जी. के. चक्रवर्ती
रामलाल एक नौजवान आदमी था, सुबह सुबह उठ कर वह जंगल से लकड़ियां लेकर उन्हें बेच कर अपना जीवन चला कर रहा था। वह प्रतिदिन जंगल जाकर जमीन पर गिरी हुई पेड़ों की सूखी टहनियों को इकट्ठा कर उसे गांव वापस आकर उसे बेच दिया करता था। लकड़िया बेचने से उसे इतनी आमदनी हो चली थी, कि वह अपना रोज का खर्चा आसानी से निकाल लेता था।
उसका जीवन इसी तरह सुखमय गुजर रहा था कि और इसी बीच रामलाल का ब्याह हो गया। शादी के बाद भी रामलाल वही लकड़ियां इकट्ठा करके उन्हें बेचने का काम लगातार करता जा रहा था लेकिन अब उसकी आमदनी उसके और उसकी पत्नी दोनों के लिए काफी नहीं थी। क्योंकि रामलाल की पत्नी काफी दिखावटी और खर्चीली भी थी लेकिन रामलाल साधारण जीवन गुजारने में विश्वास नहीं करती थी, इसीलिए वह प्रत्येक समय रामलाल से पैसों की मांगा किया करती थी।
रामलाल अपनी पत्नी को नाराज नहीं करना चाहता था इसीलिए वह सोचने लगा कि वह अपनी कमाई को कैसे बढ़ाये कि उसे और अधिक पैसे कमा सके। हर रोज की तरह वह वह जंगल जाकर पेड़ो की गिरी हुई टहनियां इकठ्ठा करने लगा लेकिन उसे यह लकड़ियां बहुत कम लगने लगी इसीलिए वह आसपास के पेड़ की ताजा टहनियों को भी काट कर ले जाने लगा। इस तरह उसके पास बहुत सारी लकड़ी इकट्ठा हो जाती है वह इसे बेच कर वह पहले से और अधिक धन कमाने लगा। जिससे उसे दोगुने से भी अधिक आमदनी होने लगी और वह उन पैसों को अपनी पत्नी को देता था।
रामलाल की पत्नी इतने पैसे पा कर बहुत खुश हो जाती थी। यह देखकर रामलाल भी बहुत उत्साहित होता। अब वह और दिनों से भी अधिक लकड़ियां रोज बेचने लगा। इस तरह कुछ दिनों में रामलाल और उसकी पत्नी को पैसों का लोभ बढ़ता चला गया, जिसके कारण अब रामलाल और भी अधिक हरे-भरे पेड़ों को भी काटने लगा, ताकि वह और अधिक पैसे कमा सकें।
वह हर हफ्ते एक पेड़ काट देता। ऐसा बहुत दिनों तक चलता रहा। रामलाल के पास जरूरत से ज्यादा पैसे होने के कारण अब उसे जुआ खेलने की भी लत लग गई थी। अक्सर वह जुए में अपने पैसे हारने लगा तब रामलाल को और पैसों की जरूरत पड़ी इसीलिए उसने सोचा कि कियूँ न इस बार वह एक बड़ा पेड़ काटले।
वह जंगल जाकर वहां के सबसे बड़े एक पेड़ को काटने के लिए जैसे ही अपनी कुल्हाड़ी उठाई कि तभी उस पेड़ की एक बहुत मोटी टहनी उस कुल्हाड़ी पर आ गिरी जिससे लकड़हारे की कुल्हाड़ी समेत उसका हाथ मोटी टहनी के नीचे दब गयी।
तभी उस पेड़ से एक आवाज सुनाई दी कि तुम केवल अपने लोभ के कारण इतने सारे हरे-भरे पेड़ों को काट डालते हो जबकि मैं तुम्हें फल, फूल और छाया देती हूं , उसके बदले में तुम मुझे काटकर इस पर्यावरण का नुकसान तो कर ही रहे हो साथ ही इंशानो से स्वछ वायु भी छीन रहे हो यह केवल तुम इसीलिए कर रहे हो ताकि तुम उन पैसों से जुआ खेल सको। क्या तुम्हें पता है, कि पेड़ काटने से हमें भी उतनी ही तकलीफ होती है जितना तुम्हारे एक हाथ काटने पर तुम्हे होगी अब मैं इस तकलीफ का एहसास मैं तुम्हें करवाऊंगी तभी उस पेड़ की एक और मोटी टहनी उसके दबे हाथ पर आ गिरी जिससे उसके उस हाथ की हड्डी टूट गई जिसके दर्द से वह लकड़हारा चीख उठा। अब रामलाल को अपनी गलती अहसास होने पर वह जोर-जोर से रो कर अपनी गलतियों की माफी उस पेड़ से मांगने लगा और यह वह कहने लगा कि अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी बीवी का क्या होगा?
रामलाल की बात सुनकर पेड़ को रामलाल पर दया आ गई तभी वहां से गुजरता हुआ एक पथिक ने रामलाल की दबी हाथ को टहनियों से बाहर निकलने में मदद की तभी पेड़ ने गुस्से से चीख कर उससे कहा कि अगली बार अगर उसने ऐसा किया, तो उसे इससे भी बड़ा दंड मिलेगा। रामलाल डर कर तेज कदमो से अपने घर की ओर चल पड़ा।
शिक्षा:- इस लालची लकड़हारे की कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है , कि पेड़ भी हमारी तरह जीवित होते हैं। उनका भी अपना जीवन होता है और वह हम इंसानों की तरह सांस भी लेते हैं और उन्हें भी तकलीफ होती है। इसीलिए हमें कभी भी पेड़ नहीं काटना चाहिए। हमें हमेशा अपने आसपास के पर्यावरण का ख्याल रखना चाहिए और उसे स्वछ रखने की कोशिश करना चाहिये।







