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    बांग्लादेश में बढ़ा संकट: सेना और सरकार आमने -सामने, हो सकता है तख्तापलट!

    ShagunBy ShagunMay 23, 2025Updated:May 23, 2025 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    Breaking: बांग्लादेश में तख्तापलट | यूनुस बोले मौजूदा हालात में काम नहीं
    कर पाउँगा | मो. यूनुस इस्तीफा देने पर विचार कर रहे हैं
    | बांग्लादेश की सियासत बड़ी हलचल 

    बांग्लादेश में हाल के महीनों में राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल ने देश को एक नाजुक दौर में ला खड़ा किया है। अगस्त 2024 में, दशकों तक सत्ता में रही शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट हुआ, जब बड़े पैमाने पर छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों ने उनकी अवामी लीग सरकार को उखाड़ फेंका। यह आंदोलन सरकारी नौकरियों में कोटा प्रणाली के खिलाफ शुरू हुआ था, जो युवाओं में भारी असंतोष का कारण बना, क्योंकि इसे सत्ताधारी दल के समर्थकों को लाभ पहुँचाने वाला माना जाता था। प्रदर्शनों ने जल्द ही व्यापक असंतोष का रूप ले लिया, जिसमें मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और हसीना की सरकार की कथित तानाशाही के खिलाफ नाराजगी शामिल थी। हिंसक दमन, जिसमें 200 से 600 लोगों की मौत की खबरें आईं, और इंटरनेट ब्लैकआउट जैसी कठोर कार्रवाइयों ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। अंततः, सेना ने हसीना का साथ देने से इनकार कर दिया, और वह देश छोड़कर भारत भाग गईं।

    हसीना के जाने के बाद, नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ, जिसे सेना और छात्र नेताओं का समर्थन प्राप्त है। इस सरकार का मुख्य लक्ष्य चुनावी सुधार, भ्रष्टाचार पर अंकुश और लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करना है, ताकि एक निष्पक्ष चुनाव दिसंबर 2025 या मार्च 2026 तक हो सके। हालांकि, इस अंतरिम सरकार के सामने कई चुनौतियाँ हैं।

    वजह : सेना और सरकार के बीच तनाव
    हाल के महीनों में, सेना और अंतरिम सरकार के बीच तनाव की खबरें सामने आई हैं। सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमां ने यूनुस सरकार की वैधता पर सवाल उठाए हैं, इसे “अवैध” करार देते हुए दिसंबर 2025 से पहले चुनाव कराने की माँग की है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि सेना ने ढाका में अपनी उपस्थिति बढ़ा दी है और कानून-व्यवस्था का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है। हालांकि, सेना ने सैन्य तख्तापलट की अफवाहों को “हास्यास्पद” बताकर खारिज किया है। सेना ने पहले हसीना के खिलाफ प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था, और वर्तमान में वह खुद को एक तटस्थ और धर्मनिरपेक्ष संस्था के रूप में पेश कर रही है, जो अंतरिम सरकार के साथ सहयोग करने का दावा करती है। फिर भी, सेना की बढ़ती सक्रियता और यूनुस सरकार पर दबाव ने अनिश्चितता को जन्म दिया है।

    राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा
    बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता अभी भी बनी हुई है। अवामी लीग के पतन के बाद, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी जैसे दलों ने फिर से उभरना शुरू किया है। बीएनपी जल्दी चुनाव चाहती है, जबकि यूनुस सरकार सुधारों को प्राथमिकता दे रही है, जिससे दोनों के बीच तनाव बढ़ रहा है। जमात-ए-इस्लामी, जिस पर 2013 और 2024 में प्रतिबंध लगा था, ने अपनी गतिविधियाँ तेज कर दी हैं, और इस्लामी कट्टरपंथ के उभरने की आशंका बढ़ रही है। हिजब-उत-तहरीर जैसे कट्टरपंथी समूहों ने भी इस्लामी खलीफा की माँग के साथ रैलियाँ निकाली हैं।

    इसके अलावा, हसीना के शासन के दौरान दमन का शिकार हुए समूहों में बदले की भावना देखी जा रही है। अवामी लीग के कार्यालयों, पुलिस थानों और नेताओं के घरों पर हमले हुए हैं। हिंदू समुदाय पर भी हमले की खबरें आई हैं, हालाँकि कुछ का कहना है कि ये हमले धार्मिक से ज्यादा अवामी लीग से जुड़ाव के कारण हुए। मॉब हिंसा और लूटपाट की घटनाएँ भी जारी हैं, जिससे यूनुस सरकार की कानून-व्यवस्था को नियंत्रित करने की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं।

    सरकार के बदलने की संभावना
    यूनुस सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनता का विश्वास बनाए रखे और सुधारों को लागू करे। यदि यह सुधारों में विफल रही या जल्दी चुनाव आयोजित नहीं हुए, तो बीएनपी जैसे दलों का दबाव बढ़ सकता है, जो सत्ता में आने के लिए उत्सुक हैं। दूसरी ओर, सेना की बढ़ती भूमिका चिंता का विषय है। बांग्लादेश का इतिहास सैन्य हस्तक्षेपों से भरा है (1975-1990 के बीच कई तख्तापलट हुए), और अगर अस्थिरता बढ़ी, तो सेना के सत्ता पर कब्जा करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालाँकि, सेना ने बार-बार कहा है कि वह लंबे समय तक सत्ता में रहने की इच्छुक नहीं है, क्योंकि सैन्य शासन बहुपक्षीय फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को खतरे में डाल सकता है।

    इसके अलावा, कुछ लोग अवामी लीग के “परिष्कृत” रूप में वापसी की संभावना जता रहे हैं, जैसा कि हसीना के बेटे सजेब वाजेद जॉय और अन्य नेताओं ने संकेत दिया है। लेकिन बीएनपी और जमात जैसे दलों के विरोध के कारण यह मुश्किल लगता है। यदि यूनुस सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती, तो प्रदर्शनकारी फिर से सड़कों पर उतर सकते हैं, जैसा कि उन्होंने पहले चेतावनी दी है।

    क्षेत्रीय और आर्थिक चुनौतियाँ
    बता दें कि बांग्लादेश की स्थिति को और जटिल बनाता है इसका क्षेत्रीय संदर्भ। भारत, जो हसीना का करीबी सहयोगी था, अब यूनुस सरकार के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बीएनपी और जमात के उभरने से भारत की सामरिक रुचियाँ खतरे में हैं। म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध और रोहिंग्या शरणार्थियों का संकट भी बांग्लादेश के लिए चुनौती बना हुआ है। आर्थिक मोर्चे पर, बढ़ती मुद्रास्फीति, कम विदेशी मुद्रा भंडार और बैंकों की खराब स्थिति ने यूनुस सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी की हैं। यूनुस ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से वित्तीय सहायता प्राप्त की है, लेकिन दीर्घकालिक सुधारों के बिना आर्थिक स्थिरता कठिन है।

    बांग्लादेश इस समय एक नाजुक मोड़ पर है। यूनुस की अंतरिम सरकार को सुधारों और स्थिरता के बीच संतुलन बनाना होगा, जबकि सेना की बढ़ती भूमिका और राजनीतिक दलों के बीच तनाव स्थिति को अनिश्चित बनाए हुए हैं। सरकार के फिर से बदलने की संभावना तभी बढ़ेगी, यदि सुधारों में देरी हुई, हिंसा बढ़ी, या सेना ने अधिक प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया। अभी के लिए, सेना और सरकार के बीच तनाव स्पष्ट है, लेकिन यह तख्तापलट तक बढ़ेगा या नहीं, यह कहना जल्दबाजी होगी। बांग्लादेश की जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह देश अपनी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को कैसे साकार करता है। – सुशील कुमार

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