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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    ‘ताई’ युग की बिदाई!

    By April 16, 2019 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    ये आशंका सही साबित हुई कि भारतीय जनता पार्टी ने इस बार इंदौर लोकसभा सीट से सुमित्रा महाजन ‘ताई’ को उम्मीदवार नहीं बनाएगी! पार्टी ने ये फैसला काफी पहले कर लिया था! इस राज को खुलते-खुलते उम्मीदवारों की 16 लिस्ट सामने आ गई! लेकिन, इस पूरे प्रसंग का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि भाजपा ने अपनी महिला नेता की सम्मानजनक बिदाई नहीं की! बल्कि, उन्हें इस बात के लिए मजबूर किया गया कि वे खुद आगे बढ़कर चुनाव से इंकार करें, और अंततः ये हुआ भी! यदि पार्टी 75 पार वाले फार्मूला पर अडिग थी, तो इसकी जानकारी दी जा सकती थी! इस पूरे घटनाक्रम के बाद भी कुछ सवाल अनुत्तरित हैं कि ‘ताई’ को रास्ते से हटाने का मूल कारण क्या है? विधानसभा चुनाव के समय उनका अड़ियलपन या किसी मामले में उनके प्रति पार्टी की नाराजी?

    हेमंत पाल

    इंदौर लोकसभा की सीट को देश की हाईप्रोफाइल सीटों में से है। इसका कारण भी सुमित्रा महाजन उर्फ़ ‘ताई’ को ही माना जा सकता है! वे 30 साल में हुए 8 लोकसभा चुनाव यहाँ से जीती, जो अपने आपमें एक रिकॉर्ड है! लेकिन, इन 30 सालों के कार्यकाल में उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया, जिसे उनकी उपलब्धियों में गिना जाए! उन पर एक समाज विशेष तक सीमित होने के भी आरोप लगे! उनके आसपास भी राजनीतिक जमावड़े का हमेशा अभाव देखा गया! ‘ताई’ ने अपनी राजनीतिक ताकत का कभी मतदाताओं के लिए इस्तेमाल नहीं किया! सक्रियता के नाम पर वे मंत्रियों और मंत्रालयों को चिट्ठी लिखने तक सीमित रहीं! अपनी राजनीतिक पारी का अंत भी उन्होंने चिट्ठी लिखकर ही किया! किंतु, इस चिट्ठी ने उनका कद नहीं बढ़ाया, बल्कि घटाया है। देश के पाँच बड़े संवैधानिक पदों में से एक लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंची ‘ताई’ को पार्टी से परेशान होकर खुद ही उम्मीदवारी से मुक्त होने की घोषणा करना पड़ी!

    अभी तक पार्टी नेतृत्व की तरफ से जो संकेत मिल रहे रहे थे, उनका निष्कर्ष यही था कि उम्र के लिहाज़ से पार्टी उन्हें ‘मार्गदर्शक मंडल’ की लिस्ट में शामिल कर चुकी है। इस लिहाज से 75 पूरे कर चुकी सुमित्रा महाजन की राजनीतिक पारी अब समाप्त हो गई! लेकिन, शायद वे यह बात स्वीकरने को तैयार नहीं थीं! इंदौर में पार्टी के लिए खुद को ज़रूरी मानते हुए दो महीने से चुनाव की तैयारी में लगी थीं। उनका निर्वाचन क्षेत्र के पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों से मिलने-जुलने का सिलसिला भी जारी था। उन्हें पूरा भरोसा था कि पार्टी के पास उनका कोई विकल्प नहीं है! लेकिन, ये उनकी ग़लतफ़हमी रही! अपनी राजनीति के सफ़र के हर चुनाव में ‘ताई’ की दावेदारी लगभग चुनौतीविहीन रही है। उन्हें बिना मांगे टिकट मिलता रहा, लेकिन इस बार उन्हें संघर्ष के बाद भी नाकामी ही मिली। क्योंकि, पार्टी ने 75 वर्ष से अधिक की उम्र वाले नेताओं को टिकट न देने का फ़ैसला किया है। हर जीत में उन्हें पार्टी की चुनावी मशीनरी और बेहतर प्रबंधन का फ़ायदा मिला है। चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और कांग्रेस के नेताओं के आपसी मतभेदों का भी उन्हें लाभ मिला।

    1989 में जब भाजपा ने पहली बार सुमित्रा महाजन को कांग्रेस के प्रकाशचंद्र सेठी के सामने इस सीट पर उतारा था! इसके बाद तो यह सीट उन्हीं के नाम हो गई! जबकि, सुमित्रा महाजन इससे पहले विधानसभा का चुनाव महेश जोशी से हार चुकी थीं। वे 1982-85 के कार्यकाल में इंदौर महानगर पालिका में पार्षद भी रही हैं। लेकिन, लोकसभा उनको इतनी रास आई कि उन्होंने तीन दशक में 8 बार चुनाव जीते! इस बार उन्होंने एक विवादस्पद बयान जरूर दिया था कि वे किसी ‘योग्य व्यक्ति’ को ही इंदौर की चाभी सौंपेगी! जबकि, वो योग्य व्यक्ति कौन होगा, इसका चयन करने का काम उनका नहीं बल्कि पार्टी का है! वे ऐसा बयान देने की हकदार भी नहीं हैं! ये फैसला पार्टी का होता है और आखिर पार्टी ने उनके पल्ले से चाभी खोलकर अपने कब्जे में कर ही ली!

    ‘ताई’ के लिए इस बार ज्यादा मुसीबत कांग्रेस नहीं, उनकी अपनी पार्टी के नेता ही रहे! भाजपा नेता सत्यनारायण सत्तन ने तो चुनौती ही दे डाली थी कि यदि पार्टी ने इस बार भी ‘ताई’ को उम्मीदवार बनाया, तो वे भी मैदान में उतरेंगे! लेकिन, उन्होंने खुद टिकट नहीं मांगा! जिनको टिकट देने की मांग की, उसमें एक नाम भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का भी था। ये नाम आज भी चर्चा में है और जोरशोर से है कि ‘ताई’ के बाद यदि इंदौर से कोई जीत सकता है, तो वे कैलाश विजयवर्गीय हो सकते हैं! लेकिन, ‘ताई’ के आसपास के लोग शायद इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। चिट्ठी कांड के अगले दिन ‘ताई’ के मराठी समर्थकों की एक बड़ी फ़ौज ने बिना नाम लिए कैलाश विजयवर्गीय का विरोध किया! पहले तो उन्होंने ‘ताई’ को फिर से मैदान में उतरने के लिए मनाने की कोशिश की! लेकिन, जब उन्हें लगा कि ये संभव नहीं है, तो उनका कहना था कि राजनीति में बेदाग रहने वाली ‘ताई’ की क्या ऐसी बिदाई होना थी? समर्थकों ने ये तक कहा कि आपका प्यारा शहर गुंडागर्दी, रंगदारी और माफियाओं के जाल में न उलझे! बड़ा सवाल है कि यह इशारा किसकी तरफ है? ‘ताई’ का सबसे सशक्त विकल्प कैलाश विजयवर्गीय हैं, तो क्या ये निशाना भी उन्हीं पर लगाया जा रहा है?

    ऐसा नहीं कि ‘ताई’ इंदौर की सर्वमान्य नेता रही हैं! उनके खिलाफ कई बार माहौल भी बना, पर अपनी किस्मत के दम पर वे चुनाव जीतती रही! 2009 में तो भाजपा के एक गुट ने उन्हें टिकट देने का भी भारी विरोध किया था! ये विरोध पूरे चुनाव में दिखा और जमकर सेबोटेज भी हुआ! हालात ये हो गए थे कि ‘ताई’ कांग्रेस उम्मीदवार सत्यनारायण पटेल से बड़ी मुश्किल से साढ़े 11 हज़ार वोट से ही चुनाव जीत सकी थीं। वो खुला विरोध था, इस बार फिर भाजपा में ‘ताई’ के खिलाफ आवाज उठी! कभी प्रकाशचंद्र सेठी से इंदौर की चाभी छीनने वाली ‘ताई’ के हाथ से अब पार्टी ने ही चाभी छीन ली। कांग्रेस तो कहीं नजर नहीं आ रही, भाजपा में ही उनसे चाभी छीनने वाले बाँह चढ़ाए खड़े हैं।

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    सुमित्रा महाजन ने 2014 का चुनाव करीब साढ़े चार लाख वोट से जीता था। लेकिन, इस बार इंदौर इलाका भाजपा के कब्जे से बाहर निकल गया! विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने संसदीय क्षेत्र की 8 में से 4 सीटें जीत ली। कांग्रेस अब लोकसभा चुनाव को बराबरी का मान रही है। साढ़े 4 लाख की लीड भी घटकर एक लाख के अंदर आ गई! कांग्रेस का ये भी मानना है कि उसे प्रदेश में चुनावी वादे पूरे करने का भी लाभ मिलेगा। इस बार लोकसभा चुनाव में करीब 25 लाख 70 हजार मतदाता वोट डालेंगे! जबकि, विधानसभा चुनाव में करीब 24 लाख 80 हजार मतदाता थी। एक लाख नए मतदाताओं के नाम जुड़े हैं। नए जुड़ने वालों में ज्यादातर युवा मतदाता ज्यादा हैं, जो पहली बार वोटिंग करेंगे। ये नए मतदाता ही फैसला करेंगे कि लोकसभा में उनका अगला प्रतिनिधि किस पार्टी का और कौन हो!

    क्या इसे इत्तफाक कहा जाना चाहिए कि आरएसएस के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी इंदौर पहुंचते हैं और ‘ताई’ को अपने समर्थकों को राजनीतिक वैराग्य मार्ग की सूचना देना पड़ती है! सुमित्रा महाजन खुद लोकसभा टिकट की दावेदारी से हटीं या उन्हें हटने के लिए मजबूर किया गया? इस सवाल का जवाब सभी को मिल चुका है! अपनी कोशिशों के तहत वे संघ के बड़े नेताओं के संपर्क में रहीं! भैयाजी जोशी से उनका सतत संपर्क रहा और शायद उनका ही इशारा रहा होगा कि पार्टी को फैसला सुनाए उससे पहले वे खुद ही रास्ते से हट जाएं! वही ‘ताई’ ने किया भी, लेकिन उनके समर्थकों को अभी भी यही लग रहा है कि उनकी नेता ने त्याग किया है! जबकि, ये छुपी सच्चाई नहीं है कि उन्होंने कोई त्याग नहीं किया, बल्कि उन्हें रास्ते से हटने के लिए मजबूर किया गया है! इसके साथ ही इंदौर की राजनीति से ‘ताई युग’ की समाप्ति हो गई!

    हेमंत पाल के ब्लॉग से साभार

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