‘प्रक्रिया ही लोकतंत्र की सांस है’ – प्रदीप दुबे
लखनऊ : विधानसभा में सिर्फ भाषण देने से लोकतंत्र नहीं चलता। लोकतंत्र चलता है नियमों से, प्रक्रिया से। उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे ने एक मुलाकात में कही।
प्रदीप दुबे की अपनी ताजा किताब “उत्तर प्रदेश विधान सभा की संसदीय पद्धति एवं प्रक्रिया” का विमोचन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया था। दुबे ने कहा कि ये किताब आने वाले समय में विधायकों, अधिकारियों और शोधार्थियों के लिए “संसदीय लोकतंत्र की पाठशाला” साबित होगी।
बिना नियम के सदन, बिना पतवार की नाव के समान
दुबे ने कहा कि संविधान के निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर विधायिकाओं को अपने नियम खुद बनाने की शक्ति दी थी। वजह साफ थी – समय बदलता है, समस्याएं बदलती हैं, तो प्रक्रिया में भी लचीलापन होना चाहिए।
“लेकिन लचीलापन का मतलब अराजकता नहीं है” – दुबे ने जोर देकर कहा। “तीन स्तंभ हैं लोकतंत्र के – कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका। इनमें विधायिका ही एकमात्र ऐसी संस्था है जो पूरी तरह नियम-आधारित है। अगर नियम हट गए तो सदन में सिर्फ शोर बचेगा और जनता के असली मुद्दे पीछे छूट जाएंगे।”
उन्होंने प्रक्रिया को विधायिका की “जीवनरेखा” और “आधारशिला” बताया। “जिस तरह शरीर के लिए सांस जरूरी है, उसी तरह विधायिका के लिए प्रक्रिया जरूरी है”, उन्होंने बताया।
नए विधायकों के लिए क्यों जरूरी थी ये किताब?
पिछले कुछ सालों में विधानसभा का कामकाज देखने के बाद दुबे को एक बड़ी कमी महसूस हुई। कई नए विधायक जोश के साथ सदन में आते हैं, लेकिन उन्हें पता ही नहीं होता कि अपना मुद्दा कैसे उठाएं। कब प्रश्न पूछें, कैसे ध्यानाकर्षण लगाएं, स्थगन प्रस्ताव क्या होता है – इन बेसिक बातों की जानकारी न होने से वो प्रभावी नहीं बन पाते।
इसी सोच के साथ “उत्तर प्रदेश विधान सभा की संसदीय पद्धति एवं प्रक्रिया” किताब लिखी गई।
किताब की खास बातें:
- आसान भाषा: भारी-भरकम कानूनी शब्दों की जगह आम बोलचाल की हिंदी में हर नियम समझाया गया है।
- उदाहरण: हर प्रक्रिया के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा के पुराने उदाहरण दिए गए हैं ताकि पढ़ने वाला तुरंत कनेक्ट कर सके।
- – व्यावहारिक गाइड: ये सिर्फ थ्योरी नहीं है। ये स्टेप-बाय-स्टेप बताती है कि एक विधायक जनता की समस्या को सदन तक कैसे पहुंचा सकता है।
दुबे ने उम्मीद जताई कि ये किताब अधिकारियों और मीडिया के साथ-साथ कॉलेज के राजनीति शास्त्र के छात्रों के लिए भी बेहद उपयोगी साबित होगी।
प्रश्नकाल से लेकर संकल्प तक – प्रक्रिया के हथियार : दुबे ने अपने भाषण में विस्तार से बताया कि प्रक्रिया विधायकों को कितनी ताकत देती है।
“सरकार को घेरने के लिए आपके पास प्रश्नकाल है। कोई जरूरी मुद्दा आ जाए तो ध्यानाकर्षण प्रस्ताव है। किसी नीति पर बहस करनी हो तो संकल्प है। बजट पर कटौती प्रस्ताव है। ये सब हथियार संविधान और नियमों ने ही दिए हैं” उन्होंने कहा।
उन्होंने चेताया कि अगर इन हथियारों का सही इस्तेमाल न किया जाए तो कार्यपालिका मनमानी करने लगती है। “जवाबदेही तय करना विधायिका का सबसे बड़ा काम है। और ये काम बिना प्रक्रिया जाने नहीं हो सकता” – दुबे ने कहा।
वाजपेयी से सीखें, हंगामा नहीं तर्क करें
श्री दुबे ने देश के दिग्गज सांसदों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, मधु दंडवते, चंद्रशेखर और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे नेता इसीलिए याद किए जाते हैं क्योंकि वो प्रक्रिया के उस्ताद थे।
“वाजपेयी जी 2 मिनट में भी ऐसा सवाल पूछ देते थे कि पूरी सरकार को जवाब देना पड़ता था। मधु लिमये नियमों की एक-एक लाइन जानते थे। उन्होंने कभी माइक नहीं तोड़ा, कभी कुर्सी नहीं उछाली। सिर्फ नियमों के दम पर सरकार को झुका दिया” – दुबे ने कहा।
“आज हमें ऐसे ही विधायकों की जरूरत है। जो हंगामा नहीं, तर्क करें। जो नारे नहीं, नियमों से बात करें”।
यूपी मॉडल – संविधान की आत्मा, यूपी की जरूरत
दुबे ने बताया कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के नियम बाकी राज्यों से थोड़े अलग क्यों हैं।
“संविधान एक फ्रेम देता है। उसके अंदर हर राज्य को अपने घर की जरूरत के हिसाब से फर्नीचर लगाना होता है” – उन्होंने रूपक के जरिए समझाया।
उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी, जटिल समस्याएं और विविधता को देखते हुए यहां की प्रक्रिया में कुछ विशेष प्रावधान रखे गए हैं। “अगर हम दिल्ली या महाराष्ट्र की कॉपी करेंगे तो यूपी का भला नहीं होगा। इसलिए लचीलापन जरूरी है” – उन्होंने कहा।
विशेषज्ञों की राय – “ये किताब मील का पत्थर साबित होगी”
किताब के विमोचन के बाद कई वरिष्ठ विधायकों और संसदीय विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखे। उनका मानना था कि अक्सर नियमों की किताबें बहुत तकनीकी होती हैं। आम आदमी और नए विधायक उन्हें पढ़कर डर जाते हैं।
लेकिन दुबे की ये किताब “यूजर फ्रेंडली” है। इसमें फ्लोचार्ट, केस स्टडी और पुराने वाद-विवाद के उदाहरण दिए गए हैं। इससे पढ़ने वाला बोर नहीं होगा बल्कि सीखेगा।
श्री दुबे ने कहा, “मेरा सपना है कि 5 साल बाद जब कोई नया विधायक सदन में जाए तो उसके हाथ में संविधान के साथ ये किताब भी हो। क्योंकि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब उसके सिपाही यानी विधायक प्रशिक्षित होंगे।”
श्री दुबे ने कहा कि दूसरे राज्य भी उत्तर प्रदेश के इस मॉडल को अपना सकते हैं।







