हिंदी राजभाषा नहीं लोकभाषा

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पंकज चतुर्वेदी

दिल्ली के एक नामचीन पब्लिक स्कूल के कक्षा तीन के बच्चे को गृह-कार्य डायरी में लिख कर भेजा गया कि बच्चे का ‘श्रुत लेखन’ का टेस्ट होगा। बच्चे के माता-पिता अंग्रेजी माध्यम से पढ़े थे। अपने परिचितों को फोन कर वे पूछते रहे कि यह क्या होता है?

लखनऊ के निकट चिनहट के एक माध्यमिक स्कूल की कक्षा आठ की एक घटना राज्य में शिक्षण व्यवस्था की दयनीय हालत की बानगी है। स्कूल शुरू होने के कई महीने बाद विज्ञान की किताब के पहले पाठ पर चर्चा हो रही थी। पाठ था पौधों के जीवन का। दूसरे या तीसरे पृष्ठ पर लिखा था कि पौधे श्वसन क्रिया करते हैं। बच्चों से पूछा कि क्या वे भी श्वसन करते हैं तो कोई बच्चा यह कहने को तैयार नहीं हुआ कि वे भी श्वसन करते हैं। यानी जो कुछ भी पढ़ाया जा रहा है उसे व्यावहारिक धरातल पर समझाने के कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं, महज तोता रटंत को ही शिक्षा मान लिया जा रहा है।

भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय का प्रारंभ इस उद्देश्य से किया गया कि वहां सभी तकनीकी विषयों की शिक्षा हिंदी में दी जाएगी। इसमें कुल 231 पाठ्यक्रम हैं। पिछले साल इसमें से 170 में एक भी प्रवेश नहीं हुआ। 14 कोर्स में केवल एक-एक छात्र है तो 46 पाठ्यक्रम ऐसे हैं, जिनमें पढ़ने वालों की संख्या 10 से भी कम है। गौर करें कि वे बच्चे जो उच्च शिक्षा में अंग्रेजी को व्यवधान मानते रहे हैं, बेहद कम फीस के साथ जब हिंदी में शिक्षा की व्यवस्था हुई तो भी वे क्यों नहीं आए?

विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर हिंदी के कुछ शब्दों पर गौर कीजिए- भेषज विज्ञान (फार्मेसी), भ्रमणभाष (मोबाइल), अंतरताना (वेबसाइट)। यही कारण है कि यहां पिछले साल इंजीनियरिंग में सात छात्र थे जो इस साल घट कर दो रह गए हैं।

ये तीन घटनाएं बानगी हैं कि जब हम हिंदी में संप्रेषण के किसी माध्यम की चर्चा करते हैं, उस पर प्रस्तुत सामग्री पर विमर्श करते हैं तो सबसे पहले गौर करना होता है कि उस माध्यम को पढ़ने-देखने वाले कौन हैं, उनकी पठन क्षमता कैसी है और वे किस उद्देश्य से इस माध्यम का सहारा ले रहे हैं। विडंबना है कि हिंदी को राजकाज की भाषा बनाने के सरकारी प्रयासों ने हिंदी को अनुवाद की, और वह भी भाव-विहीन व संस्कृतनिष्ठ हिंदी बना कर रख दिया है।

यहां जानना जरूरी है कि हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं के मानिंद राजभाषा ही है, न कि राष्ट्रभाषा, फिर भी देश में केवल हिंदी दिवस मनाया जाता है, कभी पंजाबी, कन्नड़ या सिंधी दिवस नहीं। जबकि हिंदी की असल ताकत हमारे राज्यों की भाषाएं व बोलियां ही हैं। 11857 के करीब जनगणना में महज एक प्रतिशत लोग साक्षर पाए गए थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उससे पहले भाषा, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, आयुर्वेद, ज्योतिष, अंतरिक्ष का ज्ञान हमारे पास नहीं था। वह था- देश की बोलियों में, संस्कृत में, उससे पहले प्राकृत या पालि में जिसे सीमित लोग समझते थे, और वे ही उसका इस्तेमाल करते थे। फिर अमीर खुसरो के समय आई हिंदी, हिंद यानी भारत के गोबर पट्टी की संस्कृति, साहित्य व ज्ञान की भाषा, उनकी बोलियों का एक समुच्चय। हिंदी साहित्य का भक्ति काल 1375 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। यह हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ युग है। समस्त हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवि और उत्तम रचनाएं इस युग में प्राप्त होती हैं।

सूरदास, नंददास, कृष्णदास, परमानंद दास, कुंभनदास, चतुभरुजदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, हितहरिवंश, गदाधर भट्ट, मीराबाई, स्वामी हरिदास, सूरदास- मदनमोहन, श्रीभट्ट, व्यास जी, रसखान, ध्रुवदास तथा चैतन्य महाप्रभु। इसके अलावा कई मुस्लिम लेखक भी सूफी या साझा संस्कृति की बात कर रहे थे। इस तरह से हिंदी के उदय ने ज्ञान को आम लोगों तक ले जाने का रास्ता खोला और इसीलिए हिंदी को प्रतिरोध या परंपराएं तोड़ने वाली भाषा कहा जाता है। भाषा का अपना स्वभाव होता है अैर हिंदी के इस विद्रोही स्वभाव के विपरीत जब इसे लोक से परे हट कर राजकाज की या राजभाषा बनाने का प्रयास होता है तो उसमें सहज संप्रेषणीय शब्दों का टोटा प्रतीत होता है।

आज जिस हिंदी की स्थापना के लिए पूरे देश में हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है उसकी सबसे बड़ी दुविधा है मानक हिंदी यानी संस्कृतनिष्ठ हिंदी। ऐसा नहीं है कि आम लोगों की हिंदी में संस्कृत से कोई परहेज है। उसमें संस्कृत से यथावत लिए गए तत्सम शब्द भी हैं तो संस्कृत से परिशोधित हो कर आए तद्भव शब्द जैसे अग्नि से आग आदि भी हैं। इसमें देशज शब्द भी थे, बोलियों से आए स्थानीय शब्द और विदेशज भी जो अंग्रेजी, फारसी व अन्य भाषाओं से आए।

यदि आंकड़ों पर भरोसा करें तो हिंदी में अखबार व अन्य पठन सामग्री के पाठक हर साल बढ़ रहे हैं लेकिन जब हिंदी में शिक्षा की बात आती है तो उसके हाल ‘अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय’ जैसे हो जाते हैं। यह समझना अनिवार्य है कि हिंदी की मूल आत्मा उसकी बोलियां हैं और विभिन्न बोलियों को संविधान सम्मत भाषाओं में शामिल करवाने, बोलियों के लुप्त होने पर बेपरवाह रहने से हिंदी में विदेशी और अग्रहणीय शब्दों का अंबार लग रहा है। भारतीय भाषाओं और बोलियों को संपन्न, समृद्ध किए बगैर हिंदी में काम करने को प्रेरित करना मुश्किल है।

संचार माध्यमों की हिंदी आज कई भाषाओं से प्रभावित है। विशुद्ध हिंदी बहुत ही कम माध्यमों में है। दृश्य और श्रव्य माध्यमों में हिंदी की विकास-यात्र बड़ी लंबी है। हिंदी के इस देश में जहां की जनता गांव में बसती है, हिंदी ही अधिकांश लोग बोलते-समझते हैं, इन माध्यमों में हिंदी विकसित एवं प्रचारित हुई है। इसके लिए मानक हिंदी कच्छ बनी हैं। ध्वनि-संरचना, शब्द संरचना में उपसर्ग-प्रत्यय, संधि, समास, पद संरचना, वाक्य संरचना आदि में कुछ मानक प्रयोग, कळ्छ पारंपरिक प्रयोग इन दृश्य- श्रव्य माध्यमों में हुए हैं, किंतु कुछ हिंदीतर शब्दों के मिलने से यहां विशुद्ध खड़ी बोली हिंदी नहीं है, मिश्रित शब्द, वाक्य प्रसारित, प्रचारित हो रहे हैं।

असल में कोई भी भाषा ‘बहता पानी निर्मला’ होती है, उसमें समय के साथ शब्दों का आना-जाना लगा रहता है। यदि हिंदी को वास्तव में एक जीवंत भाषा बना कर रखना है तो शब्दों का यह लेन-देन पहले अपनी बोलियों व फिर भाषाओं से हो, वरना हिंदी एक नारे, सम्मेलन, बैनर, उत्सव की भाषा बनी रहेगी। 

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