माता-पिता के लिए अपने बच्चों को दिनभर व्यस्त रखना या किसी दूसरे के भरोसे उन्हें छोड़ना कहाँ तक उचित है क्योंकि उनके पास तो अपने बच्चों के लिए खाली वक्त ही नहीं होता है ऐसे में वे बच्चों से उनका बचपन छीनकर उन्हें स्कूल, ट्यूशन, डांस क्लासेस, वीडियोगेम आदि में व्यस्त रखते हैं, जिसके कारण बच्चा अपने घर के चारदीवारी में ही दुबककर अपना स्वछन्द बचपन भूल कर संकुचित अवस्था में पहुंच जाता है जिसके कारण वह हमेशा अपने आप को डरा हुआ सा महसूस करने लगता है।
घर के बाहर की स्वछ हवा, बाग-बगीचे, अपने हम उम्र दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करना क्या होता है, उन्हें नहीं पाता होता है। ऐसे में अक्सर यह देखने मे आता है कि बच्चा दूसरे बच्चों से घुलने मिलने में झिझकता रहता है जिससे उसके अंदर खुलेपन एवं आजादी के भाव का उन्हें अहसास तक नही हो पाता है, हाँ नया वीडियोगेम कौन सा है या कौन सी नई एक्शन मूवी आई है, इस तरह की बातें इन बच्चों को बखूबी पता होता है।
आज के दौर में पढ़ाई-लिखाई अपनी जगह है, लेकिन बच्चों के साथ होने वाली परेशानियों को समझना और उनकी भावनाओं को समझ कर उनके साथ तदअनुसार व्यवहार करना ऐसे सभी बातों को आज के दौर में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिये और जो आज बच्चे हैं वे आगे आने वाले दिनों में यौवन अवस्था मे पहुंच जायेंगे और उन बच्चों का बचपन दोबारा लौटकर नहीं आयेगा। कम से कम इस उम्र में तो आप उन्हें खुलापन दें और उन्हें उन्मुक्त भावना का अहसास कर अपने बाल्यावस्था का सम्पूर्ण आनन्द उठाने दें।







