फिल्मों के सपने साकार करते स्टूडियो

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हेमंत पाल

सिनेमा सिर्फ सेलुलॉइड पर उतरी काल्पनिक कहानी ही नहीं होती! इसके पीछे और भी बहुत कुछ होता है! कहानी को फिल्माने के लिए वास्तविक लोकेशन के साथ काल्पनिक लोकेशन भी निर्मित की जाती है! नकली मकान, बाजार, झरने, पहाड़, रेलवे स्टेशन और न जाने क्या-क्या गढ़ा जाता है। जहाँ ये नकली लोकेशन गढ़कर कहानी को फिल्माया जाता है, वो जगह होती है स्टूडियो! इसलिए इन स्टूडियो का इतिहास भी फिल्मों से कम पुराना नहीं है! ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से आजतक मुंबई के इन स्टूडियो की अहमियत कम नहीं हुई! इनकी जरूरत जरूर घट गई! यही कारण है कि धीरे-धीरे मुंबई के फिल्म स्टूडियो बंद होने लगे। सामने आई राजकपूर के आरके स्टूडियो के बिकने की खबर ऐसे स्टूडियो के अब इतिहास बनने की दर्दनाक सूचना जैसा है।

फिल्मों की शुरुआत से आजतक कई अविस्मरणीय फिल्मों की शूटिंग इन्हीं स्टूडियो में हुई। महबूब, आरके, फ़िल्मिस्तान, प्रभात, फैमस, फिल्मालय, बॉम्बे टॉकीज, नवरंग, सिनेविस्टा और नटराज जैसे कई स्टूडियो सौ साल से ज्यादा पुराने फिल्म इतिहास के गवाह रहे हैं! जाने-माने फ़िल्मकार वी शांताराम ने 1942 में पुणे के प्रभात स्टूडियो को छोड़कर मुंबई के परेल इलाके में बसे वाडिया मूवी टाउन को ख़रीदा और उसे राजकमल कलामंदिर का नाम दिया। ‘शकुंतला’ पहली फ़िल्म थी, जिसकी यहां शूटिंग हुई। वी शांताराम ने देश की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म ‘नवरंग’ को भी यहीं फिल्माया गया था। बीआर चोपड़ा ने भी अपनी कई फिल्मों की शूटिंग यहां की! यश चोपड़ा ने बतौर निर्देशक अपनी पहली फ़िल्म ‘धूल का फूल’ से लेकर आख़िरी फ़िल्म ‘जब तक है जान’ का भी कुछ हिस्सा इसी स्टूडियो में फिल्माया। ‘

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शोले’ की डबिंग भी राजकमल स्टूडियो में ही हुई! अब उनके बेटे किरण शांताराम कोशिश कर रहे हैं कि अपने पिता द्वारा इस्तेमाल की गई चीज़ों का म्यूज़ियम बनाया जाए! बॉम्बे टॉकीज उन दिनों का सबसे बड़ा प्रोडक्शन हाउस हुआ करता था! कई शानदार और मशहूर फिल्में देने वाला इस प्रोडक्शन हॉउस का स्टूडियो ‘बॉम्बे टॉकीज’ आज इतिहास के पन्नों में दफन हो चुका है।

देश के बंटवारे के वक़्त फ़ेमस स्टूडियो रुंगटा परिवार के हिस्से में आया था। शुरुआती दौर में गुरुदत्त, जेबी प्रकाश और शक्ति सामंत जैसे कई फ़िल्मकारों के दफ़्तर भी यहीं थे। यहां प्यासा, नीलकमल और ‘सीआईडी’ जैसी कई फ़िल्मों की शूटिंग हुई! लेकिन, 1985 के बाद से यहां शूटिंग बहुत कम हो गई। रितिक रोशन की ‘अग्निपथ’ और ‘आशिक़ी-2’ के कुछ हिस्सों की ज़रूर यहां शूटिंग हुई थी। अब यहां पुरानी फ़िल्मों का रिस्टोरेशन का काम जरूर होता है। यहां पाकीज़ा, मिस्टर इंडिया, शोले और ‘वो सात दिन’ रिस्टोरेशन किया गया।

एक और प्रमुख फ़िल्मालय स्टूडियो की स्थापना शशधर मुखर्जी ने साल 1958 में की थी। उन्होंने यहां दिल दे के देखो, लव इन शिमला और ‘लीडर’ जैसी फ़िल्मों की शूटिंग की! भट्ट कैंप की ज़्यादातर फ़िल्मों की शूटिंग इसी स्टूडियो में होती है। नटराज स्टूडियो को पहले मॉडर्न स्टूडियो के नाम से जाने जाना जाता था। इस स्टूडियो को 1968 में शक्ति सामंत, आत्माराम, प्रमोद चक्रवर्ती, रामानंद सागर और एफ़सी मेहरा ने साथ मिलकर ख़रीदा और नाम दिया नटराज स्टूडियो। यहाँ कई मशहूर फ़िल्में जैसे आराधना, आरज़ू, जुगनू और ‘तुमसे अच्छा कौन है’ की शूटिंग हुई। आख़िरी दौर में यहां अक्षय कुमार की फ़िल्म ‘बारूद’ और टीवी सीरियल ‘अंतरिक्ष’ की शूटिंग हुई थी।

कुछ स्टूडियो इसलिए बंद हो गए, क्योंकि इनमें आग लग गई और सबकुछ जलकर ख़ाक हो गया! ये आग कैसे और क्यों लगी, ये एक अलग कहानी है! जनवरी 2018 में दक्षिण मुंबई के लोअर परेल स्‍थित ‘नवरंग स्‍टूडियो’ में देर रात आग लगी थी। यह स्‍टूडियो कई सालों से बंद पड़ा था। मुंबई के कांजुर मार्ग का सिनेविस्‍टा स्‍टूडियो में भी ऐसे ही आग लगी थी। इसके बाद सितम्बर, 2017 में आरके स्टूडियों में लगी आग ने इस स्टूडियो को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था। इसी के बाद कपूर परिवार ने इसे बेचने का फैसला किया है। मुंबई के चेंबूर स्थित इस स्टूडियो में कई फ़िल्में बनी! यहाँ बनी पहली फिल्म ‘आग’ थी, जिसे 1948 में ही रिलीज किया गया। इसके बाद 1949 में ‘आरके’ में ‘बरसात’ का निर्माण हुआ। इस स्टूडियो की दीवारें बूट पॉलिश, जागते रहो और ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ के बाद ‘प्रेमरोग’ जैसी फिल्मों की शूटिंग की गवाह रही हैं। धीरे-धीरे इन स्टूडियो का बंद होना फिल्म इतिहास की बड़ी घटना है! (ब्लॉग से साभार) 

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