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    Home»बच्चों की दुनिया

    कवि बौड़म और पाण्डुलिपि की खोज

    By April 26, 2018 बच्चों की दुनिया No Comments38 Mins Read
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    अरविन्द कुमार साहू

    कवि बौड़म ने किताबें खरीद कर पढ़ने की अच्छी आदत कभी नहीं डाली। वह ज़्यादातर माँगकर लाता था। कभी –कभार चुराकर भी किताबें पार कर देता था। वैसे भी उसके ज़्यादातर दिन कड़की भरे ही बीतते थे। सच पूछिए तो इस मंहगाई मे किताबें खरीदने की उसकी कभी औकात ही नहीं हुई। लेकिन पढ़ने का अच्छा शौक भरपूर बना हुआ था। उसे पढ़ने को कुछ न कुछ जरूर चाहिए होता था, वरना उसका हाजमा खराब हो जाता था। अब किताबें माँगकर ले जाना तो ठीक है , लेकिन उन्हें वापस न लौटाने की उसकी बीमारी बहुत खराब थी।इसका कारण यह था कि उन्हीं किताबों को बाद मे किसी बेचकर या फिर रद्दीवाले को देकर वह अपने कई खर्चे निकाल लेता था। सो, अधिकांश परिचितों ने उसे किताबें देना ही बंद कर दिया।

    उधर किताबों की दुकानों पर लगे सीसी टीवी कैमरों ने चोरी की गुंजाइश भी खत्म कर दी थी। सो, बौड़म ने आजकल एक पुराने और सड़ियल टाइप के खानदानी पुस्तकालय की शरण ले ली थी। इस पुस्तकालय का भवन काफी जर्जर और किताबों का रख – रखाव बेहद खराब था। यहाँ का मालिक और संचालक लाइब्रेरियाँ कम कामेडियन ज्यादा लगता था। सो कवि बौड़म भी वहाँ पढ़ता कम , बकैती ही ज्यादा करता था। शुरुआत मे वहाँ के लाइब्रेरियन बाबू पर अपना प्रभाव जमाने के चक्कर मे बौड़म ने अपनी ऊट पटांग कविताएं सुना – सुना कर उसे पका डाला। सो, उस बाबू ने बौड़म की कविताओं से अपना पिंड छुड़ाने के लिए उसको लीक से हटकर जूनियर जेम्स बॉन्ड की जासूसी कॉमिक्स व वेदप्रकाश शर्मा के जासूसी उपन्यास व कहानियाँ पढ़ने का चस्का लगा दिया।

    अब हुआ ये कि उस बाबू ने बौड़म की कविताओं से तो अपना पिंड छुड़ा लिया , लेकिन बौड़म को कविता के साथ ही जासूसी का शौक चढ़ा दिया। बौड़म छिद्रान्वेषी होने लगा। छोटी – छोटी बातों पर कविता के बजाय जासूसी पेंच गढ़ने लगा। पढ़ने वाले चश्मे की जगह खुर्दबीन लेकर घूमने लगा। सिर पर गांधी टोपी की जगह एक कटी – फटी हैट और शरीर के देशी कुर्ता पाजामे के ऊपर एक पुरानी कई जेबों वाली जैकेट चढ़ गई | परिणामतः कवि बौड़म उन लाइब्रेरियन बाबू को अपनी घिसी – पिटी कविताओं की जगह बेसिर – पैर के जासूसी कारनामों से भी पकाने लगा। वह दावा करने लगा कि किसी भी छोटे – मोटे केस को वह चुटकियों मे हल कर सकता है।

    बहरहाल, एक दिन कवि बौड़म जब रोज की तरह अपने घर से पुस्तकालय की ओर निकलने ही वाला था। तभी उसने लाइब्रेरियन बाबू को स्वयं अपने घर की ओर तूफान मेल की तरह आते देखा। वही थुल – थुल करती चर्बी चढ़ी काया , सफ़ेद कुर्ता – पाजामे का सूती और मटमैला ड्रेस , उस पर पड़ी मुँह मे भरे हुए पान की लाल – लाल बेतरतीब छींटे। एक चैन के सहारे नाक पार अटका हुआ गोल फ्रेम का गाँधी चश्मा , जो उनका ब्राण्ड बन गया था। घिसटती हुई हवाई चप्पल पर डंडे की तरह लहराती हुई टाँगें। बौड़म ने दूर से ही झट पहचान लिया, वो हूबहू वही थे। लेकिन वो सोचने लगा कि दिन चढ़े ही ताबड़तोड़ कदम बढ़ाते हुए ये इधर क्या करने चले आ रहे हैं ?

    बौड़म कुछ और सोचता या समझ पाता , उसके पहले ही लाइब्रेरियन बाबू उसके दरवाजे तक पहुँच गए। उन्होने कमरे के अंदर दाखिल होने के लिए अपना कदम बढ़ाया ही था कि एक ‘धड़ाम sssss की जोरदार आवाज हुई। जैसे किसी आतंकवादी ने बौड़म के घर मे बम विस्फोट कर दिया हो। …..और फिर “हाय मैं मरा ….. बुहूहूहू…. ” की करुण आवाज से उस पुराने कमरे की दीवारें हिल गई। मानो कोई छोटा – मोटा भूकम्प आ गया हो। – “ ये चीख की आवाज तो शायद पढ़ाकू बाबू की है ?” आवाज का अनुमान करते हुए बौड़म फौरन दौरवाजे की ओर लपका। देखता क्या है कि लाइब्रेरियन बाबू बिना किसी लाग लपेट के साष्टांग प्रणाम की मुद्रा मे मुँह के बल औंधे गिरकर धराशायी हो चुके हैं। कराहने व अजीब सी बेसुरी रोने की आवाज़े उन्ही के गले से बड़ी मुश्किल से निकल रही थी। घर के भीतर घुसने की जल्दबाजी मे वे पुरानी और ऊँची ड्योढ़ी से अटक कर अनायास ही भरभरा कर गिर पड़े थे।

    आगंतुक की दुर्दशा देख बौड़म का कवि हृदय जलती हुई मोमबत्ती की तरह पिघल गया। परिणामतः, किसी दयालु व्यक्ति की तरह वह तत्काल अपने शरणागत की रक्षा के लिए तत्पर हो उठा। बेहद फुर्ती दिखाते हुए उसने अपनी कमजोर और सींकिया बाहें फैलायी। उन्हे उठाने के प्रयास मे तेजी से नीचे झुका। लाइब्रेरियन बाबू की बाहें पकड़ कर ऊपर की ओर खींचने की कोशिश की।लेकिन हड़बड़ी मे वह अपना स्वयं का भी वजन संभाल न पाया और लाइब्रेरियन बाबू के ऊपर ही लुढ़कता चला गया। – ‘भडामssss’ परिणामतः लाइब्रेरियन बाबू की एक और दर्द भरी चीख कमरे की दीवारों को सुन्न करती चली गई। – “ हाय – हाय , मार डाला रे ssss पापड़ वाले को।”

    “आँय… अरे ! ये क्या हुआ पढ़ाकू बाबू ?”– किसी तरह खुद को संभाल कर उठाने के बाद बौड़म ने बड़े प्यार से उन्हें भी सहारा देकर उठाते हुए पूछा। “ हुआ क्या खाक ? तुम्हें दिख नहीं रहा या समझ नहीं आ रहा ?” – पढ़ाकू बाबू किसी फुस्स हुए पटाखे की तरह फट पड़ने की कोशिश करते हुए बोले। लाइब्रेरियन बाबू को कवि बौड़म प्यार से पढ़ाकू बाबू ही संबोधित करता था। क्योंकि वो लाइब्रेरी के रख रखाव मे भले ही ज्यादा रुचि नहीं ले पाते थे, किन्तु अपना टप्पे जैसा चश्मा लगाए ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ने की कोशिश मे जरूर लगे रहते थे।

    बहरहाल , बौड़म की चिकनी चुपड़ी बातों का उन पर कोई असर पड़ता नहीं दिखा। बल्कि वो तो सहानुभूति के दो बोल सुनते ही बौड़म पर पूरी ताकत लगाकर फिर से फट पड़े – “ अमां , लानत है बौड़म मियाँ ! किसी के इस्तक बाल यानी स्वागत सत्कार का ये कौन सा तरीका है ? अमां , तुम्हें रहने के लिए बाबा आदम के जमाने की यही दड़बानुमा हवेली मिली थी, जिसे तुम घर कहते हो।….और मिली भी थी , तो कम से कम ये मनहूस ड्योढ़ी को तो बदलवा देते। अगर इसे तुमने फर्श के बराबर करवा दिया होता तो कम से कम इस समय मेरी ये हालत नहीं होती।” उनकी आवाज मे दर्द के साथ – साथ शिकायत और गुस्से की मात्रा भी अच्छी – ख़ासी थी।

    “ओहो , अब गुस्सा छोड़ो भी पढ़ाकू बाबू और ये बोलो कि कहीं ज्यादा चोट तो नहीं लगी ? ठहरो मैं पानी और कोई दवा लेकर आता हूँ।” – कहते हुए कवि बौड़म भीतर की ओर पलटा तो पढ़ाकू बाबू फिर फट पड़े। उसी पिनक मे चीखते – कराहते हुए बोले – “क्या समझते हो कि चोट मेरे दिल – दिमाग या गुर्दे तक पहुँच गई है ? अरे , इतने से मुझे कुछ नहीं होने वाला। मैंने भी वैद्य झड़ी-भूटी लाल की लिखी सेहत सुधारने की सैकड़ों किताबें पढ़ रखी है समझे ? अरे ! तुम्हारे जैसों की किताबी लत का खयाल न होता तो आज मैं भी कोई खांटी हकीम होता , हूँह ! बड़े आये दवा लाने वाले। अब भी मेरे लिए कुछ करना ही है तो पहले इस ड्योढ़ी को ठीक करवा लो।”

    उनका दर्द भरा पारा और चढ़ते देख बौड़म को आत्म समर्पण करना पड़ा। मिमियाते हुए बोला – “हाँ , हाँ । मैं जानता हूँ , मैंने आपको पढ़ाकू बाबू जैसा नाम यूँ ही थोड़े दे रखा है। आपकी हर काबिलियत का लोहा मानता हूँ। आपके ज्ञान को प्रणाम करता हूँ। आखिर , आप भी अंग्रेजों के जमाने के लाइब्रेरियन ऐसे ही थोड़े हैं।” लल्लो – चप्पों वाली इस चाशनी भरी बोली से पढ़ाकू बाबू कुछ नार्मल हुए तो बौड़म ने फिर पुचकारा – “ अब गुस्सा थूकिए भी बाबू जी ! चलिये , ये तो बताइये कि आपने अपने कृशकाय चरण कमलों को इधर का कष्ट क्यों दे दिया ? जबकि आपको पता था कि मैं उधर बस पहुँचने ही वाला था।”

    अब तक पढ़ाकू बाबू उठकर बैठ चुके थे। थोड़ा संयत होते हुए बोले – “ हाँ मुझे पता था ,लेकिन बात ही कुछ ऐसी थी कि मुझसे देर करना बर्दाश्त नहीं हुआ। तुमसे तत्काल बताना बहुत जरूरी हो गया था।”
    “ऐसा भी क्या हो गया ?” – कवि बौड़म की उत्सुकुता अचानक ही बहुत बढ़ गई थी।
    “अब क्या बताएँ बौड़म जी ? दरअसल , वो जो अपने यहाँ एक बहुत पुरानी कविताओं की एक पाण्डुलिपि थी न ? ….वह अचानक गायब हो गई है। कल से एकदम लापता हो गई है।”
    कवि बौड़म जैसे आसमान से गिरा – “कौन ? वही स्वामी भड़भड़ा नन्द जी वाली …. जो अवधी बोली मे लिखी हुई थी? जिसका मै खड़ी हिन्दी मे अनुवाद करने की योजना बना रहा था ?”

    “हाँ हाँ , वही पाण्डुलिपि है बौड़म जी।उसका अनुवाद आप जैसे किसी बौड़म कवि से करवाना मेरा बहुत पुराना सपना था। जो अब लगभग टूट चुका है।” – पढ़ाकू बाबू का यह दर्द ड्योढ़ी पर लगी चोट से भी कई गुना ज्यादा जान पड़ता था, जो अब उनके दिल से निकलकर सीधा बौड़म के दिल मे घुस गया था। इस दर्द की अधिकता व गंभीरता से बौड़म के माथे पर भी पसीना चुहचुहा आया। मर्मांतक पीड़ा की रेखाएँ अचानक ही उसके चेहरे पर भी साफ – साफ पढ़ी जा सकती थी।

    बौड़म कुछ देर तक दर्द के गहरे सागर मे मन ही मन विचारों का चप्पू चलाते हुए डूबता उतराता रहा। जब किनारा मिलता न दिखा तो उसके मन मे उसकी ही रची हुई एक साहस भरी कविता की कुछ पंक्तियाँ हलचल मचाने लगी – “बौड़म वह डगमगाती नैया ही क्या , जो पार लगने से पहले बह जाय। वह लम्बी सी मोमबत्ती ही क्या , जो रात ढलने से पहले गल जाय ? वह बड़ी से बड़ी समस्या ही क्या, जो सुलझाने से पहले ही हल हो जाय। वह पाण्डुलिपि की चोरी ही क्या , जो जासूस बने बौड़म की छानबीन से बच जाय।” फिर अचानक उसकी विचारों वाली डूबती नैया किसी किनारे जा लगी। फिर वह किसी धीर गंभीर कवि की तरह बोला – “ पढ़ाकू बाबू ! चिन्ता मत करिए। हमीं ने दर्द दिया है , हमीं दवा देंगे।”

    ये शेर सुनते ही पढ़ाकू बाबू का पारा सीधे सातवें आसमान पर पहुँच गया। बिना कुछ सोचे समझे लगे छाती कूट – कूट कर दहाड़ने – “क्या मतलब बौड़म जी ? क्या अपने ही वह पाण्डुलिपि चुराई है जो अब वापस कर देंगे ? मुझे कम से कम आपसे तो यह उम्मीद नहीं थी। ये क्या कर दिया आपने ? मुझे तो आपकी इस घोर कारस्तानी पर कुंटलों शर्म आ रही है। दुकानों से किताबे चुराने की आपकी आदत क्या कम बुरी थी , जो अपने लाइब्रेरी से पांडुलिपियाँ भी चुरानी शुरू कर दी ? उस पर भी तुर्रा यह कि उसे वापस करके पूरी ईमानदारी की क्रेडिट भी ले लेंगे। छिः , मुझे तो शर्म आती है, आपकी ऐसी ओछी सोच पर। हाय – हाय ! ये क्या सोचा था क्या हो गया ? जिसे मीठा आम सोचा था, वह खट्टा अमरूद बन गया। … बुहूहूहूssss।” वो किसी विधवा स्त्री की तरह हाथ – पाँव पटकते , छाती पीटते हुए रोते – कलपते ही चले जा रहे थे।

    “ अरे – अरे , पहले मेरी बात का सही मतलब तो सुनिये।” – बौड़म ने उन्हे चुप करने का प्रयास किया तो वे अपने हत्थे से और उखड़ने लगे।“ अरे क्या खाक सुने तुम्हारी। अब इस शेर के आगे और कहने सुनने को रख छोड़ा है तुमने ?” पढ़ाकू बाबू अचानक दोनों हाथ ऊपर करके पागलों की तरह गाते हुए चीखने लगे – “ देख तेरे संसार की हालत , क्या हो गई भगवान ? कितना बदल गया इंसान ? कविता न बदली , पढ़ाकू न बदला , बौड़म हुआ बेईमान। हाय – हाय रे ! कितना बदल गया इंसान ?”

    एक प्रसिद्ध भजन के इन बोलों की ऐसी दुर्गति पूर्ण प्रस्तुति देखकर कवि बौड़म को समझते देर न लगी कि ये पढ़ाकू जी उससे भी बड़े बौड़म हैं। जो किसी गलत फहमी के शिकार होकर बिना सोचे समझे, बिना दही – नमक का रायता फैलाते ही चले जा रहे हैं। अचानक ही फैलते जा रहे इन पढ़ाकू जी को तत्काल चुप करना जरूरी था। वरना , अभी ये हो हुल्लड़ सुनकर मुहल्ले वाले भी पहुँच आयेंगे और बात का बतंगड़ बनाना शुरू कर देंगे।  लेकिन पढ़ाकू जी कई कोशिशों के बाद भी वह सीधे से मान ही नहीं रहे थे | तब…. ? …..क्या करें , …क्या करें ? सोचते – सोचते अचानक कवि बौड़म ने वहाँ रखा एक पका हुआ आम का फल उठाया और जल्दी मे सीधे पढ़ाकू जी के खुले मुँह मे ठूँस दिया।

    “ढुबक – ढुबक… , – अचानक ही पढ़ाकू जी का भट्ठे जैसा खुला हुआ मुँह दो तीन हिचकियों के साथ ही ‘फुल स्टाप’ हो गया। बौड़म भुन्नाते हुए बोला – “तेरे इस पागलपन की अब दूसरी दवा क्या है ?”

    “गूं – गूं SSSsss ” – पढ़ाकू जी चीखने और मुँह खुलवाने की असफल कोशिश करते हुए फड़फड़ाने लगे। बौड़म जल्दी से बोला – “ पहले मेरी बात ध्यान से सुनो। मेरी शायरी का वह मतलब नहीं था जो तुमने कूद कर अपनी मोटी बुद्धि से निकाल लिया। अरे , मेरे कहने का मतलब यह था कि मेरी वजह से वह पाण्डुलिपि बंद अलमारी से निकलकर बाहर आयी थी न ? अब मैं ही उसे अपनी जासूसी खोपड़ी से खोजकर वापस भी ले आऊँगा। समझे….?”

    ये सुनते ही पढ़ाकू बाबू की बन्द खोपड़ी का ताला भक्क से खुल गया। फटाफट बौड़म की बात से सहमति मे ऊपर नीचे सिर हिलाने लगे। साथ ही मुँह मे ठूँसा हुआ आम भी वापस निकालने का इशारा करने लगे। तब बौड़म ने उनके हलक मे धीरे से हाथ डालकर वह आम वापस खींच लिया। दो तीन बार ‘हुच्च – हुच्च’ करके पढ़ाकू बाबू थोड़ा संयत हुए तो फिर बौड़म को डाँटने लगे – “ये बात मुझे पहले नहीं बता सकते थे ? खामखाँ मेरे पान का मजा किरकिरा कर दिया …..।” फिर बौड़म के हाथ से अपने मुँह का उगला हुआ आम छीनकर बड़े प्यार से बोले – “……..और साथ मे इस प्यारे से मीठे आम का भी। लाओ , पहले इसी से थोड़ा गला तर करता हूँ ।” ….और फिर किसी हबशी की तरह पढ़ाकू बाबू उस आम को नोचने – खसोटने लगे। उनके मुँह पर पान की लाली के साथ ही आम का पिचपिचा रस फैलने लगा , जो अब अजीब सी वितृष्णा पैदा करने लगा था। लेकिन मामला संभलते देख कवि बौड़म के होठों पर मुस्कान आ रही थी।
    जब आम पूरी तरह निचुड़ कर सिर्फ गुठली रह गया तो पढ़ाकू बाबू ने स्वाद से भरपूर संतुष्टि वाली जोरदार डकार मारी। फिर कवि बौड़म से बोले – “ तो चले भाई लाइब्रेरी की ओर ? आखिर पाण्डुलिपि की खोज के नेक काम मे भी अब देरी ठीक नहीं ?” उनकी जबान मे आमरस से उपजी अजीब सी मिठास भर आई थी , जिससे कवि बौड़म काफी राहत महसूस कर रहा था। उसने मुसकुराते हुए कहा – “ इस नामुराद आम की गुठली को आपके शातिर पंजों से आजादी मिले तब तो आगे बढ़ें।”

    “ हें हें हें हें sssss ” – पढ़ाकू बाबू ने अजीब सी हँसी हँसकर उस गुठली को बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखा। आखिरी बार उसे दांतों से भींचकर जी भर कर चूसा और फिर बड़े बेमन से अपने कुर्ते की एक जेब मे डालते हुए बोले – ‘ चलो भाई ! ये लालच भी न , इंसान को बड़ा स्वार्थी बना देती है। सोच रहा हूँ अब इस गुठली से कुछ और मजा न मिला तो इसे सुखाकर कूट लूँगा। सुना है इसका चूर्ण पेट दर्द मे बड़ा फायदे मंद होता है।” बौड़म ठहाका लगा कर बोला – “हाँ भाई हाँ , आखिर इसे ही तो आम के आम और गुठलियों के दाम कहते हैं।” जवाब मे पढ़ाकू बाबू भी ही-ही करके हँस दिये। इसके बाद दोनों लाइब्रेरी की ओर आगे बढ़ चले।

    थोड़ा आगे बढ़ते ही अचानक बौड़म को कुछ याद आया – “ अरे पढ़ाकू बाबू ! मैं जल्दबाज़ी मे एक जरूरी चीज तो भूल ही गया। आप थोड़ी देर यहीं खड़े रहिए। मैं दौड़कर दो मिनट मे अपनी खुर्दबीन या आतिशी शीशा ले आता हूँ। उसके बिना सही मौका मुआइना नहीं हो पाएगा।” इतना कहकर बौड़म सरपट घर की ओर भागा।
    “हाँ हाँ ठीक है , ले आइए।”

    और सचमुच थोड़ी ही देर मे सारे खटारा , टूटे – फूटे जासूसी उपकरणों के साथ बौड़म पुस्तकालय के गेट पर हाजिर था।ये सारी चीजे उसने इस पुस्तकालय से ही पार की हुई कुछ बेकार किताबों के बदले अपने कबाड़ी से बदल कर लिए थे। पढ़ाकू बाबू को ये मामला भी पता चल गया होता तो उनका हार्ट अटैक होने से कोई नहीं रोक सकता था। बहरहाल, खुशी की बात ये थी कि आज इसका उद्घाटन भी उन्ही की लाइब्रेरी से हो रहा था।

    लाइब्रेरी के पास पहुँचकर बौड़म ने बड़े ध्यान से किसी खाँटी जासूस की तरह पहले आस – पास का मुआइना किया। फिर गंभीर होते हुए बोला – “पढ़ाकू बाबू ! इससे पहले कि मैं अपना काम शुरू करूँ , मुझे आप से कुछ निहायत जरूरी और गंभीर सवालों के जवाब चाहिए।” पढ़ाकू बाबू के कदम यह सुनते ही जहाँ के तहाँ अटक गए। शंकालु दृष्टि से कवि बौड़म को देखते हुए बोले – “ हाँ हाँ पूछिए। यही तो एक अच्छे और सच्चे जासूस के लक्षण होने चाहिए। मुझे खुशी है कि तुमने मेरे पढ़ाये हुए कॉमिक्स और कहानियों से सचमुच बहुत कुछ सीख लिया है।” अपनी प्रशंसा सुनकर बौड़म का सीना फूल कर छप्पन इंच का हो गया। वह और उत्साह मे आ गया। पूछताछ शुरू करते हुए बोला – “ हाँ तो पढ़ाकू बाबू ! मेरे सवालों को काफी ध्यान से और गंभीरता पूर्वक सुनिए , फिर काफी सोच समझ कर पूरी ईमानदारी और नेक नीयती से उसका उत्तर दीजिये।”

    “जी पूछिए……” – पढ़ाकू बाबू की घुटी घुटी सी धीमी आवाज उनके कंठ से बड़ी मुश्किल से निकली। लगा कि वे किसी मुलजिम की तरह , किसी कोर्ट मे , किसी सख्त सजा देने के लिए मशहूर , किसी गुस्सैल जज के सामने , किसी कटघरे मे खड़े है। मानो पाण्डुलिपि की चोरी का इल्जाम सीधा उन्ही पर लगा हुआ है | बौड़म के भीतर से मानो किसी मँजे हुए विदेशी जासूस की आत्मा बोल रही थी – “ हाँ तो पढ़ाकू बाबू ! पहले ये बताइये कि आप इस लाइब्रेरी मे कितने दिनो से काम कर रहे हैं ?”

    “ये ….ये….. कैसा सवाल है ? क्या आप मुझ पर ही शक कर रहे हैं ?” – पढ़ाकू बाबू कुछ भड़कने को हुए तो बौड़म ने उन्हे डपटने के अंदाज मे कहा – “ चुप करिए और सीधे – सीधे मेरे सवालों का जवाब दीजिये। ….और हाँ यह भी सुन लीजिये कि जासूसी का पहला सिद्धान्त यही है कि हर शख्स पर शक की सुई रखो। बाल की खाल खींच लो। एक छोटा सा क्लू या सुराग भी हमे अपनी मंजिल तक बड़ी आसानी से पहुंचा सकता है। समझे ?”

    पढ़ाकू बाबू को अब लगा कि उनका ऊँट सचमुच किसी पहाड़ के नीचे आ गया है। इसकी बात मानने मे ही भलाई है। वरना अपना ज्ञान परोस – परोस कर उनका हाजमा बिगाड़ देगा। किसी बकरे की तरह मिमियाते हुए बोले – “मैं ss मैंsssss यहाँ बचपन से काम कर रहा हूँ। ये लाइब्रेरी मेरे बाप – दादा ने शुरू की थी भाई। अरे खानदानी लाइब्रेरियन हूँ ।” ये कहते हुए पढ़ाकू बाबू का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। इस रुतबे का तत्काल असर बौड़म पर भी पड़ा। उनके सम्मान मे उसका अगला सवाल थोड़ा मुलायम हो गया।
    – “हूँ … तो इसकी पूरी देखभाल सिर्फ और सिर्फ आपके ही जिम्मे है ?”
    “जी हाँ , इसमे कोई शक नहीं है।”

    “आपके अलावा और कितने कर्मचारी काम करते हैं इसमे ? – बौड़म का दूसरा सवाल फिर भभकता हुआ ही था।
    “अरे कोई और नहीं भाई ! कहा तो कि मैं इकलौता ‘वन मैन टीम’ ही यहाँ का सब कुछ हूँ। अरे नई कितबे खरीदने के पैसे तो हैं नहीं मेरे पास। कोई कर्मचारी रखकर उसे तनख्वाह कहाँ से दूँगा ? तुम तो खुद इतने दिन से यहाँ आकर देख रहे हो।” – अपनी आर्थिक हालत पर पढ़ाकू बाबू को मानो रोना आ गया। कवि बौड़म ने उनकी दुखती रग पर शायद ज्यादा ज़ोर से हाथ रख दिया था। बिना पूछे ही आगे बताते चले गए – “इसी तंगहाली की वजह से तो आज तक मेरा विवाह भी नहीं हो पाया। अब यह पाण्डुलिपि भी न मिली तो अपनी बाप – दादों की संपत्ति खोने के अफसोस मे कुँवारा ही स्वर्ग सिधार जाऊंगा। बुहूहूहू ….।” उनको मानो फिर से रोना आ गया था।

    “ अच्छा….अच्छा , चुप करिये , शांत रहिए। ये बताइये कि इस लाइब्रेरी मे और कितने लोग आते जाते हैं ?”
    “ …और कितने लोग ? अमां मियाँ ! लोगो को पढ़ने का शौक भी रह गया है कहीं ? ये तो कहो तुम्हारे जैसा एकाध बंदा इस दुनिया मे अभी जिंदा है , जिसने मुझे भी जीने का मकसद दे दिया है। वरना पिछले अनेक वर्षों से मैं यहाँ अकेला ही मक्खियाँ मारता रहा हूँ ।” – पढ़ाकू बाबू का सब्र छलकता ही जा रहा था। लगता था कि अब लाउड स्पीकर छाप भों – भों करके रोना बस शुरू ही करने वाले है।

    आखिर कवि बौड़म ने मामले को थोड़ा हल्का बनाने की गरज से सवालों का सिलसिला स्थगित कर दिया। कहने लगा – “ कोई बात नहीं। लगता है ज्यादा सवालों से कोई लाभ भी नहीं होगा। चलिये , इसके बाद मौका मुआइना भी कर लेते हैं।”
    “हाँ हाँ चलिये। मैं ताला खोलता हूँ।”

    पढ़ाकू बाबू आगे बढ़े। काफी देर तक चाबी के साथ किचिर – पिचिर करने बाद बड़ी मुश्किल से जंग लगा हुआ ताला खुला। फिर ज़ोर के धक्के के साथ उसका भारी दरवाजा भी चूँ चर्र करते हुए धकेल कर खोला गया। अभी दोनों ने भीतर कदम रखने के लिए अपना पैर बढ़ाया ही था कि एक बड़ा सा काले रंग का चमगादड़ झपट्टा मारकर उनसे टकराया फिर हड़बड़ाकर उनके सिर के ऊपर से निकल भागा।- “हें हें हें हें , चमगादड़ है जी। यहाँ का पुराना निवासी है। इसे दिन मे दिखता नहीं है। इसीलिए हमसे टकरा गया।” पढ़ाकू बाबू खीसे निपोरते हुए बोले। हालाँकि अचानक हुई इस घटना से दोनों हड़बड़ा कर एक दूसरे पर गिरते – गिरते बचे थे। एक कदम पीछे हटते हुए पढ़ाकू बाबू बोले – “ लगता है कुछ अशुभ घटने वाला है। हम थोड़ा रुककर भीतर चलते हैं।”

    बौड़म बोला – “तो आप इतने पढ़ – लिख कर भी अंधविश्वासी ही रह गए। चलो कोई बात नहीं। आप को खड़े रहना है तो खड़े रहिए। मैं भीतर जा रहा हूँ। बौड़म किसी शुभ घड़ी की प्रतीक्षा नहीं करता। बल्कि शुभ घड़ी हमेशा बौड़म की प्रतीक्षा करती रहती है। समझे ? ”

    बौड़म किसी चतुर चालक जासूस की तरह भीतर घुसा। नीचे झुककर अपनी खुर्दबीन से एक – एक खाली जगह पर पड़े निशानों की समीक्षा करते हुए आगे बढ्ने लगा। पीछे – पीछे पढ़ाकू बाबू भी मजबूरन घुसते आए। उनका दिल ज़ोरों से धाड़ – धाड़ करके बज रहा था। उनके चेहरे पर सुबह के दस बजने से पहले ही बारह बजते हुए दिखाई पड़ रहे थे। उनके मन का वहम कम करने की गरज से बौड़म ने उनसे आगे बातचीत करनी शुरू कर दी – “ .. …लेकिन एक बात और बताइये पढ़ाकू बाबू ! अभी तो आपने कहा था कि यहाँ आपके अलावा कोई और नहीं रहता। फिर ये चमगादड़ कहाँ से आ गया ?”

    पढ़ाकू बाबू रोनी सी सूरत बनाते हुए कहने लगे – “अरे भाई , मेरा मतलब था कि यहाँ मेरे अलावा कोई दूसरा इंसान नहीं रहता है | अरे ! चींटी , मक्खी , दीमक , चूहे , बिल्ली , चमगादड़ आदि ….. , इन सबको हम कहाँ तक रोक सकते है? पुरानी बिल्डिंग है। ये सब तो आते जाते ही रहते हैं।”

    अचानक बौड़म फर्श के धूल पार कुछ पंजों के निशानों पर गौर फरमाता हुआ बोला – “यहाँ पर किसी बड़ी बिल्ली के घुसते हुए पंजे नजर आ रहे हैं।आखिर ये बिल्ली भीतर घुसी ही क्यों है ? उसके लिए यहाँ दूध मलाई तो रखी नहीं रहती।” – बौड़म ने खुर्दबीन से उसके पंजों के निशान का मुआइना करते हुए पूछा।
    “क्या बात करते हैं बौड़म जी ! दूध मलाई तो खुद मैंने भी महीनों से नहीं चखा।” – पढ़ाकू बाबू अपने होंठों पर जीभ फिरते हुए बोले।

    “तब आखिर ये बिल्ली यहाँ क्यों घुसी ? यहाँ उसने बच्चे तो नहीं दे रखे ?….और अगर ऐसा है तो आपको फौरन ‘बच्चों का पालन पोषण कैसे करें ?’ नामक किताब चेक करे। हो सकता है वह यहाँ यही पढ़ने आयी हो।….और अगर नहीं भी आयी तो आपको खुद ये किताब उसे पढ़ने के लिए दे देनी चाहिए।”

    “हें हें हें हें SSSSS , आप भी अच्छा मज़ाक कर लेते हैं बौड़म जी।” – पढ़ाकू बाबू फिस्स से हँस कर रह गए तो बौड़म ने मानो उनको डांट दिया – “ ये हंसने की बात नहीं है। आखिर बिल्ली यहाँ किसी न किसी वजह से ही आयी होगी। उसके साथ ही किसी और जीव के पंजों के निशान दिख रहे हैं। जरा गंभीरता से सोचिए पढ़ाकू बाबू ! कुछ अकल भी खर्च करिए न…। मुझे ये मामला भी संदिग्ध लग रहा है।” बौड़म ने अगले पदचिन्हों का मुआइना करते हुए कहा।
    पढ़ाकू बाबू सचमुच गंभीर हो गए। अपना भी सिर भी उसी खुर्दबीन मे घुसेड़ने की कोशिश करते हुए बोले – “ कुछ सुराग मिल रहा है क्या बौड़म जी ?”

    “तब क्या , मैं यहाँ सिर्फ तफरीह करने के लिए सर खपा रहा हूँ ?” – बौड़म ने थोड़ा भाव खाकर कहा।
    “बताइये जल्दी , मुझे भी बताइये ” – पढ़ाकू बाबू अधीरता से बोले।

    “अरे ये खोपड़ी खुर्दबीन से दूर करिए और धैर्य भी रखिए। यूं बच्चों की तरह मचलना आपको शोभा नहीं देता।” – बौड़म ने एक बार फिर उन्हे डपटने के अंदाज मे कहा तो पढ़ाकू बाबू किसी भीगी बिल्ली की तरह दुबक कर पीछे हट गए।
    “ ये , ये …. अरे ये क्या है ? कुछ जाना – पहचाना सा लगता है।” बौड़म किसी चीज पर निगाह टिकाते हुए बोला। लेकिन इस बार पढ़ाकू की कुछ बोलने की हिम्मत न पड़ी कि कहीं बौड़म उन्हे फिर न डपट दे। वे काफी देर तक चुप ही रहे तो बौड़म ने ज़ोर से डपट कर कहा – “ आपसे ही अब मैं कुछ पूछ रहा हूँ तो सुन नहीं रहे हैं। वैसे तो बहुत पकर – पकर कर रहे थे।”

    “आँय , भला क्या है दिखाइए तो …?” – पढ़ाकू बाबू जैसे नींद से जागकर सिटपिटा उठे। बौड़म ने एक छोटी चिमटी से किसी मँजे हुए जासूस की तरह एक नन्हें कागज का टुकड़ा बड़ी सावधानी से उठाया और उसे पढ़ाकू बाबू की आँखों के सामने किसी सरप्राइज़ की तरह लहराने लगा।

    “क्या है ये ?’ – पढ़ाकू बाबू अपनी ऐनक को नाक पर ठीक करते हुए मिचमिची आँखों से देखने की कोशिश करने लगे। लेकिन दिमाग पर काफी ज़ोर डालने के बावजूद उन्हे कुछ समझ मे नहीं आया। वह टुकड़ा था ही इतना छोटा , जिसे खुर्दबीन से ही देखा जा सकता था और पतली नुकीली चिमटी से ही पकड़ा जा सकता था। अब उनके पुराने चश्मे मे इतना दम कहाँ रह गया था ? बेचारे धूप मे बैठे अन्धे उल्लू की तरह बस बौड़म को ताकते रहे।

    अब बौड़म ने शेख़ी बघारी – “बहुत बड़ा सुराग मिला है पढ़ाकू बाबू । हो न हो , ये उसी पुरानी पाण्डुलिपि जैसे कागज का टुकड़ा है , जो किताबों के रखरखाव के प्रति आपकी घोर लापरवाही साफ दर्शा रहा है …। आखिर आप इतनी बड़ी लापरवाही कैसे कर सकते हैं पढ़ाकू बाबू ? आपके होते हुए पुरानी किताबों के पन्ने यहाँ – वहाँ कैसे भटक रहे हैं ? हो न हो , उस पाण्डुलिपि के साथ भी कोई ऐसा ही हादसा हुआ होगा ।”

    “नहीं ssssss।” हादसे की बात से पढ़ाकू बाबू बेसाख्ता चीख पड़े। बौड़म ने लपक कर उनका मुँह दबाकर चुप कराया – “अरे थोड़ा धैर्य रखिए , पहले भी समझा चुका हूँ । मुझे और खोजने दीजिये। बाद मे इकट्ठा हाय तोबा मचा लेना।” उसकी खुर्दबीन फिर अपने काम मे मगन होकर आगे बढ्ने लगी। थोड़ी ही देर बाद बौड़म फिर चीखकर बोला – “ हे हे , …..ये…..मारा ssss। मिल गया … पकड़ लिया रे।”
    “अब क्या मिला ?”
    “ये देखो , वही है वही।”
    “अरे वही क्या ? बौड़म जी !”
    “अरे उसी पांडुलिप वाले कागज के टुकड़े का बड़ा भाई। यानी उसी का थोड़ा और बड़ा टुकड़ा। मेरी खोज सही दिशा मे आगे बढ़ रही है।”- बौड़म खुशी से चीखता हुआ बोला।

    लेकिन पढ़ाकू बाबू के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी – “ बौड़म बाबू ! अगर ये सचमुच उसी पाण्डुलिपि के कागज का टुकड़ा है तो फिर ये छोटे – छोटे टुकड़े – टुकड़े मे क्यों मिल रहा है ? कहीं उसके साथ सचमुच कोई अनहोनी तो नहीं हो गई ? बुहूहूहू…..।” उनका मन दहाड़ें मार कर रोने का हो रहा था।
    “अरे चुप करिये जी। बात – बात मे बच्चों की तरह पिनिक्की बहाने लगते हैं। ये अपनी पानी जैसी बहती हुई पतली नाक का रस और बेवजह के आँसू किसी और दिन के लिए संभाल कर रखिए पढ़ाकू बाबू।”
    “क्या करूँ ? तुम्हारी हर खोज के साथ मेरा दिल और भावुक होने लगता है। मुझे माफ कर दो।”

    बौड़म की खुर्दबीन धूल मे कुछ निशान या सबूत की तलाश मे तेजी से आगे बढ़ती जा रही थी। अचानक बिल्ली के पंजों के साथ ही उसे एक प्रकार के निशान और दिखे – “…..और अब ये देखो …ये किस जीव के निशान हैं ?” “क्या है, क्या है ?” – पढ़ाकू बाबू ने फिर से बौड़म के साथ ही जमीन मे सर घुसा कर जानने – समझने की कोशिश किया, लेकिन सफलता न मिली। वो इस गुत्थी को अभी सुलझा भी नहीं पाये थे कि उन्हें थोड़ी दूर पर कुछ लाल रंग के धब्बे दिखाई दिये। बौड़म चिहुँक उठा – “अब ये क्या है ? कहीं खून तो नहीं ?” खून का नाम सुनते ही पढ़ाकू बाबू की घिग्घी बंध गई। उनके मुंह से अबकी कुछ बोल ही न फूटा।

    बौड़म ने पास जाकर ध्यान से मुआइना किया तो खुद भी डर के मारे उछल गया। चीखते हुए कहने लगा – “ ये खून ही है। सचमुच का खून। लगता है थोड़ी ही देर पहले यहाँ किसी का खून हो गया है।”
    “क्या सचमुच ऐसा हो गया है ? ऐसी किताबों के लिए खून तो मैंने जेम्स हेडली चेज़ के उपन्यासों मे ही होते हुए पढ़ा है। लेकिन यहाँ …. मेरी लाइब्रेरी मे …..? हे भगवान ! ये कैसी अशुभ घटनाएँ हो रही है ? अब तो लगता है पुलिस केस होकर रहेगा। बौड़म जी ! कहीं पुलिस मुझे ही इस खून के आरोप मे गिरफ्तार न कर ले ? हाय – हाय अब मेरा क्या होगा ? मेरे जेल जाने के बाद इस लाइब्रेरी का क्या होगा ?” – पढ़ाकू बाबू की पिनिक्की इस बार कुछ ज्यादा जोरों से बह निकली थी।
    “चुप करो पढ़ाकू बाबू ! पहले जांच पूरी तो होने दो। देखने समझने तो दो कि आखिर किसका खून हुआ है ? ….और यदि सचमुच किसी का खून हुआ है तो लाश भी यहीं कहीं होनी चाहिए।”

    “लाश…..? क्या कहा …..लाश ? अगर यहाँ किसी का खून हुआ है तो वो जरूर अब तक भूत बन गया होगा। वह भूत हमे जिंदा खा जाएगा बौड़म जी। चलो जल्दी बाहर निकलो। भागो यहाँ से। लगता है है ये लाइब्रेरी अब भूतिया हो गयी है। चलो , यहाँ से निकलो बौड़म बाबू ! हमे नहीं खोजना वो पाण्डुलिपि , …..इस तरह से अपनी जान जोखिम मे डाल कर।” भय का भूत पढ़ाकू बाबू के सिर चढ़ कर बोलने लगा था। लेकिन बौड़म ने अपना होश हवास दुरुस्त रखने की कोशिश करते हुए उनकी पीठ पर एक हल्की सी धौल जमाई ।- “अरे अभी रुको भी , इतना मत डरो पढ़ाकू बाबू ! ऐसे ही दिनों के लिए मैं गले मे हनुमान जी का लॉकेट डाले रहता हूँ । कोई भूत प्रेत हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता समझे ?”
    हनुमान जी का नाम सुनते ही पढ़ाकू बाबू उछल कर बौड़म के गले से लिपट गए। – “जय हनुमान ज्ञान गुण सागर , जय कपीस तिहूं लोक उजागर। भूत पिशाच निकट नहीं आवें , महावीर जब नाम सुनावें।” डर के मारे पढ़ाकू बाबू का शरीर सूखे पत्ते की तरह काँपने लगा था। बौड़म ने हिम्मत बांधते हुए उन्हें झिंझोड़ कर अपने शरीर से अलग किया और उन्हे सांत्वना देते हुए बोला –“ जरा ठहरिए , दूर रहिए मुझसे। मुझे अपना काम आगे बढ़ाने दीजिये। लाश की खोज करना बहुत जरूरी है। यहाँ असल मुद्दा यह है कि क्या ये पाण्डुलिपि सचमुच किसी के लिए इतनी महत्वपूर्ण थी , जिसके लिए किसी का खून भी हो सकता है ?” बड़ी मुश्किल से पढ़ाकू बाबू थोड़ा परे हटे तो बौड़म अपने मन का भय दबाकर किसी मंजे हुए जासूस की तरह फिर से खोज मे जुट गया।

    जरा सा आगे बढ़ते ही खून की बहुत सी छींटे पड़ी हुई दिखी , जिसे देखकर इतनी हिम्मत वाला कवि बौड़म भी सचमुच थोड़ा घबरा गया। लेकिन हिम्मत जुटा कर फिर पास गया और फिर आगे उसे जो चीज देखने को मिली उससे वह मानो उछल ही गया | या यूं कहें कि बौड़म भी बेहोश होते – होते बचा – “ यहाँ खून से लथपथ किसी का कोई कटा हुआ अंग पड़ा है। ये खून की बूंदे हो न हो , इसी की होंगी।”

    “क्या ….? लाश का खून से लथपथ …कटा हुआ अंग। अरे बाप रे , बचाओ sssssss खून …..खून…. !” बिना कुछ देखे और आगे सुने ….. पढ़ाकू बाबू इस बार डर के मारे सीधे बाहर को भागने को हुआ। एकदम सरपट। लेकिन डर की अधिकता से एक आलमारी से टकराकर गिरा और वहीं लुढ़कते – लुढ़कते बचा। कवि बौड़म ने उसका हाथ पकड़ कर खींचा और चुपचाप सब कुछ देखते रहने को कहा।

    बौड़म ने हिम्मत न हारी। खुर्दबीन पर नजरें टिकाकर ध्यान देखते हुए उस कटे हुए अंग को चिमटी से सावधानी पूर्वक उठाया। एक प्लास्टिक की थैली मे डाला। फिर आसपास अतिरिक्त निरीक्षण करने लगा। वहाँ हर तरफ बेतरतीब ढंग से कुछ किताबें फैली हुई थी या यूं कहें कि बिखरी हुई थी। अलमारी पर , कुर्सी पर , मेज पर और फर्श पर भी। वहाँ कोई भी छोटा मोटा जानवर या कम लंबा या दुबला पतला चोर आसानी से इन किताबों के बीच छुपकर बैठा हो सकता था। ये खयाल आते ही अचानक उसकी छठी इंद्रिय सतर्क हो उठी। उसने पास पड़ा एक एक कुर्सी का टूटा हुआ हत्था उठाया और उसे किताबों के पीछे की खाली जगह मे घुसा – घुसा कर ‘हुस्स – हुस्स’ करने लगा। एकदम पगलेटों की तरह।
    अब पढ़ाकू बाबू भी बौड़म की इस कारस्तानी को उसके ठीक पीछे खड़े होकर आश्चर्य पूर्वक उचक – उचक कर देखने लगे। तभी किताबों के बीच एक आहट सी हुई। कुछ खुदबुदाने की आवाज आयी। फिर एक भूचाल सा उठा। कुछ किताबें ऊपर को और दायें – बाए उछली। दो भयानक रूप से जलते हुए अंगारे भभके। एक तेज खौंखीयानी सी आवाज गूँजी।….. बौड़म तेजी से सहम गया। लेकिन जब तक वह संभलता या पीछे हटता , एक काला सा , झबरा सा , चार पैरों वाला भयंकर सा जीव उछला। उसके मुंह मे ताजा , गाढ़ा , लाल रंग का खून लगा हुआ था। किसी खीझे हुए पिशाच की तरह उसने सामने दिखे बौड़म के ऊपर छलांग लगा दी। लेकिन बौड़म किस्मत का धनी निकला। उसका सिर थोड़ा झुका हुआ था। जिसकी वजह से वह उसकी खोपड़ी के ऊपर से गुजरता हुआ निकल गया।

    लेकिन हाय री किस्मत ! पढ़ाकू बाबू न बच सके। वे उसी समय बौड़म के ठीक पीछे से उचक – उचक कर झांक रहे थे। उस भयानक जीव के पंजे उन्हीं के चेहरे से जा टकराये। उन्होने दोनों हाथों से अपना चेहरा बचाने की कोशिश तो किया , किन्तु संभल न सके ।भयंकर जीव उनके हाथों और चेहरे को लहूलुहान करता हुआ पीछे को निकल गया , लाइब्रेरी के खुले दरवाजे की ओर, पढ़ाकू बाबू की जोरदार चीख गूँजते ही घबराया हुआ बौड़म पीछे पलटा। हाथ मे लिए हुए लकड़ी के हत्थे को , उस भागते जीव पर बिना कुछ सोचे – समझे दे मारा। जवाब मे एक और जोरदार चीख गूँजी | लेकिन दुर्भाग्य से इस बार भी यह चीख भी पढ़ाकू बाबू की ही थी – “अरे सचमुच मार डाला रे sssss।” पढ़ाकू बाबू एक बार फिर चारों खाने चित्त हो चुके थे।

    अब पता चला कि बौड़म का डंडा उस भयंकर जीव को न लगकर पीछे – पीछे उचक रहे पढ़ाकू बाबू के सिर पर ही बज गया था। लेकिन बौड़म ने अब भी हिम्मत न हारी। पढ़ाकू बाबू को छोड़ करके पहले उस जीव को ठीक से देखने के लिए उसके ही पीछे ही भागा। बाहर दरवाजे तक दौड़ता हुआ आया। वह जीव तो न पकड़ा जा सका। लेकिन बौड़म ने भागते हुए उसकी एक झलक देख लिया था। वह बड़ा ही खूँखार बिल्ला था। जो इस मुहल्ले के आस – पास अक्सर देखा जाता था ….. चूहों जैसे शिकार की तलाश मे।

    “चूहे ….?” – अचानक , चूहों की बात ध्यान मे आते ही बौड़म के दिमाग मे जैसे घंटियाँ बज उठी। ‘हाँ चूहे …..? चूहे तो लाइब्रेरी मे भी हो सकते हैं। तो क्या यह बिल्ला चूहों की तलाश मे लाइब्रेरी मे घुसा था ? तब तो आज भी इसने चूहे का ही शिकार किया होगा। तो क्या वह खून से लथपथ कटा हुआ अंग भी चूहे का ही था ?’ उसकी जासूस बुद्धि बड़ी तेजी से काम कर रही थी। वह फौरन खुली धूप के उजाले मे आया। प्लास्टिक की झिल्ली से उस कटे हुए अंग को बाहर निकाला। खुर्दबीन को उसके ऊपर करके ध्यान से देखा। पहचानते ही खुशी से बल्लियों उछल पड़ा। – “ अरे ! ये मारा पापड़ वाले को।ये तो चूहे की ही कटी हुई पूँछ है भाई। कत्ल और खून का रहस्य अब खुल चुका है। पाण्डुलिपि का चोर भी अब पकड़ा ही समझो। असली चीज लगता है वहीं मिलेगी।” खुशियों से भरा बौड़म फिर किसी घोड़े की तरह चौकड़ी भरता हुआ वापस भागा। छलांग मारकर लाइब्रेरी के भीतर पहुँचा और घटना स्थल पर कूद कर गिरा।

    – “हाय – हाय , फिर से मार डाला रे sssss। अरे मनहूस तेरा सत्यानाश हो , तुझे कीड़े पड़े। तेरी किताब कभी न छपे , छपे भी तो किसी को पढ़ने को मयस्सर न हो।” ये पढ़ाकू बाबू की तीसरी चीख गूँजी थी और बाद मे उनके दर्द भरे , उलाहने भरे प्रवचन शुरू हो गए थे। जैसे ही बौड़म ने अपने पैरों के नीचे किसी गुलगुली सी चीज का अहसास किया तो उचककर पीछा हटा। देखता क्या है कि उसका पाँव पढ़ाकू बाबू के हाथों को कुचलता चला गया था।

    “अरे बाप रे ! आज उठते ही पढ़ाकू बाबू ने किसका मुंह देख लिया था ? अभी और कितनी दुर्गति करवायेंगे ये अपनी ?” – लेकिन जैसे ही उसे ध्यान आया कि पढ़ाकू बाबू ने तो आज सुबह – सुबह बौड़म का ही मुंह देखा था तो वह सिटपिटाकर खुद ही चुप हो गया।बहरहाल , अभी उसे किसी की भी , कोई भी बात , गाली या प्रवचन सुनने की अथवा माफी मांगने की भी , बिलकुल फुर्सत न थी। अपनी झोंक मे वह सीधा किताबों के उसी ढेर मे घुसता चला गया , जहाँ से निकल कर भयंकर बिल्ले ने उस पर हमला बोला था। अब वह तेजी से वहाँ की किताबों को उलटने – पुलटने लगा था। फिर अचानक एक किताब को देखते ही वह खुशी के मारे पगला गया। “ मिल गई रे sssss ,मिल गयी sssss। अरे पढ़ाकू बाबू ! मिल गयी रे ….. तेरी पाण्डुलिपि। ये देख ! उठ जा मेरे भाई ! सारा दुख दर्द भूल के उठ जा रे।” फिर बौड़म अपनी खुशी की झोंक मे उसी जगह नाच – नाच कर गाने भी लगा – “ उठ जा …..ऐ मेरे भाई …..कि खुशी की ….. ये दोपहर …. फिर न आएगी…. ।” उसके जासूसी शरीर पर फिर से कवि बौड़म की आत्मा प्रवेश करने लगी थी।

    उधर , पढ़ाकू बाबू के कानों तक भी जब ये रस भरे शब्द पहुंचे , तो मानो ‘ग्लूकोज की बोतल ’ बनकर बिना सिरिंज के ही तत्काल सारे शरीर मे घुल गए। उनके रक्त मे ऊर्जा का संचार होने लगा। ये खबर दर्द से निजात दिलाने वाली ‘पैरासीटामाल’ नामक दवा से भी तेज काम कर गयी थी। कराहते , लुढ़कते , लुंजपुंज से हो गए पढ़ाकू बाबू उठने की कोशिश करते हुए दो बार और भरभरा कर गिरे। लेकिन बदले मे उनके चेहरे पर दर्द की लकीरों की जगह खुशियों भरी मुस्कान ही दिखी। फिर तीसरी बार भी वे गिरते , इससे पहले ही बौड़म ने उन्हे सहारा देकर खड़ा कर दिया। पढ़ाकू बाबू चहक कर बोले , “अरे ! सच मे बौड़म भाई ? अरे ! मेरा कहा सुना माफ करना मेरे यार , मेरे भाई ! मेरे दोस्त , ……. मेरे जानी दुश्मन !” ये चौथा शब्द बड़े धीरे से उनके गले से निकला था , जिसे बौड़म ठीक से सुन न सका।  बस दोनों खुशी के मारे लिपट गए। एक दूसरे की बलैया लेने लगा।  एक दूसरे की तारीफ़ों का दौर भी चला। काफी देर के बाद , जब ये ‘भरत मिलाप’ सम्पन्न हुआ तो दोनों उस पाण्डुलिपि समेत उस हल्के अंधेरे से बाहर निकले और साफ उजाले मे आकर सुकून की साँसे लेने लगे।

    अब बौड़म ने फिर से खुर्दबीन जेब से निकाली और पहले मिले हुए कागज के टुकड़ों और पाण्डुलिपि के पन्नों को आपस मे मिला कर इस घटना की सारी कड़ियाँ जोड़ने लगा। अचानक उसकी नजर पाण्डुलिपि के ऊपरी पन्ने पर लगे काले दाग पर पड़ी। वो उसे ध्यान से देखने के बाद उस पर नाक रगड़कर सूंघते हुए बोला – “ अभी तक तुमने किताबों के ऊपर रखकर नाश्ता करने की आदत नहीं छोड़ी पढ़ाकू बाबू ?”

    “ये कैसा सवाल है बौड़म बाबू ? अरे घोडा घास से कब तक दोस्ती निभाएगा भाई ? अपना तो खाना – पीना और सोना भी कभी – कभी इन किताबों पर होता ही रहता है।आखिर इन्हीं की वजह से तो रातदिन यहाँ पडा रहता हूँ। अब थोड़ा सा इनका इस्तेमाल इस तरह भी हो जाता है तो इसमे बुराई क्या है ?”
    “ बुराई ही तो है पढ़ाकू बाबू ! आपकी इन्हीं खराब आदतों की वजह से यह भयंकर घटना यहाँ हुई है।”
    “मेरी वजह से बौड़म जी ?” – पढ़ाकू बाबू की आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो गई।
    “हाँ बिलकुल आपकी वजह से।” – बौड़म ने रहस्य का आवरण हटाते हुए कहा।

    “किसी दिन आपने इस किताब पर रखकर कहीं से लाये हुए चाकलेट वाले पेड़े – बर्फी खाये थे। उसके चूरे और उसकी तीखी महक इस किताब के पन्ने मे चिपकी रह गई। बाद मे कुछ खाने पीने की तलाश मे घूमते हुए चूहे इस किताब तक पहुँच गये। चाकलेट की स्वादिष्ट महक से आकर्षित चूहे इस पाण्डुलिपि को खींचकर उस कोने मे ले गये थे। जहाँ वह चाट- चाट कर या खुरचकर इसकी मिठाई का रसास्वादन कर रहे थे। इसी खींच घसीट की प्रक्रिया मे इसके पन्नों के कुछ टुकड़े फट भी गये थे। जो मुझे खुर्दबीन से तलाशी के दौरान प्राप्त हुए थे। इस बीच इन चूहों की तलाश मे घूम रही वह भयंकर बिल्ली भी यहाँ तक पहुँच गई। उसने चूहों को पकड़ कर दबोच लिया और खा गयी , जिनका खून उसके मुंह पर लगा था और आसपास भी छिटका था। धूल मे पंजों के निशान देखकर मुझे पहले ही किसी ऐसे जानवर के यहाँ होने का शक हो गया था। खून से लथपथ वह कटा हुआ अंग भी एक चूहे की पूँछ का हिस्सा था। सारे सबूत उस संभावित बिल्ले की ओर ही इशारा कर रहे थे , जिसे भगाने के लिए मैंने जल्दबाज़ी मे डंडे का इस्तेमाल करके खड़बड़ाहट की। वहाँ सचमुच छुपी बिल्ली ने उसी वजह से खतरा भाँप कर मुझ पर हमला बोला। नीचे झुके होने की वजह से मैं तो बच गया, किन्तु मेरे ठीक पीछे से उचक कर देख रहे आप उससे सीधे टकरा गये। उसी हमले मे आपको खरोंचे लगी और आप गिरकर नई चोटें खा गये।”

    “ बुहूहूहू…..! यही तो सबसे बुरा हुआ मेरे साथ। ….पर ये पाण्डुलिपि तो इतनी बड़ी घटना के बाद भी काफी सुरक्षित लग रही है | है न ?” – पढ़ाकू बाबू लंबी साँस खींच कर बोले।
    “ हाँ , वह भी उस बिल्ली की ही दया है। उसने सही वक्त पर पहुँचकर चूहों को शिकार जो बना बना लिया था। वरना आपकी चाकलेट की महक तो उस किताब की ऐसी चीरफाड़ करवाती कि उसके पुर्जे भी पहचान मे न आते। बस कवर के ही कुछ हिस्से कटे – फटे हैं , जो मैं आसानी से ‘रिपेयर’ कर दूंगा।”
    “आपका बहुत – बहुत धन्यवाद बौड़म जी ! आपने एक धरोहर को नष्ट होने से बचा लिया।”
    “धन्यवाद उन चूहों को भी जिन्होने अपनी जान देकर आपकी गलती की सजा भुगती और धन्यवाद उस बिल्ली को भी दीजिये , जिसने आपको भी गंदी आदत की सजा देकर एक नया सबक सिखाया।”
    “हाहाहाहा sssss” – दोनों का एक मिलाजुला ठहाका गूँजा और फिर दोनों ही हँसते हुए पहले पढ़ाकू बाबू के खरोंच भरे चेहरे की , फिर उस कटी – फटी पाण्डुलिपि की मरहम पट्टी और मरम्मत मे जुट गये।

    मोबाइल – 7007190413

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