डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारत सदियों तक परतंत्र रहा। लेकिन यह गुलामी राजनीतिक और प्रशासनिक थी। वास्तविकता यह कि अपना देश सांस्कृतिक रूप से कभी गुलाम नहीं रहा। अन्यथा अन्य प्रचीन संस्कृति और सभ्यताओं की भांति यह भी विलुप्त हो जाती। क्रूर शासक भी कुम्भ जैसे आयोजनों को रोक नहीं सके, तुलसी का विरवा हमारे घरों से कभी अलग नहीं हुआ, गाय के प्रति हमारी आस्था कभी कम नहीं हुई। अंग्रेजों के आने तक हमारे गांव स्वायत्त और स्वावलंबी थे। साक्षरता का स्तर बहुत ऊंचा था। यह तथ्य अंग्रेजों द्वारा बनाई गई समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताई थी। इसका निहितार्थ यह भी था कि हमारे गांवों में जातिगत सामंजस्य भी था। क्योंकि इसके अभाव में ग्राम्यस्वायत्तता व स्वालंबन संभव ही नहीं था। अंग्रेजों ने फुट डालो राज्य करो नीति के तहत जातिपन्थ के मतभेद बढ़ाने का कार्य किया।
इन सबके बाबजूद भारत की शास्वत संस्कृति आज भी जीवंत है। इसका प्रवाह कायम है। वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष शुक्ला ने अपनी पुस्तक में शाश्वत संस्कृति का जय हो से महिमामंडन किया है। इसमें तर्कपूर्ण ढंग से भारतीय संस्कृति के महत्व और प्रासंगिकता को प्रमाणित किया गया। पुस्तक का शीर्षक अपने में बहुत कुछ कह जाता है। एक तो हमारी संस्कृति शाश्वत है। अर्थात यह सदैव प्रासंगिक रहने वाली है।
लेखक और उनकी पुस्तक का विमोचन करने वाले दोनों ही लोग भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ विद्वान हों तो सम्बंधित समारोह का स्तर स्वभाविक रूप से बढ़ जाता है। आशुतोष शुक्ला की पुस्तक जय हो का विमोचन उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्य्क्ष हृदय नारायण दीक्षित ने किया। हृदय नारायण दीक्षित भी भारतीय संस्कृति पर प्रमाणिक लेखन करते है। वह तथ्य ,तर्क और प्रमाणों के आधार पर लेखन करते है। आशुतोष शुक्ल भी इसी विधा में सिद्ध हस्त है। हृदय नारायण दीक्षित अनेक पत्र पत्रिकाओं के नियमित स्तंभकार है। आशुतोष शुक्ल वरिष्ठ संपादक है।
लेखक आशुतोष शुक्ल कहते है कि सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी सत्य है। आंगन में लगा तुलसी का विरवा सत्य है,संयुक्त परिवार,लोक संस्कृति, गुरु शिष्य परम्परा सत्य है, जबकि इसे नकार कर नकारात्मक व विकृत तर्क देने वाले कम्युनिस्ट शत्रु है। भारत पर लगातार वैचारिक आघात हो रहा है। भारत का रंग भगवा है, यह अग्नि का रंग है। यह परम पवित्र है। अग्नि में जो आया वह पवित्र ,स्वाहा और शुद्ध हो गया। स्वयंवर महिलाओं का राइट टू रिजेक्ट है। यह आधुनिक शब्द है। कुछ समय पहले यह चर्चा में नहीं था। लेकिन भरतीय संस्कृति में आदिकाल से यह अपने ढंग से प्रचलित था।
विधानसभा अध्य्क्ष हृदय नारायण दीक्षित ने कहा कि भारतीय संस्कृति का जन्म कब हुआ यह कोई नहीं बता सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि एक दम से हमारी सभ्यता प्रकट हो गई। इसके पीछे लंबा इतिहास रहा होगा। उच्च कोटि की सभ्यता जब परिलक्षित होती है, इसका भी यही मतलब है कि वहाँ तक पहुंचने से पहले उस सभ्यता का निर्माण चल रहा होगा। वेदों की रचना के विषय में भी यही कहा जा सकता है। हृदय नारायण दीक्षित कहते है कि विश्वमित्र ने सूर्य देव को देखकर जो कहा वह गायत्री मंत्र बन गया। नमस्कार भारतीय संस्कृति का अंग है। यह संस्कृति सत, चित,आनन्द है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विवेक, जिज्ञाषा और दर्शन पर आधारित है। वैदिक साहित्य जिज्ञासाओं से भरा है। प्रश्न करना भारतीय संस्कृति का सौंदर्य है। यह भारत ही नहीं विश्व की बात करता है। हमारे अध्यात्म में भी लोकतंत्र है।
आज ऐसे लेखन की हमारे समाज विशेष रूप से युवा वर्ग को आवश्यकता है। पश्चिमी देश अपनी उपभोगवादी सभ्यता से मुसीबत में फंसते जा रहे है। परिवारों का विघटन हो रहा है, प्रकृति का अत्यधिक दोहन हुआ, वह कुपित है। ओजोन परत पर संकट बढ़ रहा है। मौसम चक्र बदल रहा है। यह ऐसा जाल है जिससे बाहर निकलने का रास्ता अमेरिका ,यूरोप के देशों को नहीं मिल रहा है। विश्व के अनेक इलाके आतंकी हिंसा की चपेट में है। ऐसे में इनका समाधान क्या हो सकता है। इसका उल्लेख हमारे युगद्रष्टा ऋषि आदि काल में ही कर चुके थे। उन्होंने न्यूनतम उपभोग का सिद्धांत प्रतिपादित किया। जो नहीं जानते उन्हें तुलसी का बिरवा की बात साधारण लग सकती है। लेकिन यह बिरवा जब घर के आंगन में लगता है, उसी समय पर्यावरण चेतना का संस्कार जागृत हो जाता है। अब तो वैज्ञानिक शोधों से स्पष्ट है कि तुलसी और पीपल विलक्षण होते है। इनका पत्ता पत्ता ऑक्सीजन प्रवाहित करता है।
शास्वत संस्कृति में दोनों को पूजनीय माना गया। नदियों को सम्मान दिया गया, उनके तट पर उत्सव की परंपरा शुरू की। इसका सन्देश यह भी था कि नदियों को स्वच्छ रखें। उपभोगववादी संस्कृति से पर्यवरण पर संकट बढ़ रहा है। इससे बचने का रास्ता शास्वत संस्कृति में है। इसी संस्कृति ने वसुधा को कुटुंब माना, सबके सुख की कामना है। यह वैश्विक सौहार्द का मार्ग है। ऐसे में शाश्वत संस्कृति की जय हो–!







