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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बाबा साहेब, इस्लाम और पाकिस्तान

    By April 14, 2019 Current Issues 3 Comments7 Mins Read
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    एक देश के तौर पर इस्लाम और मुसलमान को लेकर डा. आम्बेडकर के विचार अलग थे। उन्होंने लिखा है कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं, जबकि इसके ठीक उल्टा, मुसलमान आबादी वाले तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है। 1940 के दशक के शुरुआती वर्षो में उन्होंने कई पुस्तकें और पच्रे प्रकाशित किए, जिनमें ‘‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है। इस पुस्तक में उन्होंने मुस्लिम लीग की उस मांग की जबरदस्त आलोचना की जिसके अंतर्गत लीग मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग कर रही थी। हालांकि हिंदु-मुसलमानों के बीच की तल्खी जब काफी बढ़ गई तो उनके तर्क में बंटवारे को लेकर बदलाव आया और उन्होंने बंटवारे पर एक तरह से मुहर लगा दी।

    आम्बेडकर का जन्म निम्न वर्ण की महार जाति में हुआ था। यही वजह है कि दलितों का दर्द उन्हें खूब पता था। हालांकि उनकी आर्थिक पृष्ठभूमि उतनी बुरी नहीं थी, जैसी आम जनमानस में बनी रही है। आम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे। भीमराव के पिता रामजी आम्बेडकर ब्रिटिश फौज में सूबेदार थे। कुछ समय तक तो वह एक फौजी स्कूल में अध्यापक भी रहे। उनके पिता मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक रूप से शिक्षित थे। यही वजह है कि उन्होंने अपने बेटे भीमराव की पढ़ाई-लिखाई पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया।

    आम्बेडकर 1907 में मैट्रिकुलेशन पास करने के बाद बड़ौदा महाराज की आर्थिक सहायता से एलिफिन्सटन कॉलेज से 1912 में ग्रेजुएट हुए। गायकवाड़ के दिए स्कॉलरशिप के सहारे ही उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया विविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए (1915) भी किया। मशहूर अमेरिकी अर्थशास्त्री सेलिगमैन के मार्गदशर्न में आम्बेडकर ने कोलंबिया विविद्यालय से 1917 में पी एच. डी. की उपाधि प्राप्त कर ली। उनके शोध का विषय था-‘‘नेशनल डवलपमेंट फॉर इंडिया : अ हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी’। इसके बावजूद पढ़ाई-लिखाई की भूख उनमें आजीवन रही। यह भूख ही थी, जो उन्हें लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स ले आई। उनकी व्यापक पढ़ाई-लिखाई ने उन्हें खासकर दलितों की समस्या को व्यापक नजरिए से जांचने-परखने में सक्षम बना दिया। जिस समय गांधी अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे, तब आम्बेडकर ने गांधी को निशाने पर लिया। ‘‘वॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ (कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया) के साथ आम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस, दोनों पर अपने हमलों का तीखा कर दिया।

    उन्होंने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया। अपनी पुस्तक ‘‘हू वर द शुद्राज?( शुद्र कौन थे?)’ द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व में आने की व्याख्या की। इस पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत शुद्रों से अलग हैं। 1948 में हू वर द शुद्राज? के बाद लिखी गई अपनी किताब, ‘‘द अनटचेबल्स : अ थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध)’ में आम्बेडकर ने हिंदू धर्म को उसके अंतर्विरोधों को लेकर लताड़ा।

    मगर ऐसा नहीं था कि आम्बेडकर इस्लाम को बख्श रहे थे। वे इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी आलोचक थे। उन्होंने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज में व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले र्दुव्‍यवहार की घोर निंदा की। अपने गहन अध्ययन से उन्होंने इस सचाई को समझ लिया था कि सामाजिक अस्पृश्यता की जड़ें बहुत गहरी हैं, और उन जड़ों ने स्वयं को बनाए रखने के लिए अपने तर्क भी बना लिए हैं। वह इस बात पर पूरी तरह सहमत थे कि इस बुराई की जड़ पर कानून के हथियार से ही वार किया जा सकता है, दूसरा कोई रास्ता नहीं है।

    उन्होंने इसका माध्यम संविधान को बनाया। 1950 के संविधान द्वारा ही अंतिम रूप से कानूनी तौर पर अस्पृश्यता को समाप्त किया जा सका। मगर व्यावहारिक तौर पर बाबा साहेब दलित को जितनी दूरी ब्राह्मणवाद से रखने के पक्ष में थे, उससे कहीं ज्यादा दूरी वे दलित को इस्लाम से रखने के पक्ष में थे। उन्होंने इस्लाम और उसके भीतर की कमियों और खासियत पर भी खासा अध्ययन किया था। इस्लाम की कमियों की तरफ इशारा करते हुए लिखा, ‘‘इस्लाम एक बंद व्यवस्था की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच के भेद को गहरा करती है, और यह भेद बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव, मानवता का भ्रातृत्व नहीं है; मुसलमानों का मुसलमानों के बीच वाला भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, लेकिन इसका लाभ अपने ही समुदाय के लोगों तक सीमित है और जो इस व्यवस्था से बाहर हैं, उनके लिए इस समुदाय में सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है।

    इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और जो पद्धति, स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाती क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिंक विास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा हैं। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यंत दुष्कर है। जहां कहीं इस्लाम का शासन हैं, वहीं उसका अपना विश्वास है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को भारत को अपनी मातृभूमि और हिंदुओं को अपना निकट संबंधी मानने की इजाजत नहीं देता। संभवत: यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे महान भारतीय, परंतु सच्चे मुसलमान ने, अपने शरीर को हिंदुस्तान की बजाय येरुशलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।’

    बाबा साहेब ने लिखा कि मुस्लिम समाज में तो हिंदू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयां हैं, और मुसलमान उन्हें ‘‘भाईचारे’ जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपा लेते हैं। उन्होंने मुसलमानों द्वारा ‘‘अर्जल वगरे’ के खिलाफ भेदभाव, जिन्हें ‘‘निचले दरजे का’ माना जाता था, के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी परदा प्रथा की भी आलोचना की। बताया कि हालांकि परदा हिंदुओं में भी होता है, पर उसे धर्मिंक मान्यता केवल मुसलमानों ने ही दी है।

    उन्होंने इस्लाम में कट्टरता की आलोचना करते हुए कहा कि मुसलमानों के बीच इस्लाम की नातियों का अक्षरश: अनुपालन की बाध्यता होती है, और इसी वजह से इस्लाम को मानने वालों में बहुत कट्टरता है, और उसे बदल पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन एक देश के तौर पर इस्लाम और मुसलमान को लेकर उनके विचार अलग थे। उन्होंने लिखा है कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं, जबकि इसके ठीक उल्टा, मुसलमान आबादी वाले तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है। 1940 के दशक के शुरुआती वर्षो में उन्होंने कई विवादास्पद पुस्तकें और पच्रे प्रकाशित किए, जिनमें ‘‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है।

    इस पुस्तक में उन्होंने मुस्लिम लीग की उस मांग की जबरदस्त आलोचना की जिसके अंतर्गत लीग मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग कर रही थी।। हालांकि हिंदू-मुसलमानों के बीच की तल्खी जब काफी बढ़ गई तो उनके तर्क में बंटवारे को लेकर बदलाव आया और उन्होंने बंटवारे पर एक तरह से मुहर लगाते हुए कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों को अलग-अलग कर देना चाहिए और पाकिस्तान का गठन हो जाना चाहिए क्योंकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा पनपेगी।

    उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक विभाजन के बारे में अपने विचार के पक्ष में ऑटोमोन साम्राज्य और चेकोस्लोवाकिया के विघटन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का भी उल्लेख किया। इसके बावजूद उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिए पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था। उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिए।

    कनाडा जैसे देशों में भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदू और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते। चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा। विशाल जनसंख्या के स्थानांतरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान में रख कर यह भविष्यवाणी वाकई बहुत सही थी। आज जब इतिहास से हटकर नये संदर्भ में भीम और अल्पसंख्यकों के बीच चुनावी तालमेल किए जाने की बात होती है, तो इस बात पर विास करना मुश्किल हो जाता है कि कभी बाबा साहेब दलित को जितनी दूरी ब्राह्मणवाद से रखने के पक्ष में थे, उससे कहीं ज्यादा दूरी इस्लाम से रखने के पक्ष में थे।

    उपेन्द्र चौधरी से साभार 

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    3 Comments

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