ये कहा जा सकता है कि महिला और बालिका हितैषी योजनाओं के कारण देश और दुनिया में पहचान बनाने वाले मध्य प्रदेश में बालिकाएं और महिलाएं देश में सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। ‘एनसीआरबी’ की 2015 की रिपोर्ट में भी मध्यप्रदेश में देश में सबसे ज्यादा 4391 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार बनी थीं। तब भी सरकार ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया था! सरकार ने बचाव करते हुए कहा था कि राज्य में हर शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज की जाती है, इसलिए संख्या ज्यादा है। प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने भी महिलाओं के साथ बढ़ी दुष्कर्म की घटनाओं पर चिंता जताई थी। कहा था कि प्रदेश में हर शिकायत पर प्रकरण दर्ज किया जाता है, इसलिए आंकड़े बढ़ जाते हैं। उन्होंने ये भी कहा था कि ऐसी घटनाओं में बड़ी संख्या में परिचितों व परिजनों के शामिल होने की बात भी सामने आई! इसलिए ऐसे मामले रोकने के लिए सरकार के साथ समाज को भी आगे आना होगा! लेकिन, सवाल उठता है कि इन बढ़ते आंकड़ों पर काबू पाने के लिए सरकार ने क्या कुछ किया है? यदि वास्तव में कुछ किया होता तो आंकड़े बढ़ने बजाए घटते, पर ऐसा हुआ नहीं!
सच्चाई तो ये है कि दुष्कर्म की वारदातें घटने के बजाए बढ़ रही है! बल्कि, इसकी जघन्यता ही सामने आने लगी! अब तो छोटी बच्चियों के साथ स्कूलों में ही दुष्कर्म की वारदातें होने लगी! क्या सरकार कभी सामाजिक नजरिए से ये जानने की कोशिश की है कि महिलाओं, युवतियों और छोटी बच्चियों के साथ बढ़ते दुष्कर्म कारण क्या हैं? लोगों को नकली आनंद का अहसास कराने वाली सरकार ने कभी समाज शास्त्रियों से इसका कारण जानने की कोशिश की है? शायद नहीं की होगी, क्योंकि सरकार की नजर में ये आपराधिक प्रकरण हैं, न कि सामाजिक! स्कूलों में छेड़छाड़ और दुष्कर्म करने वालों में भी छात्र तो कम, शिक्षक ही ज्यादा हैं! बेहतर हो कि इस बीमारी का इलाज पुलिस के डंडे के बजाए समाज सुधार के तरीके से किया जाए! इसी साल फ़रवरी के महीने में भोपाल के कोलार इलाके में 3 साल की एक बच्ची के साथ स्कूल के डायरेक्टर ने दुष्कर्म किया! जबलपुर में 5 साल की एक बच्ची के साथ भी स्कूल के ही दो छात्रों ने दुष्कर्म किया। ग्वालियर में तो एसपी के रीडर पर ही एक महिला के साथ ज्यादती का आरोप लगा। बुरहानपुर जिले के एक गांव में तो चर्च के पादरी पर ही आदिवासी महिला के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया। ये वो मामले हैं, जो दर्शाते हैं कि समाज किस तरफ जा रहा है और उसमें कितना और कैसा सुधार किया जाना चाहिए!
महिलाओं के शोषण के बढ़ते मामलों में विडंबना यह है कि जैसे-जैसे समाज के सोच में आधुनिकता आई, उसके साथ ही महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ा है। समाज की दृष्टि में महिलाएं आज भी सिर्फ औरत हैं। कथित सभ्य समाज उन्हें थोपी, गढ़ी और बुनी तथाकथित नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आने देना चाहता। इसी मानसिकता का नतीजा है कि महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, हिंसा, दहेज मृत्यु और यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों की संख्या में बढ़ रही है। ये स्थिति तब है, जब देश और प्रदेश में महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण प्राप्त है। भारतीय संस्कृति सृजन और संवेदना से जुडी है। इसका मूर्त रूप है औरत! कोई भी व्यक्ति, समाज या सरकार कितनी सुसंस्कृत है, इसका जवाब उसके संरक्षण में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार में देखा जा सकता है। महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार हमारी सभ्यता और संस्कृति पर प्रश्नचिह्न लगाता है। नारी के प्रति अपराध, संस्कृति पर आघात है। मध्यप्रदेश में जिस तरह इन मामलों में बढ़ोतरी हो रही है, उससे हमारा साँस्कृतिक अस्तित्व ही संकट में आने लगा है। लेकिन, इसमें सुधार की दिशा कौन तय करेगा? सरकार या समाज ये सबसे अहम् सवाल है!








