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लोकतंत्र में आंदोलनजीवी

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अंशुमाली रस्तोगी, चिकोटी ब्लॉग से

तो, किसान आंदोलनकारी नहीं ‘आंदोलनजीवी’ हैं! और उनके समर्थक ‘परजीवी’। देश में सचमुच रामराज्य आया हुआ है। कोई किसी को कुछ भी कह-बोल सकता है। ध्यान केवल इस बात का रखना है कि स्वर में असहमति या आलोचना का पुट न हो। नहीं तो भक्त मंडली तैयार खड़ी है समझाने को। उनके समझाने में भी प्रायः ‘दादागिरी’ झलकती है। मगर झेलिए कि आप ‘न्यू इंडिया’ में हैं।

इस वक़्त किस्म-किस्म के ‘जीवी’ मेरे मन-मस्तिष्क में उमड़ रहे हैं। बात बुद्धिजीवी से बहुत आगे निकल चुकी है। मैं बुद्धिजीवियों को ही अब तक जीवियों की पहचान समझता था लेकिन मुझे क्या पता था कि यहां आंदोलनजीवी भी हैं। मगर आंदोलनजीवियों के प्रति सरकार का रुख थोड़ा रुखा है। वह उन्हें बस में करने का जितना प्रयास करती है, वे उतना ही हाथों से फिसलते जाते हैं। देश में दो धड़े बन चुके हैं : एक आंदोलनजीवियों के विरुद्ध हैं और दूसरे समर्थन में। सोशल मीडिया पर दोनों के बीच ‘वाक्-युद्ध’ चलता रहता है। शोर इतना है कि किसी को किसी की आवाज सुनाई नहीं देती।

file photo

किसान आंदोलन का समर्थक होने के नाते मुझे मेरी मित्र-मंडली में ‘परजीवी’ घोषित किया जा चुका है। मुझसे हर किसी की बातचीत लगभग बंद है। सोशल मीडिया पर उन्होंने मुझे ‘ब्लॉक’ कर रखा है। मेरी असमहति उन्हें चुभती है। लेकिन मैं उनकी उपेक्षा का बुरा नहीं मानता। बुरा मानकर कर भी क्या लूंगा। यह दौर भक्ति है। यहां इंसान पूजे जाते हैं। इसीलिए सबकी कथनी-करनी देखता व पढ़ता रहता हूं।

देश में आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है। हर नेता आंदोलन से निकला है। आंदोलन न होते तो यहां इतनी बड़ी-बड़ी लड़ाइयां जीती भी नहीं जातीं। तो क्या वे सभी आंदोलनजीवी थे! इस विषय पर जितना सोच रहा हूं, मेरा सिर उतना ही भन्ना रहा है। नजदीक कोई है नहीं जिससे पूछ सकूं कि गलत वे थे या ये हैं। सवाल पूछना ही तो यहां गुनाह है पियारे।

खामोशजीवी बने रहने से कहीं बेहतर होगा परजीवी बनकर रहा जाए। कुछ तो रीढ़ बची रहेगी। वरना समाज और लेखन में रीढ़विहीनों की जमात तेजी से बढ़ती जा रही है। लोकतंत्र में आप आंदोलनजीवियों के साथ हैं या सत्ताजीवियों के खुद तय करें।

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