चुनाव से पहले बढ़ेगा तनाव?
लखनऊ/पटना: बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत मतदाता सूची से 65 लाख से अधिक नाम हटाए जाने का मामला सियासी तूफान बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के 14 अगस्त 2025 के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने 17 अगस्त को इन वोटरों के नाम और हटाने के कारण जिला मजिस्ट्रेट की वेबसाइटों पर सार्वजनिक कर दिए। इस कदम को कांग्रेस और RJD ने अपनी पहली जीत के रूप में प्रचारित किया, जिसमें राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया।
बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, हटाए गए नामों की सूची रोहतास, बेगूसराय, सिवान जैसे जिलों में बूथ स्तर पर प्रदर्शित की गई है। विपक्ष ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है, जिसमें राहुल गांधी ने सासाराम से पटना तक ‘वोटर अधिकार यात्रा’ शुरू की, जिसमें लालू प्रसाद यादव और INDIA गठबंधन के अन्य नेता शामिल हुए।

तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग, PM मोदी और अमित शाह के प्रभाव में, अल्पसंख्यक, दलित और विपक्ष-समर्थक वोटरों को निशाना बना रहा है। उन्होंने राघोपुर में जीवित वोटरों को मृत घोषित करने के उदाहरण दिए। सोशल मीडिया पर कांग्रेस और RJD इसे राहुल और तेजस्वी की जीत बता रहे हैं।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने ‘वोट चोरी’ के आरोपों को खारिज करते हुए SIR को पारदर्शी बताया और कहा कि इसमें 22 लाख मृत, 36 लाख स्थानांतरित और 7 लाख डुप्लिकेट वोटर शामिल हैं। BJP ने पलटवार करते हुए विपक्ष पर अनियमित वोटर पंजीकरण का आरोप लगाया।
SIR के बाद बिहार राज्य की वोटर संख्या 7.93 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ हो गई, जिसमें कुल पटना में सर्वाधिक 3.95 लाख नाम हटाए गए। फ़िलहाल अभी दावे और आपत्तियों के लिए आवेदन करने का 1 सितंबर तक का समय है, जिसके बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी। सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाएँ और विपक्ष की रणनीति इस मामले को और गर्माएगी।
राहुल और तेजस्वी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ 20 जिलों को कवर करेगी, जिससे बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है। चुनाव आयोग ने आधार को पहचान के लिए स्वीकार करने का निर्देश दिया है, जिससे कुछ हटाए गए वोटर बहाल हो सकते हैं। हालांकि, यदि गलतियाँ सामने आती हैं, जैसे जीवित वोटरों को मृत घोषित करना, तो आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाएँ और अगली सुनवाई (22 अगस्त 2025) इस मामले की दिशा तय करेंगी। विपक्ष की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ और सड़क से संसद तक विरोध के चलते यह मुद्दा बिहार विधानसभा चुनाव तक गर्म रहने की संभावना है। मतदाता अपनी स्थिति की जाँच बिहार मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट (ceoelection.bihar.gov.in) या voters.eci.gov.in पर कर सकते हैं।
क्या मामला खत्म हो जाएगा?:
यह मामला अभी खत्म होने की संभावना कम है। विपक्ष, खासकर INDIA गठबंधन, इसे बिहार विधानसभा चुनाव (इस साल के अंत में होने वाले) तक एक प्रमुख मुद्दा बनाए रखेगा। राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ (17 अगस्त से 1 सितंबर तक, 20 जिलों को कवर करने वाली) इस दिशा में एक रणनीतिक कदम है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ (RJD, कांग्रेस, TMC, CPI, और अन्य द्वारा दायर) अभी लंबित हैं, और अगली सुनवाई में और निर्देश आ सकते हैं। संभावित परिदृश्य:
- वोटरों की बहाली: EC ने कहा है कि कोई भी पात्र वोटर बिना पूर्व सूचना के हटाया नहीं जाएगा, और दावे-आपत्तियों के लिए 1 सितंबर तक समय है। आधार को पहचान के रूप में स्वीकार करने से कई हटाए गए वोटरों को बहाल करने का रास्ता खुल सकता है।
- राजनीतिक तनाव: विपक्ष EC पर दबाव बनाए रखेगा, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ उनका प्रभाव है। तेजस्वी यादव ने संकेत दिया है कि वे EC के अधिकारियों की भूमिका की जाँच करेंगे।
- कानूनी लड़ाई: सुप्रीम कोर्ट ने SIR को अवैध नहीं माना, लेकिन पारदर्शिता पर जोर दिया है। यदि EC पूरी तरह से कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करता, तो विपक्ष और याचिकाकर्ता (जैसे योगेंद्र यादव, PUCL, ADR) इसे और उछाल सकते हैं।
- चुनाव पर प्रभाव: यदि हटाए गए नामों में से अधिकांश बहाल नहीं होते, तो विपक्ष इसे ‘लोकतंत्र पर हमला’ के रूप में प्रचारित कर सकता है, जिससे बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाता ध्रुवीकरण हो सकता है।







