त्वरीत टिप्पणी : उपेन्द्र नाथ राय
एक प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री की 19 जनसभाएं, छह रोड शो, फिर भी हार से नहीं बचा सके। कर्नाटक के चुनाव में आखिर भाजपा जीत ही गयी, जबकि पूरा भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व कर्नाटक के चुनाव प्रचार में जुट गया था। यह एक बात को सिद्ध कर दिया कि कभी भी यात्राएं विफल नहीं हुईं। वह चाहे आडवाणी की रथयात्रा हो या राहुल गांधी की पदयात्रा। दूसरी बात यह कि इसने यह भी बता दिया कि सिर्फ छोटी-छोटी बातों को बतंगड़ बनाने से काम नहीं चलने वाला। जनता समझ चुकी है। उसे दो बातों से मतलब है पहला यह कि किसके वादे में उसको कितना फायदा हो रहा है। दूसरा वादा कितना विश्वसनीय है।
कांग्रेस ने चुनाव मेनोफेस्टो में जैसे ही बजरंग दल पर प्रतिबंध लगाने की बात लिखी। भाजपा ने उसे बजरंग बली से जोड़ दिया। उस मुद्दे को भाजपा ने इतना जोर-शोर से उठाया कि सभी मुद्दे गौड़ हो गये। कांग्रेस के नेता बैकफुट पर आते दिखने लगे। पूरा चुनाव बजरंगबली के ईर्द-गिर्द घुमने लगा। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर जिले में बजरंग बली का मंदिर बनवाने की बात करने लगे। कांग्रेस भी हिंदूमय हो गयी। मुसलमान के पास कोई विकल्प नहीं था। इस कारण वह भुलावे में नहीं रहा और पिछली बार की अपेक्षा भी भाजपा को ज्यादा वोट दिये। मुसलमान कांग्रेस की तरफ एकमत दिखा।
कर्नाटक चुनाव पर नजर दौड़ाएं तो कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से भाजपा में आंतरिक कलह की स्थिति चरम पर रही। वहीं दूसरी ओर केंद्रीय नेतृत्व को इस बात का अहम रहा कि वे अपने प्रचार के दम पर कर्नाटक में चुनाव जीत लेंगे। पार्टी के अंदर ही कई तरह के गुट बन गए। चुनाव के वक्त टिकट बंटवारे से भी कई नेता नाराज हुए और बागी हो गए। इसका फायदा कांग्रेस ने उठाया। कांग्रेस ने भाजपा के बागियों को अपने साथ कर लिया। चुनाव में इसका पार्टी को फायदा भी मिला। इसको दूसरी तरह से देखें को तो गुजरात में कांग्रेस के दिग्गज बागियों को हमेशा भाजपा अपने पाले में कर जीत दर्ज करती आयी है। इस बार कांग्रेस ने वही किया।
आरक्षण का वायदा भी कांग्रेस के जीत का एक बड़ा कारण है। कर्नाटक चुनाव में भाजपा ने चार प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण खत्म करने के साथ ही उसे लिंगायत और अन्य वर्ग में बांट दिया। लेकिन ऐन वक्त में कांग्रेस ने बड़ा पासा फेंक दिया। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 फीसदी करने का एलान कर दिया। आरक्षण के वादे ने कांग्रेस को बड़ा फायदा पहुंचाया। लिंकायत वोटर्स से लेकर ओबीसी और दलित वोटर्स तक ने कांग्रेस का साथ दिया। वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस ने ये भी वादा कर दिया कि जो चार प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण भाजपा ने खत्म किया है, उसे फिर से शुरू कर दिया जाएगा। इसके चलते एक तरफ जहां कांग्रेस को मुसलमानों का साथ मिला, वहीं 75 प्रतिशत आरक्षण के वादे ने लिंगायत, दलित और ओबीसी वोटर्स को भी पार्टी से जोड़ दिया।
राहुल गांधी ने अपने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी कर्नाटक में कई दिन गुजारे थे। इसके माध्यम से उन्होंने कर्नाटक के अंदरूनी कलह को खत्म किया। वहां के स्थानीय नेताओं में इससे जोश होने के साथ ही कांग्रेस के दिग्गज भी विधानसभा की तैयारी में जी-जान से जुट गये। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार को एक साथ लेकर आए और इसका फायदा अब चुनाव में देखने को मिल रहा है।
इस चुनाव परिणाम के बाद नि:संदेह डूबती कांग्रेस को सहारा मिल गया है। आने वाले समय में कांग्रेस को उम्मीद जगी है। इससे आने वाले विधानसभाओं तथा लोकसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ेगा। कांग्रेस पिछले एक दशक से राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है। 2014 के बाद से अब तक 50 से ज्यादा चुनावों में कांग्रेस को हार मिली है। कुछ चुनिंदा राज्य ही ऐसे हैं, जहां कांग्रेस ने जीत हासिल की है। पिछले छह महीने के अंदर ये कांग्रेस की दूसरी बड़ी जीत है। अगर ये कहें कि डूबती कांग्रेस को पहले हिमाचल प्रदेश और फिर कर्नाटक में जीत का सहारा मिला तो गलत नहीं होगा। इससे कांग्रेस को नैतिक आधार पर मजबूती मिलेगी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं में नई ऊर्जा आएगी। आने वाले जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें से दो की सत्ता कांग्रेस के पास है। ऐसे में कांग्रेस इन दोनों राज्यों को भी बरकरार रखने की कोशिश करेगी।
इस साल कर्नाटक के बाद अब पांच अन्य राज्यों में चुनाव होने हैं। इनमें राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम और तेलंगाना शामिल है। इसके अलावा अगले साल यानी 2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं। इसके बाद सात राज्यों में चुनाव होने हैं। कुल मिलाकर अगले दो सालों में लोकसभा के साथ-साथ 13 बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं। इनमें कई दक्षिण के राज्य भी हैं। इसलिए भाजपा के लिए कर्नाटक की हार को बड़ा झटका माना जा रहा है। वहीं, मुश्किलों में घिरी कांग्रेस के लिए जीवनदान साबित हुई।
हां, इतना जरूर रहा कि इस बार के चुनाव में पहली बार इतना खुलकर कांग्रेस ने भी हिन्दुत्व का कार्ड खेला। भाजपा ने मंच से बजरंगबली का नाम लेना शुरू किया तो कांग्रेस के नेता हनुमान मंदिर में जाकर मत्था टेकना शुरू कर दिये। बजरंग बली का मंदिर हर जिले में बनवाने की घोषणा करने लगे। कुल मिलाकर यह देखा जाय तो अब कांग्रेस भी बदलने लगी है। वह लोगों की मानसिकता समझने में कामयाब होने लगी है। अब वह रामसेतु को काल्पनिक बताने जैसी भूल नहीं करने वाली है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)







