कटघरे में मीडिया

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जी के चक्रवर्ती

आज हमारे देश में मीडिया वालों की जिम्मेदारी पहले से और भी अधिक बढ़ गई है क्योंकि आज शरारती तत्वों, राजनेताओं या आपराधिक प्रवृति वाले लोगों द्वारा किसी भी तरह जानकारियों एवं सूचनाओं का गलत या झूठ होना साधारण सी बात है।

सूचना तंत्र का नाम आते ही हमे समाचार पत्रों से लेकर मैग्जीन एवं रेडियो, टीवी जैसे माध्यमों से ही लोगों को सूचना मिलने का एक माध्यम होता है। मीडिया हमारे देश की लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में इसे सम्मान एवं गौरव प्राप्त है। देश के लोगों की सार्वजनिक जीवन से जुड़े रोजमर्रे की गुणवत्ता पूर्ण एवं महत्वपूर्ण जानकारियों से जीवन सुचारू रूप से चलता रहे इसलिये एक साधन के रूप में मीडिया का इस्तेमाल होता है, इसके साथ ही देश के लोकतान्त्रिक चरित्र का प्रचार-प्रसार में भी मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

मीडिया के माध्यम से ही समाज के सभी लोग सूचनाओं से जागरूक तो होते ही है बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों का भी विस्तार कर देश के नागरिकों को सशक्त बनाती है। राजनीति से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों जैसे जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नही होगा जिसकी जानकारियों से लोग अवगत न होते हो। मीडिया न केवल सरकार व नागरिकों के मध्य एक मध्यस्थता की भूमिका को निभाता है बल्कि इतिहास साक्षी है कि अंग्रेजी शासन कालीन भारत में भी भारतीय लोगों में देश भक्ति से ओतप्रोत कर उन्हें जगाने का काम किया है।

एक तरफ जहाँ महात्मा गाँधी, डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर, सरदार बल्लभ भाई पटेल, जैसे तत्कालीन नेताओं ने और दूसरी ओर गणेश शंकर विद्यार्थी, अम्बिका प्रसाद, लक्षमन नारायण, जे.डी. दास जैसे अनगिनत पत्रकारों ने अपने लेखनी के माध्यम से देश को आजादी दिलाने के मुहिम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा किया है।

आज वर्त्तमान समय मे मीडिया के एक बड़े तबके की भूमिका संदेहस्पद हो गयी हैं। देश मे एक ऐसा भी समय था जब बुद्धिजीवियों के विचारों एवं उनकी राय को केंद्र में रखकर नीति निर्माण या सत्ता का संचालन किया जाता था। सदैव उस देश को सर्वाधिक शक्तिशाली माना जाता है जिस देश के प्रत्येक क्षेत्र में बुद्धिजीवियों की अहम भूमिका होने के साथ ही महत्वपूर्ण भी होती है लेकिन आज बुद्धिजीवी वर्ग के लोग हाशिए में चले गयें है आखिर इसके क्या कारण है?

आज के समय मे पत्रकार और पत्रकारिता दोनों की ही परिभाषा और भूमिका बदल चुकी है। आज कौन-सी खबर महत्वपूर्ण बनेगी और कौन सी हाशिए पर रहेगी इन सब बातों का निर्धारण कुछ पत्रकार लोग ही तय करते हैं समाज या राष्ट्र के लिए यह खबर का कितना महत्त्व है इस बात का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, अब तो यहाँ तक हो गया है कि ख़बरों की सत्यता, असत्यता एवं प्रमाणिकता की परख करना भी अत्यंत दुष्कर हो गया है। जिसके उदाहरण स्वरूप देश में कोरोना से बढते संक्रमण के कारण लॉकडाउन की स्थिति में न जाने कितने ही लोगों की नौकरीयां चली गयी या उनके वेतन में कटौती कर दी गई, बेरोजगारी की समस्या, स्वास्थ्य के मुद्दे, आर्थिक असमानता में वृद्धि और अनेक सार्वजानिक संस्थानों का निजीकरण, शिक्षा जगत की उपेक्षा इत्यादि जैसे ज्वलंत मुद्दों पर आज मीडिया और सरकार दोनो ही खामोश रह कर बचने की कोशिश किया करते हैं। इस तरह के मुद्दें मीडिया के एक बड़े भाग के पत्रकारों के लिए कभी चर्चा के विषय हुआ करते थे लेकिन आज वे इन पर कोई सवाल ही नही उठाते हैं बल्कि आज उनके लिए तो बस रिया, सुशांत या फिर हाथरस बलात्कार जैसे मामले ही महत्वपूर्ण बन कर रह गये है बाकी सभी मुद्दे विलीन हो गैर यानि कि अनावश्यक हों गये हैं। हालाँकि सुशांत या फिर हाथरस बलात्कार पर खबर दिखाई जानी चाहिए लेकिन तब, जब कोई बड़ा एविडेन्स हाथ लगे नाकि स्पेशल इश्शु बना कर !

आज मीडिया में चौबीसों घंटे इस तरह की ख़बरों को दोहराते हुये देख सकते हैं जिनका कि बार-बार उल्लेख करना निर्थक ही जान पड़ता है। इस तरह की हरकतें निसंदेह उनकी भूमिका को संशय के घेरे में ला खड़ा करता है। फिल्मी दुनिया की हीरो या हीरोइने ने क्या खाया, क्या पहना है या आजकल किसके साथ घूमती दिखाई दे रही है, किसके साथ किसका लव अफेयर चल रहा है आदि जैसे मुद्दे इतने महत्वपूर्ण कैसे और क्यों इतने महत्वपूर्ण हो गये हैं? आखिर इस तरह के मुद्दे फूहड़ता से ज्यादा और कुछ क्या कहला सकता है? आपको ऐसा नहीं लगता कि इस तरह से हमारे समाज के लोगों के समक्ष ऐसे प्रस्तुतीकरण लोगों की सांस्कृतिक, समाजिकता एवं आदर्श जैसे संस्कारों को समाप्त किये दे रहा है जिसके कारण प्रत्येक क्षेत्र में एक अदृश्य किस्म की आक्रामकता को बढ़ाने का ही काम कर रही है जो हमारे देश की लोकतान्त्रिक समाजिक व्यवस्था के लिए एक खतरा एवं चुनौती भी है।

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