जहां सोच, वहां शौचालय…लेकिन शौच की गारंटी नहीं!

0
2245
सोच का संबंध बेशक शौचालय से हो सकता है, लेकिन इसके होने से इस बात की कतई गारंटी नहीं कि शौच भी होगा।
तीन साल पुराना एक छोटा सा अनुभव है, जो आज भी ताजा है…
हुआ यह कि जिस गांव में ट्रांसफर के बाद पत्नी को ज्वॉइन कराने पर पहुंचे थे, वहां एक भी शौचालय नहीं पाकर थोड़ी हैरानी हुई थी। जब हमने लघुशंका निवारणार्थ पूछा कि कहीं आस-पास किसी घर में शौचालय मिलेगा। तो एक स्थानीय शिक्षक ने गांव में फ्लोराइड के आधिक्य से पीले हुए दांतों की नुमाइश करते हुए कहा कि शौचालय तो गांव में नहीं मिलेगा।
थोड़ी हैरत जताते हुए मैंने कहा, एक भी नहीं!
एक्को भी नाहीं। उसने कुल जमा तीन शब्दों को इतना जोर देकर बोला कि उसके कॉन्फिडेंस भरे अंदाज में एक चैलेंज था कि एक भी हो तो लगी शर्त! इस पर वहां आ जुटे बच्चे भी खिलखिलाकर हंस पड़े। गांवों में बच्चों का यूं हंसना नॉर्मल सा है। सामने वाले किसी अजनबी की खिल्ली उड़ जाए, तो खिलखिलाना लाजिमी होता है।
खैर, हमें यह मानने में हिचक के साथ बड़ी दिक्कत हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है कि गांव में एक भी शौचालय ना हो। कुछ घर तो अच्छे-खासे दिख रहे थे, लिपाई, पुताई, रंग-रोगन ठीक-ठाक था। गौर करने पर बिरला वॉल पुट्टी, पीओपी तक अपने होने की गवाही दे रहे थे। मोटरसाइकिल, जीप, बोलेरो, ट्रेक्टर, जुगाड़ वगैरह खड़े थे। पता चला, सरकारी नौकरी में भी कोई दर्जन भर लोग हैं। लेकिन उनके घर भी सोच और शौचालय से पूरी तरह मुक्त ही थे।
आपके घर में भी नहीं है शौचालय? जो कि पास ही था और अच्छा-खासा मकान बना रखा था, के जवाब में भी वे स्थानीय शिक्षक ही उनके प्रतिनिधि की हैसियत से बोले, या को जाणे शौचालय! सब बाहर ही फारिग होते हैं, खुल्ले में।
औरतें कहां जाती होंगी?
सब बाहर मुंह अंधेरे फारिग हो आती हैं।
अगर दिन में जाना पड़े तो?
उजाला होने के बाद नहीं जा सकतीं, सबको दिन निकडऩे से पहले जाकर आना होगा।
फिर भी नौबत ऐसी आ जाए, तो कहां जाती होंगी।
अरे सर, नौबत-वौबत कुछ नहीं आती। दिन निकलने के बाद जा ही नहीं सकतीं।
शौच एक प्राकृतिक अवस्था हो सकती है, लेकिन उसकी प्रक्रिया ग्राम्य व्यवस्था के अधीन थी, उसी से संचालित थी। है भी, बहुतेरे गांवों में। इससे भी क्रूर। मुमकिन है, आपको अंदाजा ही न हो।
इस उजाले का मतलब औरतों के लिए घुप्प अंधेरा है। घूंघट का, रिवाजों का, ग्राम्य व्यवस्था का, मर्दाना अहं का, सडिय़ल परम्पराओं का, अज्ञानता का, बंदिशों का, हिदायतों का, सरहदों का।
हम एकाएक शर्मसार थे। वह हमारे चेहरों से मन की उलझन भांपकर हो-हो कर हंस दिया- लगता है आपको अभी भी यकीन नहीं हुआ है, पूछ लो किसी से भी चाहे।
जल्द ही वहां के माहौल ने प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की तरह साफ-स्पष्ट बता दिया कि शौचालय उनकी नजरों में तुच्छ चीज थी, जिसका स्थान घर में नहीं, बल्कि बाहर, गांव से दूर जोहड़, खेत, मैदान खुले स्थान में था। बोतल-लोटा लेकर खुले में जाना वे शान समझते थे। इसका अर्थ उनके लिए दिशा, मैदान, जंगल, खुली हवा था।
फिर सीन बदला…
ढाई साल पहले राजस्थान सरकार द्वारा पंचायत चुनाव लडऩे वालों की उम्मीद्वारी के पर्चे में एक कॉलम अनिवार्य शौचालय का रखा, तो कम से कम दावेदारों के घरों में एक रात में ही शौचालय खड़े हो गए। फिर प्रधानमंत्री द्वारा शौचालय बनाने की मुहिम ने गांव वालों को यह फॉर्मूला दे दिया कि शौचालय बनवाकर ऊपर खिला-पिलाकर भी दो-तीन हजार रुपए सेफली बचाए जा सकते हैं।
अब ताजा हाल यह है कि जिओ सिम सभी घरों में हैं, शौचालय बीस-तीस घरों में बन चुके हैं, किन्तु चालू एक भी नहीं बताया जाता। उन्हें बतौर स्टोर रूम इस्तेमाल किया जा रहा है।
देखा, मैंने तो आरम्भ में ही कहा था कि सोच का संबंध शौचालय से हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं शौच भी हो ही! उनमें पुराना सामान, टूटी चारपाई, कुर्सियां, पाइप, उपले, पशु आहार,  खाली-पुरानी बोरियां, कट्टे, बटी हुई रस्सियां, मिट्टी के घड़े आदि भी हो सकते हैं। (जो अपनी आंखों से देखा।)
क्योंकि इसके होने के लिए पहले दिमागी शौच से निवृत्ति जरूरी है और वह बिना अवेयरनेस का एनिमा दिए होने से रही। यहां अवेयरनेस की गति बदलते भारत जितनी नहीं है।
(अब जब ‘टाइलेट-एक प्रेम कथा’ नाम से फिल्म ही आ गई है, तो यह सब स्मरण हो आया।)
बहरहाल 71वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हार्दिक शुभकामनाएं…
सुरजीत कुमार की फेसबुक वॉल से

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here