जी के चक्रवर्ती
हमारे समाज में आज से दो दशक पहले लोगों में शिक्षकों के प्रति आदर एवं भगवान से भी अधिक सम्मान देने और दिलाने की परम्परा थी हम अपने बच्चे की प्रत्येक अच्छी बुरी बातों से अध्यापकों को परिचित कराते थे। अभिभावक सरकारी स्कूल के अध्यापक से भी व्यक्तिगत एवं जीवंत संबंध रखते थे। बच्चों की गलती पर स्वयं उसे न डांटकर उसके अध्यापकों के सामने उसकी गलती का खुलासा करते थे और अध्यापक उन्हीं के समक्ष बच्चे को समझाते थे और बच्चा भी अपने अध्यापक के प्रत्येक एक शब्द को अक्षरत: पालन करने से उनकी महत्ता प्रदर्शित हुआ करती थी, परन्तु आज आधुनिक समाज में इसके विल्कुल उलट होने लगा इसके साथ ही साथ समय बदल चुका है, संयुक्त परिवार बिखर चुके हैं। माता-पिता अपनी एक या दो संतानों को बड़े ही नाजों से पालते हैं, ऐसे में उनके बच्चों को किसी भी प्रकार की असुविधा उन्हें गवारा नहीं हैं, वहीं पर हमारे देश में श्री कृष्ण एवं सुदामा जैसे विद्यार्थी एक ही आश्रम में शिक्षा ग्रहण किया करते थे। ऐसे देश में विद्यालयों का विभाजन एवं पढ़ाई-लिखाई का स्वरूप बदल जाने से शिक्षा के स्तर में पतन होने का साथ ही साथ इसका पतन होता चला गया। विद्यार्थियों की योग्यता इन्ही बातों से बुरी तरह प्रभावित हो रही है।देश को आजाद हुए 70 वर्षों के बाद भी सरकारी नियंत्रण वाले प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में न तो शिक्षा का स्तर सुधर पाया है और न ही शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहाँ के विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाएं ही नहीं मिल पाई हैं। जाहिर सी बात है कि प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा के सुधार के लिए जब तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जायेगा तब तक देश में शिक्षा के क्षेत्र में फैले विसंगतियां और उसकी अवस्था नहीं बदलेगी। निम्न मध्यमवर्ग एवं आर्थिक रूप से सामान्य स्थिति वाले लोगों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल में ही शिक्षा ग्रहण करना उनके लिए मज़बूरी बन गई है। मौजूदा समय में भी देश की एक बड़ी आबादी इन सरकारी स्कूलों के सहारे शिक्षा ग्रहण करते है, फिर वे चाहे कैसे भी हों। इन स्कूलों में न तो योग्य अध्यापक होते हैं और नही विद्यार्थियों के मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।
यहाँ एक बात अवश्य है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अभिभावकों को भी जागरूक करने की परम आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा क्षेत्र में अनेक सरकारी परियोजनाओं के विषय में अभिभावकों की जानकारी का अभाव के कारण बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दे पाते। स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए हमें वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों को भी पुनरीक्षित करना होगा। शिक्षा, मात्र परीक्षा पास करने या नौकरी/रोजगार पाने का संसाधन मात्र नहीं है, वल्कि शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने एवं स्वथ्य जीवन के निर्माण के लिए परम आवश्यक है। शिक्षा के लिए हमारी शिक्षा की नीतियों की जो कमियाँ है उन्हें सबसे पहले दूर करना होगा। जिससे शिक्षा के स्तर को सुधारा जा सके। प्राचीन युग में समाज के लोगों ने शिक्षा की व्यवस्था अपने लाभ के लिए अपनी इच्छा के अनुरूप की थी। उस समय राज्य की शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं था। मध्य कालीन युग में शिक्षा की व्यवस्था दान तथा धार्मिक संस्थाओं द्वारा किया जाता रहा। इतिहास से हमें ज्ञात होता है कि प्रत्येक धार्मिक संस्था ने शिक्षा के क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप का जमकर विरोध किया।
हमारे देश में शिक्षा का स्तर आज भी निचले स्तर पर बना हुआ है। विशेष कर देश के बिहार एवं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के विद्यार्थियों को बुनियाद सुविधाएँ आज भी उपलब्ध नहीं है। हमारे देश में शिक्षा को शैक्षिक अभियानों जैसे सभी के लिए शिक्षा से जोड़ कर उसे देश के लोगों को विशेष कर नगरों के अशिक्षित एवं गांवों के लोगों को शिक्षित करने के लिए एक वैतरणी के रूप में उसके विस्तार की कोशिशें की गई, इसके फायदे नुकसान को बगैर समझे-बूझे कि ऐसे अभियानों के अनाप सनाप तौर तरीके से इसका विस्तार किये जाने के दूरगामी प्रभाव क्या और कैसे होंगे? सभी के लिए शिक्षा जैसे अभियानों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाने की मुहिम की शुरुआत की गई थी, जिसमे भारतीय समाज के लोगों की मानव प्रकृति को देशज दृष्टिकोण से देखे बैगर ही उसमे हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया गया, दुर्भाग्य से यह हस्तक्षेप देश में अंग्रेजी जैसी भाषा के उपनिवेश के विस्तार साबित हुई।हमें यह याद रहना चाहिए कि भारत वर्ष के इतिहास में तक्षशिला एवं नालंदा जैसी विश्वस्तरीय शैक्षणिक संस्थाओं के अलावा हमारे यहाँ पर विद्यालयों गुरुकुलों, एवं गांवों में फैले स्कूलों की श्रृंखला वाली पोषित-समाज में फैले शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा चतुराई पूर्वक तहस-नहस कर भारत के अति विकसित ज्ञान एवं उसके उपयोग की समस्त विधाओं एवं व्यवस्थाओं को अंग्रेजों ने अपने हितों को ध्यान में रख कर उसे उनके ही देश में किनारे ढकेल कर यहाँ के भाषा को तिरस्कृत किया। इस तरह से अंग्रेजों ने अपनी पसंद के हिसाब से रुचिकर ज्ञान को यहाँ के जीवन के मुखयः धार से काट कर उसे जड़वत बना कर इतिहास के पन्नों तक सीमित कर उसे संग्रहालय की वस्तु बना डाला। इस तरह से भारत में शिक्षा के लिए एक शून्य स्थान का निर्माण किया ताकि भारत में उनके अनुसार नये सिरे से शिक्षा का एक माहौल निर्मित किया जा सके। इस शून्यता को उन लोगों ने अपने एजेंडे के अनुरूप पढ़ने-पढ़ाने की व्यवस्था से भर दिया ताकि शिक्षा का ऐसे नवनिर्माण हो सके जिससे अंग्रेजी भाषा की विचारधारा, पद्धति एवं ज्ञान भारतीय चिंतन और ज्ञान का स्थान ले ले। भारतीय जनमानस की संस्कृति में उनकी शिक्षा एवं रहन-सहन की सामाजिक व्यवस्था में घुसपैठ कराकर भारतीय जनमानस के कायाकल्प की उनकी योजना धीरे-धीरे सफल होती चली गई। अंग्रेजी उपनिवेश के समय शिक्षा का जो ढांचा उस पर लादा गया वह उपनिवेश होने के उपरांत स्वतंत्र भारत में इसपर प्रश्न उठाने की जगह उसे सही ठहरा कर आंखें मूंद अपना लिया गया, जिसकी वजह से भाषायी ज्ञान में पश्चिमी वर्चस्व का असर दिखने लगा और यह अंग्रेजी शासन काल से अधिक मौजूदा दौर में इसका प्रभाव अधिक दीखाई देता है।
ऐसा नहीं है कि इन विसंगतियो पर किसी का ध्यान नहीं गया हो। देश में इस मुद्दे पर समीक्षा बैठके हुई और विचार-विमर्श भी हुआ लेकिन धीरे- धीरे अधिकांश ऐसे विचार ठंडे बस्ते में चले जाने से इस तरह के विषयों में सैद्धान्तिक विचार धारा, ज्ञान एवं अवधारणाएं पहले यूरोप से उसके बाद अमेरिका जैसे देशों से थोक के भाव आयात हुए जिसे हमने उन्हीं के सांचे में ढाल कर देखना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया में हमारे द्वारा जिस सामाजिक यथार्थ का निर्माण हुआ वह मात्र भ्रम था। देश एवं काल की सीमाओं को लांघ कर वैज्ञानिकता एवं आधुनिकता के घने आवरण में हमारी आधी-अधूरी ज्ञान और समझ ने पश्चिमी ज्ञान को हमारे समाज ने उसे ही सार्वजनिक ज्ञान का दर्जा दे दिया। विज्ञान, साहित्य एवं दर्शन जैसी भारतीय उपलब्धियां अंधकार में लुप्त हो गईं। हालांकि सरकारी एवं प्रदर्शित ज्ञान की श्रेणी से बहिष्कृत होकर भी सार्वजानिक लोक जीवन में टूटे, बिखरे एवं आधे अधूरे अवशेष के रूप में आज भी देखने सुनने को मिलता हैं। योग, संगीत, चित्रकला, आयुर्वेद एवं आध्यात्म जैसे क्षेत्रों में हमारा ज्ञान आज भी चमक बिखेर रहा है, लेकिन ज्ञान की स्वीकृत परम्परा में हमारा कोई स्थान नहीं होने से उसकी स्वीकृति आज भी दोयम या तीसरे दर्जे की होने की कटु वास्तविकता है। ज्ञान-विज्ञान की स्वमं देशज परंपरा को अनावश्यक रूप से हमने रोक कर उसे व्यर्थ बना दिया। वहीं हम विदेशी चाल-चलन को अपना कर नित नए विषयों को शुरू कर उसे अपनाते चले जा रहे हैं। ज्ञान की अंधी दौड़ बादस्तूर जारी है जिससे हमें अपने गंतव्य का पता तो नहीं है साथ ही साथ आज के भूमंडलीकरण और वैश्वीकरण के नये दौर में हमारी अपनी पहचान एवं अस्मिता गौण होती चली जा रही है।

हमारे देश की ज्ञान एवं बौद्धिक -परंपराओं को संदेह की नजरों से देखते हुए उसे दोयम दर्जे की श्रेणी में डालकर पश्चिमी ज्ञान एवं संस्कृति को अंधाधुंध तरीके से अपनाते चले जा रहे हैं। जिसके फलस्वरूप यहां का नवीन शिक्षा जड़ों से नष्ट होकर समय से पूर्व ही इसकी शाख़ सूखने लगी एवं उसके स्थान पर जो भी नवीन पौध रोपा गया उसने यहां के जमीनी स्तर पर जो सहज एवं स्वाभाविक था उसे खारिज करते हुये अध्ययन की एक परिपाटी के ढली पद्धति को अत्मसात कर आगे बढ़ गया जिसमें ज्ञान, मूल्य, चरित्र और संस्कृति जैसे अंतस इस्थित सरोकारों को संबोधित करने की स्थान पर संपूर्ण शैक्षिक प्रक्रिया ही सतही विमर्श तक सिमट कर रह गई।
आज अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण ज्ञान-सृजन में हम पिछड़ते चले जाने के अलावा मौलिकता से हम कोसो दूर होते चले गए। ज्ञान की दृष्टि से सरकारी नीति एवं नियत में सिर्फ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की चिंता ही प्रमुख रहा है, जिसकी वजह से इसके लिए लगातार संसाधन एवं सुविधाएं जुटाने का प्रयास होता है। हमारे समाज के मानस, संस्कृति एवं जीवन का दायरा बड़ा होने से मानविकी, समाज विज्ञान एवं कलाओं पर हमारा ध्यान नहीं जा पाता है। पश्चमी विद्या एवं भाषा तो हमारे देश की भाषा एवं साहित्य के क्रम में कहीं ठहरते ही नहीं।
उच्च शिक्षा में हमारी दिशाहीन का घातक परिणाम यथास्थितिवाद, अनुकरण और सृजनात्मकता के भीषण ह्रास के रूप में दिखने लगा है। इससे निकले छात्र-छात्राओं की लंबी जमात की कुंठाएं एवं विकृतियां जगजाहिर हैं। उनमें से बहुसंख्यक ज्ञान और प्रशिक्षण की दृष्टि से अपरिपक्व हैं और पात्रता नहीं रखते। आजीविका के अवसर भी इतने कमतर हैं कि उसके लिए भी मारा- मारी मची हुई है जो कि संपूर्ण व्यवस्था को ही शर्मसार करती है। आज की स्थिति यह है कि योग्यता से निचले स्तर के पदों के लिए भी हजारों हजार की संख्या में कहीं अधिक योग्य प्रत्याशियों की भीड़ खड़ी दिखाई देती है। दूसरी तरफ अनेक पद खाली पड़े हैं, क्योंकि उनके लिए योग्य अभ्यर्थी नहीं मिल पा रहे हैं। आज युवकों द्वारा उच्च शिक्षा में दाखिला केवल समय गुजारने के लिए होता है। जबकि उनकी मूल रुचि शिक्षा में होने के स्थान पर विकल्प के अभाव में वे उच्च शिक्षण संस्थानों में जितने दिन हो सके, बने रहने की वजह से आज उच्च शिक्षा संस्थाओं की स्थिति दयनीय होती जा रही है। इक्के-दुक्के शैक्षणिक संस्थानों को छोड़ के बाकी सभी राजनीति के अखाड़े बनते जा रहे हैं जीसकी वजह से ऐसी शैक्षिक संस्थानें अपनी स्वायत्तता खोते चले जा रहे हैं। चूंकि शिक्षा का मसला शासन सत्ता की वरीयता सूची में नहीं होने से उनकी विभिन्न समस्याओं को लेकर उदासीनता बनी रहती है जिसके कारण वहां की समस्याएं और भी विकराल हो जाती है। छोटे-बड़े अनेकों विश्वविद्यालयों में स्थायी कुलपति भी नहीं होने से वहां कामचलाऊ व्यवस्था जारी है। ऐसे ही अनेको किरणों से विश्वविद्यालयों की गरिमा घटती चली जा रही है। आज ज्ञान के केंद्रों में सन्नाटा पसर रहा है या फिर अर्थहीन कोलाहल की धूम मची हुई है। विश्वविद्यालयों में विश्वस्तरीय शिक्षा की जमीनी सच्चाई का आकलन कर उसमे सुधार करने की बहुत आवश्यकता है।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







