व्यंग्य : अजय कुमार श्रीवास्तव
बबेरू नगर पंचायत में एक शख़्स है जिसे लोग बिन पेंदी का लोटा नाम से जानते हैं, वो लोगों का हितैषी बनने का स्वांग रचता रहता है लेकिन वास्तविकता सभी जानते हैं कि वो अपने स्वार्थ की ही रोटी सेकता है। इसके इस स्वांग में पुराने लोग तो बच जाते हैं लेकिन कुछ नए लोग, पीड़ित लोग फंस ही जाते हैं। अगर न भी फंसे तो अखबारों में एक हमदर्द और नेता बनकर छप ही जाता है। जिधर पलड़ा भारी उधर ये बंदा लुढ़का।
एक नहीं ऐसे कई उदाहरणों से इसकी करामात बबेरू के इतिहास में दर्ज है। व्यापारियों का हितैषी बन कर व्यापारियों के खिलाफ ही अक्सर लुढ़कता रहा है। “जिधर मिली मलाई, उधर के हो लिए ये भाई”! ये इधर भी खास, ये उधर भी खास, इस पर कैसे हो विश्वास!
कल तक पीड़ित व्यापारियों को उकसा कर उनका हमदर्द बना रहा वहां मलाई खाई, जब उधर खत्म मलाई तो जिधर का पलड़ा भारी उधर का हो लिया भाई! अब ये व्यापारी हितैषी खुद को ऐसा दिखा रहा है कि ये ही बुलडोजर का अधिकृत अधिकारी है।
बबेरू के बाशिंदे जानते सब हैं लेकिन ये शख्स शासन प्रशासन के करीब भी अपनी पहुंच बनाए हुए है, इसलिए आमजन इनसे दूरी ही बनाए रखता है। शायद इसी वजह से पीड़ित व्यापारियों का आंदोलन परवान नहीं चढ़ सका। विपक्ष के कुछ नेतागण मिलकर आंदोलन कर राजनीति की रोटियां सेक रहे थे और डरे सहमे व्यापारियों की भावनाओं से खेल रहे थे। ऐसे नेतृत्व कर्ताओं से ईश्वर ही बचाए। खैर इन डरे सहमे और अपना सर्वस्व खो देने वाले व्यापारियों के लिए कोई मसीहा न आ सका।
बुलडोजर के आगे लेट जाने का हुंकार भरने वाले बड़े नेता तो ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग! व्यापारियों को उकसाने वाले कुछ बड़े व्यापारी नेता भी चुपचाप मौन साध कर बुलडोजर की गर्जना पर मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं।
बबेरू के ही कुछ लोगों का कहना है कि “आपने इस मुद्दे पर इसलिए लिखा कि कुछ व्यापारियों का दुख और उनका मौन सा विरोध आपसे देखा नहीं गया, आपने पत्रकार होने का अपना कर्तव्य निभाया। लेकिन डरे और सहमे हुए को दिलासा दिलाना भी किसी दवा से कम नहीं है.. भले ये दिलासा झूठा ही क्यों न हो?
दिलासा नामक ये दवा दर्द को मिटा तो नहीं सकती लेकिन थोड़ा राहत जरूर देती है और दवा बेचने वाले को भी कुछ लाभ तो होना ही चाहिए।” बबेरू के लोगों में हर हाल में सामंजस्य स्थापित करने की जो कला है वाकई वो बेमिसाल है।







