शंकर को प्राप्त करने के लिए पार्वती ने घोर तपस्या की उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी इच्छा पूरी करके अंतर्ध्यान हो गए। अपनी मनोकामना के पूर्ण होने पर पार्वती के आनंद का ठिकाना ना रहा। वह अपने आश्रम के बाहर एक शिला पर बैठकर विचारों में डूब गई। तभी उन्हें किसी के रोने की आवाज सुनाई दी। पार्वती शिला से उठकर उस ओर बड़ी ध्यान से देखने लगी जिधर से वह शांतिनाथ आ रहा था। वहां पहुंचकर वह देखती क्या है कि सरोवर में एक बच्चे को ग्राह ने पकड़ लिया है, और वह बालक चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है। ‘मुझे बचाओ’ ‘मुझे यह खा जाएगा।’ मैं अपने माता-पिता की अकेली संतान हूं मैं नहीं रहूंगा, तो मेरे माता- पिता भी नहीं रहेंगे।
पार्वती का दिल यह सुनकर व्यथित हो उठा। उन्होंने ग्राह से कहा इस बालक को छोड़ दो। ग्राह बोला संध्या के समय जो यहां आता है मैं उसे अपना भोजन बना लेता हूं। पार्वती ने अाग्रह स्वर में कहा ‘मैंने हिमालय के शिखर पर कठोर तप किया है’ उसी के बल पर कहती हूं कि इसे छोड़ दो। ग्राह बोला अपने तप को मुझे अर्पित कर दो तो मैं इसे मुक्त कर दूंगा।
पार्वती ने पुलकित होकर कहा ‘यह क्या, मैं तुम्हे अपने जीवन भर के तप अर्पित करती हूं। ग्राह ने बालक को छोड़ दिया। और बोला- देवी मैं तुम्हारे दीं सेवा से मैं बहुत संतुष्ट हूं। मैं तुम्हारी तपस्या को भी लौटा देता हूं। पार्वती ने कहा ‘मैंने जो कुछ किया बहुत सोच समझ कर किया है, मैं तप वापस नहीं ले सकती। मेरा क्या मैं फिर तप कर लूंगी। ग्राह यह सुनकर अन्तर्ध्यान हो गया। पारवती फिर तप करने की सोचने लगी। तभी शंकर भगवान प्रकट हो गए। बोलें तुम्हें करने की जरूरत नहीं। अपना तब तुमने मुझे ही दिया था। मैं ही तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ग्राह बनकर आया था। तुम्हारा तप अब अनंत गुना अक्षय हो गया है।







