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    अखबारों में सामाजिक सरोकार नहीं, चिंता खबरों को बेचने की

    By October 24, 2017 ब्लॉग No Comments3 Mins Read
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    बात थोड़ी पुरानी है, जब खाप पंचायत के तुगलकी फरमानों की खबर के रूप में पत्रकारिता/पत्रकारों की जिव्हा को नए किस्म का स्वाद लगा था, उसे मसालेदार बनाने के लिए पत्रकार भी अपनी पूरी साहित्यक क्षमता का इस्तेमाल करने में पीछे नहीं रहते थे।
    मैंने कई बार अपने पत्रकार साथियों से इसके सामाजिक पहलुओं पर वार्ता की, निवेदन किया, कि इसके सामजिक पहलू को भी लोगों के सामने लाया जाए. पर इसमे वो स्वाद नहीं था जिसको बेचा जा सके, अत: उसे किसी अखबार में स्थान नहीं मिला. मुझे अपनी लेखन क्षमता पर विश्वास नहीं था (अब भी नहीं है), दुस्साहस भी करता तो छापता कौन?
    भला हो सोशल मीडिया का कि बिना अखबार में छपे भी बात लोगों तक पहुंचाई जा सकती है. सोचा आज अपने ही विश्वास की परीक्षा ली जाए।
    पर पहले ये साफ कर दूं की ये बात उन फरमानों न्यायोचित ठहराने की नहीं बल्कि उसके पीछे छिपे सामजिक सरोकार की है।
    ग्रामीण प्रष्ठभूमि का हर शख्स जानता है की गाँव में जब व्यक्ति एक-दूसरे संबोधित करते है तो चाचा-चाची , ताऊ-ताई, बुआ इत्यादि संबोधन का इस्तेमाल करते हैं. पुरुष ज्यादातर खेत-काम के सिलसिले में घर से बाहर रहते थे. कारणवश जो पुरुष गाँव में रहते थे, महिलाओं को उनसे कोई डर नहीं था, क्योकिं वो किसी की बुआ, किसी की दीदी, किसी की मौसी, किसी की चाची-ताई लगती थी. समाज एक सुरक्षित वातावरण में सांस ले रहा था।
    दिक्कत की शुरुआत हुई जब गाँव का एक लड़का, पड़ोस की लड़की को ले भागा. ये मात्र एक प्रेम कथा नहीं थी, ये हत्या थी उसे सुरक्षित समाज के वातावरण की जहां महिलायें सुरक्षित थी सामजिक ताने-बाने में।
    एक, दो, फिर ना जाने कितनी घटनाएं. घर के जिम्मेदार पुरुष को घर से बाहर जाने में डर लगने लगा।
    बाकी सभी जानवर तो प्रकृति चक्र जो जारी रखने के लिए सेक्स सम्बन्ध स्थापित हैं, लेकिन इंसान अपनी पाश्विक भूख मिटाने लिए सेक्स सम्बन्ध का ज्यादा इस्तेमाल करता है. जो सामाजिक संरचना इस पाश्विक प्रवर्ती पर अंकुश रखती थी टूट गयी. लडके-लड़की की नजर में अब सामान/माल (सेक्स ऑब्जेक्ट) हो गए. प्रेम के मायने सिमट कर सेक्स संबंधो तक सिमित हो गए।
    युवा लड़के-लड़की जब ग्रामीण परिवेश से बाहर आ गए तो रहा सहा अंकुश भी समाप्त गया. लिव-इन रिलेशनशिप की भी शुरुआत  हो गयी. लड़की जब सहमत नहीं हुई तो फिर जबरदस्ती. परिणाम स्वरुप अख़बार/न्यूज़ चैनल में खबरों की आपूर्ति निरंतर जारी है।
    उस सामाजिक संरचना को बनाए रखने का अपरिपक्व प्रयास थी खाप पंचायत, जिसकी दिशा सही करने की जरूरत थी. लेकिन पत्रकारों की चिंता सामाजिक सरोकार नहीं थे, उनकी चिंता थी इस खबर को कैसे बेचा जाए।
    सुशील राणा की वॉल से

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