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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    सरकारी संरक्षण में बच सकते हैं तालाब!

    By March 16, 2019 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    तालाब बचाने के लिए पहले प्राचीन सभ्यता के अवशेष को विकसित करना होगा! 21वीं सदी का सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक तरफ पानी का संकट है तो दूसरी तरफ पानी के श्रोत पर अतिक्रमण, फिर भी देश क्यों आंखें मूंदे बैठा है? फरवरी महीने में एनजीटी की बनाई कमेटी ने जब यह रिपोर्ट दी कि दिल्ली-एनसीआर में 155 जलाशयों पर अतिक्रमण है तो देश के कान खड़े हो गए। यह समस्या सिर्फ दिल्ली-एनसीआर की नहीं, समूचे देश की है! हरियाणा में भी स्थिति भयावह है।

    एनजीटी ने हरियाणा सरकार को राज्य में 1216 जलाशयों की रक्षा के लिए कम्प्लायंस रिपोर्ट तीन हफ्ते के भीतर दायर करने को कहा है। देश के चाहे जिस इलाके में चले जाएं, जलाशयों को अतिक्रमण से बचाने की जद्दोजहद अदालतों की कार्यवाही का रूटीन हिस्सा बनी दिख रही है।

    बुंदेलखंड कभी तालाबों के लिए विख्यात था, आज तालाब के खो जाने के बीच वह सूखे प्रदेश में बदल चुका है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक जैसे इलाकों में भी किसान इसलिए बदहाल हैं क्योंकि तालाब की निर्भरता से आजाद होकर खेती असहाय चुकी है। इसी दिशा में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और दूसरे प्रदेश भी आगे बढ़ रहे हैं। मूल समस्या तालाब का अतिक्रमण नहीं है। यह तो परिणाम है। मूल समस्या है तालाब का मतलब हम भूल चुके हैं। यह हमारे इतिहास, हमारी संस्कृति और परम्परा से किस कदर और क्यों जुड़ा रहा है, उससे हम भिज्ञ नहीं रह गए हैं। तालाब जलाशय मात्र नहीं होते। यह जीवनधारा होती है नदी की भांति, बल्कि नदी से बढ़कर। नदी इंसान पैदा नहीं कर सकता, मगर तालाब इंसान बना सकता है, बनाता आया है। अपनी ही नहीं, पूरे सजीव जगत की प्यास बुझाता आया है इंसान। खेती-किसानी से लेकर मछली पालन और कारोबार सभी में तालाब की केंद्रीय भूमिका हुआ करती थी।

    तालाब बनाकर हम मैदानी इलाकों में बाढ़ के पानी का, तो पहाड़ी इलाकों में वर्षा जल का संचय करते आए हैं। तालाब की मिट्टी का इस्तेमाल आवश्यक ढाल और बसाहट के लिए होता रहा है। इसका इस्तेमाल पीने के पानी से लेकर खेती तक में होता आया है। यह आवश्यकता पुरातनकाल से चली आ रही है। कुरुक्षेत्र का ब्रह्म सरोवर, करनाल की कर्णझील और मेरठ के पास हस्तिनापुर का शुक्रताल महाभारत कालीन हैं। रामायण कालीन प्रसिद्ध शृंगवेरपुर का तालाब खोज निकाला गया है।

    तालाबों के बारे में अध्ययन कहता है कि बीती सदी में रीवा रियासत में 5 हजार तालाब थे, तो प्राचीनकाल में रतनपुर रियासत में 1400 तालाब होने के प्रमाण मिलते हैं। 1847 तक मद्रास प्रेसीडेंसी में 53 हजार तालाब हुआ करते थे, तो 1980 तक मैसूर राज्य में 39 हजार तालाब थे। कहने का मतलब ये है कि समूचे हिन्दुस्तान की समृद्धि का आधार तालाब रहे हैं। तालाब के महत्त्व को राजाओं ने भी समझा था। भोपाल में 25 वर्गमील तक फैला तालाब राजा भोज ने बनवाया था। इस शहर को 40 फीसद पानी आज भी इसी तालाब से मिलता है। रानी दुर्गावती की ख्याति भी तालाबों के लिए रही है।

    चंदेल-बुंदेल के शासन की ख्याति भी तालाब के कारण है। जैसलमेर में घडसीसर, जयपुर में गोला ताल, जयगढ़ में चाकसू तालाब, आबू पर्वत के पास का नखी सरोवर ऐतिहासिक तालाब हैं, जिनके गिर्द इंसान की पीढ़ियां विकसित हुई। मेहनतकश जातियों ने भी तालाब से जुड़कर समाज में अपने लिए जगह बनाई। इनमें दुसाध, नौनिया, गोंड, परधान, कोल, धीमर, भोई, लुनिया, मुरहा शामिल हैं। बुलई उन्हें कहा गया जो तालाब के लिए जगह चुनने का काम करते थे, तो गजधर वे कहलाए, जिन्होंने जमीन मापने का किया।

    पत्थर का काम करने वाले सिलवट और बगैर उपकरण पानी की सही जगह बताने वाले सिरभाव कहे गए। जलसूंघा उन्हें कहा गया जो आम या जामुन की लकड़ी से भूजल सूंघकर उसका विश्लेषण किया करते थे। तालाब से संबंध मिट्टी काटने वाले खंती का भी था और मिट्टी खोदने वाले सोनकर का भी। राजा-महाराजाओं के बाद अंग्रेज के शासनकाल और उत्तरार्ध में तालाब से हमारा सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध टूटते चले गए हैं। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संकट को पहचाना।

    उसने साफ कहा कि तालाबों पर अतिक्रमण हटाने, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। मगर, सरकारें चेत नहीं रही हैं। सभ्य होने और होते जाने का प्रमाण रहे हैं तालाब। अब तालाबों का अतिक्रमण हमारी पतित होती सभ्यता के प्रमाण बन गए हैं। यह तय है कि तालाब बचेंगे तभी सभ्यता बचेगी। 

    • प्रेम कुमार से साभार 

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