आदिवासियों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले ‘बिरसा मुंडा’

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पुण्यतिथि पर विशेष

कहा जाता है आदिवासियों ने हमेशा ही संघर्ष किया है उन आदिवासियों में एक बिरसा मुंडा भी थे. उन दिनों आदिवासी अपनी जमीनों से खदेड़े जा रहे थे, उनके पहाड़ छीने जा रहे थे, उनकी जमीन छीनी जा रही है थी, उनके जंगल काटे जा रहे थे, विरोध करने पर गाँव-के-गाँव जला दिये जाते थे। उनकी महिलाओं से बलात्कार किये जा रहे थे, उनके बच्चों को गोली मारी जा रही थी। जंगल के संसाधनों के असली हकदारों से जंगल छीने जा रहे थे।

सन 1890 के आसपास अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर दी थी। आदिवासियों के वे गांव, जहां वह सामूहिक खेती किया करते थे, ज़मींदारों, दलालों में बांटकर राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी गयी थी। इसके विरुद्ध बड़े पैमाने पर आदिवासी आंदोलित हुए और उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू कर दिया।

जिसमें 1890 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ऊलगुलान बड़ी भूमिका में था। लेकिन संख्या और संसाधन कम होने की वजह से बिरसा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया। रांची के इलाकों में पुलिस उनसे आतंकित थी। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने के लिए पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी। बिरसा मुंडा और अंग्रेजों के बीच अंतिम और निर्णायक लड़ाई 1900 में रांची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई।

कहा जाता है कि हज़ारों की संख्या में मुंडा आदिवासी बिरसा के नेतृत्व में लड़े. पर तीर-कमान और भाले कब तक बंदूकों और तोपों का सामना करते? लोग बेरहमी से मार दिए गए। 25 जनवरी, 1900 के अखबारों के मुताबिक इस लड़ाई में 400 लोग मारे गए थे। अंग्रेज़ जीते तो सही पर बिरसा मुंडा हाथ नहीं आए। लेकिन जहां बंदूकें और तोपें काम नहीं आईं वहां पांच सौ रुपये ने काम कर दिया। बिरसा की ही जाति के लोगों ने उन्हें पकड़वा दिया। और उन्हें दो वर्ष की जेल में डाल दिया गया। बताते हैं जेल मे उन्हें प्रताड़ित किया जाता था खाना भी नही दिया जाता था, जिस कारण उन्हें हैजा हुआ और आदिवासीयों के ‘जमीन आबा’ की आज ही के दिन 9 जून 1900 को बिरसा की इस दुनिया से विदाई हो गयी।

लोक गीतों और जातीय साहित्य में बिरसा मुंडा आज भी जीवित हैं। बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल सहित समूचे देश के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है।

डाक टिकट भी जारी:
यह बेहद साधारण सा दिखने वाला शख्स कितना असाधारण रहा होगा इसे केवल इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इसने जीवन के 25 बसंत भी नहीं देखे लेकिन इनका पोट्रेट पार्लियामेंट के म्यूज़ियम में लगा है, इनके नाम पर एयरपोर्ट है, कई विश्व विद्यालय हैं, कई इंस्टीट्यूट, स्टेडियम, जेल व तमाम तरह की संस्थाएं हैं और सरकार ने इन पर डाक टिकट भी जारी किया।
 कई स्थानों पर उनके स्टेचू उसी शान और स्वाभिमान से दृष्टिगोचर हैं  जैसे यह शख्स अपने जीवन में स्वयं था। भारत की सेना में बिहार रेजिमेंट का वॉर क्राई भो इन्हीं के नाम पर है (बिरसा मुंडा की जय)। प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी ने किताब लिखी इन पर।और भी साहित्य सृजन हुआ उन पर। फिल्में भी बनीं जिनमें ” गांधी से पहले गांधी’ ‘ व कुछ अन्य शामिल हैं।

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