रुपये का रसातल की ओर जाना वाकई माथे पर बल लाने वाली स्थिति को पैदा करता हैं आज जो बाजार का रुख हैं उसमे रूपए को लेकर कारोबारियों में हलचल पैदा करता हैं एक तरफ तो वह जीएसटी को लेकर परेशान हैं तो दूसरी तरफ गिरते रुपये की स्तिथि को लेकर परेशान हो रहे हैं। इस समय भारतीय मुद्रा की मौजूदा स्थिति बेहद गंभीर है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत इसी गुरुवार को रिकॉर्ड रूप से निचले स्तर पर आ गई। एक डॉलर 69 .10 रुपए के बराबर पहुंच गया। यह रुपए का रिकॉर्ड अवमूल्यन है, जो पिछले 4 साल में हुआ है। 24 नवंबर 2016 को अवमूल्यन का इससे पहले का रिकॉर्ड है। औसत एक डॉलर औसत 68.86 का हो गया है बाद में मामूली सुधार भी हुआ फिर भी रुपए की स्थिति अब तक के सबसे निचले स्तर पर ही है।
विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अभी स्थिति और बिगड़ सकती है रुपए का और अवमूल्यन हो सकता है एक डॉलर का मूल्य 72 रूपए तक जा सकता है। अगर यह आशंका सही साबित होती है तो रिजर्व बैंक और सरकार के सामने बेहद कठिन चुनौती पेश हो सकती है। रुपए की गिरती स्थिति केंद्र की मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर सकती हैं ।
विडंबना देखिए कि जो नरेंद्र मोदी 2014 के चुनाव में डॉलर के मुकाबले रूपए के लिए कांग्रेस को जी भर कर कोसते थे आज उन्हीं मोदी के राज में रुपया रसातल की ओर है। रुपए के गिरने की कई वजह भी है जिसमें पहली तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं जिन्होंने दुनिया में एक तरह से कारोबारी युद्ध शुरू करा दिया है। जिसके कारण विश्व अर्थव्यवस्था में तेज हलचल है। इसके कारण एशियाई देशों की मुद्रा कमजोर हुई है। ट्रम्प ने ईरान पर व्यापारिक प्रतिबंधित भी थोप दिया है अमेरिका ने ईरान से तेल आयात बंद करने व घटाने का दबाव बनाया तो कच्चे तेल के दाम और 78 डॉलर प्रति बैरल हो गया।
वैसे भी पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम को लेकर बढ़ोतरी का रुख रहा है लेकिन ट्रंप के फैसले से स्थिति और बिगड़ गई। रुपए की कीमत गिरती है तो कच्चे तेल के आयात खर्च बढ़ेगा। इसका असर दोतरफा होगा। एक तरफ व्यापार घाटा बढ़ेगा, तो दूसरी तरफ पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ने से परिवहन और माल ढुलाई की लागत भी बढ़ेगी। जिससे तमाम दैनिक उपभोग की चीजों पर असर पड़ेगा। विदेश यात्रा और वहां के पर्यटन का खर्च भी मंहगा होगा।
फिलहाल जिस तरह से अमेरिका और चीन में कारोबारी जंग छिड़ी है। उससे निर्यात में वृद्धि पर भी गहरा असर पड़ेगा। इसके अलावा जिस तरह से रिजर्वे बैंक की वित्तीय स्थिरता की रिपोर्ट आयी है वह भी चिंता बढ़ाने वाली है। यदि इस रिपोर्ट पर गौर करें तो बैंकिंग क्षेत्र की हालत और भी खराब हो सकती है। यह तथ्य सामने आ चुका है और पूरी संभावना भी है कि मौजूदा वित्त वर्ष के अंत तक सभी बैंकों का एनपीए 12.2 फीसद पर पहुंच सकता है स्थिति यदि यही रही तो सरकार जो अंको की वृद्धि दर हासिल करने का इरादा जाहिर कर रही है उसमे भी रंग में भंग हो सकता है।
-जी क़े चक्रवर्ती







