बिहार: मतलब सबकुछ ठीक बा ? बिहार में इस साल नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो ही रहा है, पिछले 15 दिनों से हत्याओं के सिलसिले से लग रहा है कि कानून व्यवस्था पर राज्य सरकार अपना नियंत्रण खोती जा रही है। इन 15 दिनों में कनिष्ठ अभियंता की चाकू घोंपकर, पटना में दिनदहाड़े कारोबारी की, पूर्णिया में जादू टोने के संदेह में पांच लोगों की और नालंदा में बच्चों के झगड़े को लेकर दो लोगों की हत्याएं की गईं। इनमें कारोबारी गोपाल खेमका की हत्या को लेकर काफी शोर मचा। तब लगा कि अपराधियों के खिलाफ सरकार और सख्त होगी लेकिन शनिवार और रविवार को हत्या की तीन और वारदातें हो गईं।
इन घटनाओं से दो बातें खासतौर पर उभरती हैं। पहली ये कि राजधानी पटना से लेकर राज्य के किसी किसी भी इलाके में अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को किसी की जान लेने में कोई भय नहीं है। वे जब और जैसे चाहें, अपने मन की कर सकते हैं। न गिरफ्तारी की कोई चिंता, न सजा की। अपराध के इस तरह से बेलगाम होने के साथ दूसरी प्रमुखता से उभरने की बात यह है कि राज्य में अंधविश्वास अभी गहरे तक जड़ें जमाए है।
पूर्णिया की घटना यह थी कि एक बच्चे की बीमारी न ठीक हो पाने के कारण जादू टोने के संदेह में एक ही परिवार के पांच लोगों की जान ले ली गई जबकि दो सौ से ज्यादा लोग वहां मौजूद थे। मतलब यह कि वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रचार के बावजूद राज्य में लोग वैज्ञानिक चेतना व जागरूकता से इतने दूर हैं कि उनके लिए तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास भी हत्या करने का कारण हो सकता है। इसीलिए ‘डायन’ के शक में वचित वर्गों की महिलाओं की हत्याएं तो होती हैं लेकिन सुर्खियां नही बन पातीं क्योंकि शायद जिम्मेदार भी मानते हैं कि इसमें कुछ तो सच है।
चिंतित करने की बात यह है कि जब इस साल के अंत में चुनाव होने हैं व सूबे में राजनीति और अपराध का मजबूत गठजोड़ है जो भले अब खुलकर सामने न आ रहा हो, तब हत्याओं की इस नई लहर का सिलसिला कहां जाकर रुकेगा। चुनावी नफे को देखते हुए सत्तारूढ़ गठबंधन के नेता इसे मुद्दा भी बना रहे हैं लेकिन इसकी तह में केवल दबाव का खेल है जो अंततः अपराधी तत्वों की मदद ही करेगा। आवश्यक यह है कि सख्त बयान देने की औपचारिकता निभाने की जगह खुद मुख्यमंत्री कड़ा कदम उठाते हुए कानून और व्यवस्था की मशीनरी को बेहतर बनाएं। इसका दोष ‘पिछली सरकार’ पर भी नहीं डाल सकते क्योंकि उसे गए तो जमाना बीत गया।







