Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Tuesday, May 26
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»इतिहास के आईने से

    लखनऊ हमको ना भुला

    By July 14, 2018 इतिहास के आईने से No Comments13 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 2,615
    हेमंत कुमार/जी.के.चक्रवर्ती
    किसी भी स्थान के भूगोल व मिट्टी का वहां पर जन्मे और रहने वालों के शारीरिक संरचना, उसके आचार-विचार आदि पर बहुत प्रभाव पड़ता है। लखनऊ की मिट्टी इतनी मुलायम और लोचदार है कि यहां के कुम्हार एक इंच की छोटी छोटी चिड़िया और दूसरी मूर्तियां बनाते हैं और उनके एक-एक अंग प्रत्यंग बड़ी सफाई से उकेरे व स्पष्ट होते है। गोमती की अविरल शांत धारा के आगोश में सदैव एक हरदिल अजीज साम्यता गुलजार रही है। लखनऊ की मिट्टी की इस कशिश के कारण जो यहां आकर बस गया, गोया वह यहीं का होकर रह गया। लखनऊ के तख्त के अंतिम वारिस ‘जाने आलम’ वाजिद अलीशाह को जब अंग्रेजों ने कोलकाता के मिटियाबुर्ज में कैद कर दिया तो लखनऊ की याद में उन्होंने कहा-
    ”लखनऊ हमको ना भुला
      हम ना भूले लखनऊ 
      हम से छुड़ाये लखनऊ
      लखनऊ हम पर फिदा है 
      हम फिदा ए लखनऊ।”
     ईरान के शियामुस्लमान सादत खां बुरहानुलमुल्क द्वारा लखनऊ की बागडोर संभालने के बाद लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब ने जो जलवे बिखेरे उसकी चकाचोंध में उसके पहले के दौर के बारे में कम बात होती है लोग नवाबी दौर की चर्चा में उलझ कर रह जाते हैं। किन्तु नवाबों के नजर में इस लायक जरूर थी उनके शिया मुसलमान शहादत का बुरहान मुलुक पलती पलती विरासत गुजर रही होगी जो नजर आए थे उसने लखनऊ को अपनी सत्ता का केंद्र बनाया।
       लखनऊ रामायण काल में कोशल प्रदेश का भाग था। कहते हैं लक्ष्मण ने सीता को वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में छोड़ने जाने के समय रात में लक्ष्मण टीले पर प्रवास किया था, बाद में इस स्थान पर उन्होंने इस स्थान पर लक्षणपुरी नाम का नगर बसाया था।प्रसिद्ध इतिहासकार इकरामुद्दीन किदवई ने लिखा है कि लखनऊ के पुराने नगर जिसे लक्ष्मणपुर या लखनवती कहते हैं, जिसके प्रचलित अपभ्रंश लखनऊ है; का मूल स्थान लक्ष्मण टीला है। वास्तव में लक्ष्मण टीला के दुर्ग का अवशेष है जिसमें पुरातात्विक महत्व की बहुत सी वस्तुएं दबी है। टीले से प्राप्त खिलौनों, फलक टूटे मिट्टी के बर्तनों आदि से यह बात सत्य सिद्ध हो चुकी है। मेडिकल कॉलेज,कंपनी बाग, बड़ा इमामबाड़ा इसी टीले के क्षेत्र में जिले के क्षेत्र में बसे हैं। इस टीले पर एक पाताल तोड़ कुआं था और एक शेषजी का मंदिर था जो प्राचीन काल में इतना प्रसिद्ध था कि लखनऊ को छोटी काशी और गोमती को आदि गंगा कहा जाता था।
    रामायण कालीन का दूसरा प्रसिद्ध स्थान बख्शी के तालाब के आगे गोमती के पास चंद्रिका देवी का मंदिर है। यहां अमावस्या का मेला लगता है। कहते हैं कि लक्ष्मण के जेष्ट पुत्र राजकुमार चंद्र केतु अश्वमेध का घोड़ा लेकर गोमती के किनारे जंगल में जा रहे थे, तब रात हो गई और उनको घोर जंगल में विश्राम करना पड़ा। देवी से रक्षा प्राप्ति हेतु उन्होंने देवी के रक्षा-मंत्र का मनोयोग से पाठ किया। देखते देखते वहां चंद्रिका प्रकट हुयी और देवी ने उन्हें दर्शन देखकर अभय दान दिया। यह देवी चंद्रकेतु की इष्ट देवी के रूप में ”चंद्रिका देवी” के नाम से प्रसिद्ध हुई। सैयद सलार मसूद गाजी ने अपने लखनऊ आक्रमण के समय पुराना मंदिर तहस-नहस कर दिया। कई खंडित मूर्तियां व पत्थर वहां आसपास आज भी देखे जा सकते हैं।
    लखनऊ से कानपुर जाने के रास्ते में कुसुम्भी स्टेशन पड़ता है। यहां पर कुशेरी देवी का प्राचीन मंदिर है जो भगवान रामचंद्र के पुत्र राजकुमार कुश की इष्ट देवी है। इसी प्रकार लखनऊ का शीतला माता का मंदिर भगवान राम के अनुज शत्रुघ्न द्वारा स्थापित है। धरती के गर्भ से खुदाई से प्राप्त अद्वितीय अष्टभुजी दुर्गा की मूर्ति चौकी की छोटी कालीजी के मंदिर में स्थापित है।
    रावण के इष्टदेव भगवान शंकर का नाम कोणेश्वर भी था। रावण ने लक्ष्मण को नीति की शिक्षा दी थी। अपने गुरु रावण व महादेव की सेवा में लक्षमण जी ने कोणेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की थी।
    1 महाभारत काल के बारे में कहा जाता है कि महाराज युधिष्टिर के पोते जनमेजय ने यह क्षेत्र ब्राह्मणों को दान कर दिया था। इस कारण क्षेत्र में बहुत से आश्रम स्थापित हुए। अयोध्या, कानपुर में बाल्मीकि आश्रम तथा सीतापुर नैमिषारण्य के लालता मंदिर तथा चक्रतीर्थ और मिश्रिख में दाधीचि ऋषि के आश्रम तथा हरदोई के साण्डी तहसील स्थित शाण्डिल्य ऋषि के आश्रम से लखनऊ आवर्त्त है। सन 1831 के लखनऊ के गजट के अनुसार लखनऊ के आसपास के बहुत से कस्बे व मोहल्ले पौराणिक काल से जुड़े हुए हैं। जैसे नगराम नहुष से नगराम,वाणासुर के साथी दैत्य केशरी के नाम से केशरमऊ माण्डव्य ऋषि के नाम से मिडियांव प्रसिद्ध है। वाणासुर की पुत्री उषा से उरबा प्रसिद्ध है। भगवान कृष्ण अपने प्रपौत्र अनिरुद्ध को खोजते हुए यहां आये थे। जुग्गौर के महाराज जन्मेजय ने नाग यज्ञ किया था। गोमती के किनारे कुड़ियाघाट पर पहले कौंडिन्य ऋषि का आश्रम था।

    कौशल राज के पाराभव के बाद यह क्षेत्र मगध के शासन में आ गया। इसके बाद गुप्त साम्राज्य ने इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लिया। कहते हैं कि महाराजा विक्रमादित्य ने अयोध्या प्रवास के दौरान एक रात देखा कि एक अत्यंत कला व्यक्ति सरयू में स्नान करने आया और स्नान करने जे बाद वह स्वर्ण के समान दै दीप्तयमान हो गया। यह देख कर सम्राट विक्रमादित्य आश्चर्य से भर उठे। उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि हे महात्यमन! आप कौन है? यह कैसा चमत्कार है? उस विलक्षण व्यक्ति ने उत्तर दिया- “हे राजन! मै तीर्थराज प्रयाग हूँ। मै अपने यहां आने वालों का पाप धोते-धोते काला हो जाता हूँ। तब मै हर तीसरे वर्ष यहां आकर पतितपावनी सरयू में स्नान करके अपना सारा कलंक धो डालता हूं। महाराज यह स्थान भगवान से श्रीराम का जन्म स्थान है अयोध्या है। इसकी महिमा अपार है।” इसके बाद विक्रमादित्य ने अयोध्या को फिर से बसाया और लखनऊ उनके साम्राज्य का पूर्वी दुर्ग व स्कन्धावार बना। बड़े-बड़े हिन्दू सम्राटो के पतन हो जाने के बाद हिमालय की तलहटी से कुछ जातियां यहां आई और इस क्षेत्र का शासन संम्भाला। इनमे भारशिव व पासी प्रमुख थे। राजा बिजली पासी का किला व मुहम्मदी नगर के टीले तथा मोहनलालगंज के पास दादूपुर की टेकरी से बहुत से सिक्के, मिट्टी के टूटे बर्तन व क्षत-विक्षत देव विग्रह निकले हैं, जो कुषाणकालीन हैं तथा इस क्षेत्र की सभ्यता की प्राचीनता ईसापूर्व तक सिद्ध करते हैं।

    कोशल राज के पाराभव के बाद यह  क्षेत्र मगध के शासन में आ गया। इसके बाद गुप्त साम्राज्य ने इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लिया। कहते हैं कि महाराजा विक्रमादित्य ने अयोध्या प्रवास के दौरान एक रात देखा कि एक अत्यंत कला व्यक्ति सरयू में स्नान करने आया और स्नान करने जे बाद वह स्वर्ण के समान दै दीप्तयमान हो गया। यह देख कर सम्राट विक्रमादित्य आश्चर्य से भर उठे। उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि हे महात्यमन! आप कौन है? यह कैसा चमत्कार है? उस विलक्षण व्यक्ति ने उत्तर दिया- “हे राजन! मै तीर्थराज प्रयाग हूँ। मै अपने यहां आने वालों का पाप धोते-धोते कला हो जाता हूँ। तब मै हर तीसरे वर्ष यहां आकर पतितपावनी सरयू सरयू में स्नान करके अपना सारा कल्मष धो डालता हूं। महाराज यह स्थान भगवान से श्रीराम का जन्म स्थान है अयोध्या है। इसकी महिमा अपार है।” इसके बाद विक्रमादित्य ने अयोध्या को फिर से बसाया और लखनऊ उनके साम्राज्य का पूर्वी दुर्ग व स्कन्धावार बना। बड़े-बड़े हिन्दू सम्राटो के पतन हो जाने के बाद हिमालय की तलहटी से कुछ जातियां यहां आई और इस क्षेत्र का साशन संम्भाला। इनमे भारशिव व पासी प्रमुख थे। राजा बिजली पासी का किला व मुहम्मदी नगर के टीले तथा मोहनलालगंज के पास दादूपुर की टेकरी से बहुत से सिक्के, मिट्टी के टूटे बर्तन व क्षत-विक्षत देव विग्रह निकले हैं, जो कुषाणकालीन हैं तथा इस क्षेत्र की सभ्यता की प्राचीनता ईसापूर्व तक सिद्ध करते हैं।

    महमुद गजनवी की हेरात निवासी भतीजे ने भतीजे सालार मसूद गाजी ने 1030 ईo में लखनऊ पर आक्रमण किया। सन 1202 ईo में बख्तियार खिलजी ने लखनऊ पर हमला किया। इसके साथ ही इस क्षेत्र के मंदिरों, मूर्तियों का लोगों की जान माल की इज्जत आबरु सब पर आपका शादी दिल्ली के मुस्लिमों की सल्तनत स्थापित होने से लेकर मुगलों की दिल्ली उजड़ने तक लखनऊ धर्मान्ध,बर्बर मुस्लिम आक्रमणकारियों का शिकार बना रहा। इन 600 वर्षों तक चले मुस्लिमों हमलों के कारण पिछली सर्दियों सहस्त्राब्दियों के सारे विकास कार्य और निर्माण ध्वस्त हो गये। यही कारण है कि नवाबी काल के पहले की कोई इमारत सुरक्षित अवस्था में नहीं है। लखनऊ जनपद तथा इसके आसपास के क्षेत्र क्षत-विक्षत प्रतिमाओं, मंदिरों के भग्नावशेषों से पटे पड़े हैं।

    महमुद गजनवी की हेरात निवासी भतीजे ने भतीजे सालार मसूद गाजी ने 1030 ईo में लखनऊ पर आक्रमण किया। सन 1202 ईo में बख्तियार खिलजी ने लखनऊ पर हमला किया। इसके साथ ही इस क्षेत्र के मंदिरों, मूर्तियों का लोगों की जान माल की इज्जत आबरु सब पर आपका शादी दिल्ली के मुस्लिमों की सल्तनत स्थापित होने से लेकर मुगलों की दिल्ली उजड़ने तक लखनऊ धर्मान्ध,बर्बर मुस्लिम आक्रमणकारियों का शिकार बना रहा। इन 600 वर्षों तक चले मुस्लिमों हमलों के कारण पिछली सर्दियों सहस्त्राब्दियों के सारे विकास कार्य और निर्माण ध्वस्त हो गये। यही कारण है कि नवाबी काल के पहले की कोई इमारत सुरक्षित अवस्था में नहीं है। लखनऊ जनपद तथा इसके आसपास के क्षेत्र क्षत-विक्षत प्रतिमाओं, मंदिरों के भग्नावशेषों से पटे पड़े हैं।

    औरंगजेब ने जब यहां सन 1664 ईo में हमला बोला। उसने लक्ष्मण तीर्थ की प्रसिद्धि देखकर यहां के तत्कालीन गवर्नर सुल्तान अलीशाह कुलीखान को इस मंदिर के ध्वंस करने के आदेश दिये। यही काम उसने मथुरा के कृष्ण मंदिर तथा कानपुर के बिठूर स्थित ध्रुव टीले के मंदिर तथा वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर के साथ किया। इन सभी स्थानों पर ऊंचे टीले पर औरंगजेब की बनवाई आलमगिरी मस्जिदें खड़ी है और उन टीलों के अन्दर  पुरातात्विक महत्व के अवशेष दबे पड़े अवध क्षेत्र के जितने भी किले हैं उनमें उत्खनन करने पर पुरातात्विक महत्व के अवशेष दबे पड़े हैं। अवध क्षेत्र के जितने भी टीले टिकरे हैं, उन सब मे उत्खन्न पर पुरातत्विक महत्व की सामग्री प्राप्त होती रहती है। लखनऊ जनपद के कुषाणकालीन तथा गुप्तकालीन विष्णुमूर्तियों, शिवलिंग व देवी-प्रतिमायें समय-समय पर मिलते रहे हैं, जो विभिन्न संगठनों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

    हुलास खेड़ा कि कार्तिकेय की स्वणर्मूर्ति, सरोजनीनगर के नृत्यमग्न गणेश की मूर्ति और बेरोली के आवक्ष नारी की प्रतिमा खुदाई से प्राप्त हुई हैं। सनातन हिंदू धर्म के साथ-साथ लखनऊ जैन तीर्थ भी रहा है और यह लक्ष्मणावती तीर्थ के रूप में जैनियों के बीच दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। यवनकाल में ध्वस्त किए गये जैन मंदिरों की प्रतिमाओं को नये जैन मंदिरों में स्थापित किया गया है।

    लखनऊ बौद्धों का भी प्रिय क्षेत्र था। लखनऊ में उनका प्रसिद्ध अमोहसी विहार था। जिसको आजकल हम अमौसी के नाम से जाना जाता है। लखनऊ जनपद के विभिन्न स्थानों से प्राप्त कुछ प्रसिद्ध देवविग्रहों में हैं-

    1.उनई से प्राप्त कात्यायनी की मूर्ति 9वीं सदी की बताई गई है।
    2. आरम्बा से प्राप्त विष्णु की मूर्ति मौर्यकालीन मानी गई है।
    3. अमानीगंज से प्राप्त बरह की मूर्ति मौर्य कालीन मानी गई है।
    4. दिलवंशी से प्राप्त शिवलिंग, 10वीं सदी का माना गया है।
    5. डिगोई से प्राप्त गोमती की मूर्ति 12वीं सदी की मानी गई है।

    सल्तनतकाल और मुगलकाल के नवाबों के पहले की बनी इमारतों को गौर से देखा जाये तो पता चलता है कि इनके निर्माण में यहां के ध्वस्त भवनों, मंदिरों व मूर्तियों के अवशेषों का भरपूर उपयोग किया गया है। लखनापासी की गढ़ी को परिवर्तित कर मछलीभवन बना दिया गया। टीले वाली मस्जिद के गुंम्बद पर राजपूतों की छतरियां लगी हुई है। मलिहाबाद में गाजी मसूद की पासी राजाओं से घमासान लड़ाई हुई। जिसमे मल्ली पासी की गढ़ी ध्वस्त हो गई। शेरशाह सूरी के काल में इसी जगह पर बारहखम्भा छतरी और शाही मस्जिद शेख पठानों ने बनवाई तथा पुरानी बावली पर नया घाट बनवा दिया। इस घाट के पत्थर तथा बारहदरी के बारहों खम्भे पासी राजा कंस के कंसमण्डप मंदिर से लाये गये हैं। गुप्तकालीन हिन्दूकला के नमूने इन पर एकदम स्पष्ट हैं। बाकी सारी भवन सामग्री शेखों ने अपने-अपने मकानों और मजरों को बनवाने में लगा ली।

    आज का काकोरी कस्बा पुराना कर्कोटकपूरी है, जो नागवंशी भारशिवों का गढ़ था। कुतुबुद्दीन ऐबक के सिपहसलार बख्तियार खिलजी ने यहां आक्रमण किया और बख्तियार नगर बसाया। तब से लेकर सिकंदर लोदी तक यहां सांप्रदायिक दंगे मारकाट व विध्वंस चलता रहा। काकोरी में इस काल की प्रमुख इमारत “झंझरी का रोजा” है। इसकी लाल ईंटे रोहतास के किले से लाई गई है। इसका दरवाजा देवी मंदिर से लाया गया तरणद्वार है। इसके खम्भे कई मंदिरों से लाए गये हैं। जिनमें हाथी का मुख और कमल के फूल बने हुए हैं, जो इस्लामिक वास्तुशास्त्र के सर्वथा विपरीत है।

    शेख मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेर वाले के भांजे रहमतुल्लाह शाह का मकबरा तुगलगों की वास्तुकला के अनुसार बना है। आजकल यह नादानमहल के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें लगे कांक्रीट के ब्लॉक नगराम के भारशिवों के किलों से उतार कर लाए गए थे। इसके प्रवेशद्वार के दोनों ओर हिंदू मंदिरों के पत्थर के हिस्से लगे हैं। जिन पर हिंदू चित्रकला पद्धति के बेलबूटे उभरे हुए हैं। शेख अब्दुर्रहीम भी यहीं दफन है जो वह जहांगीर के मानसदार थे और लखनऊ में उस समय नियुक्त थे। उन्होंने धनवंती तथा किसना महाराजिन से शादी कर ली थी। यह मकबरे किसना महाराजिन के बाग में गये हैं। इसमे गुप्तकालीन धर्मध्वजी जी मंदिर के नागर कला की डिजाइनों से सजे बारह पहल वाले 20 खम्भे मकबरे के बरामदों में और 12 भीतर की दीवार तक में लगे हैं। सोलह खम्भो वाले मंदिर जगमोहन में शेख के परिवार वालों का कब्रिस्तान है।

    नुरबाड़ी में औरंगजेब के  लखनऊ के सूबेदार अलीशाह कुलीखान की कब्र है। यहां पर लक्ष्मण के शेष तीर्थ-मंदिर की देहरी चौखट लगी है। यह लक्ष्मणतीर्थ का एक मात्र बचा स्मृति चिन्ह है। उसको आज भी यह देखा जा सकता है।

    लखनऊ क्षेत्र को इस नरकीय यातना से मुक्ति यहां के प्रथम नवाब सआदत खां बुरहान-उल-मुल्क के आगमन से मिली। शिया नवाबों के यहां के लोगों से मेलजोल के साथ सत्ता स्थापित की। इस सौहार्दपूर्ण  माहौल में लखनऊ में एक ऐसी सभ्यता परवान चढ़ी, जिसके चर्चे आज भी दुनिया भर के लोगों के जुबान पर है। नबावों के समय में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई दंगा या झगड़ा नहीं हुआ।

    नवबीकाल काल के हजारों सशत्र मौलवियों ने अयोध्या पर हमला करने की कोशिश की थी। नवाब ने अपने फ्रांसीसी जनरल के आधीन सेना को पराजित करके अयोध्या पर हमले को नाकाम कर दिया था जिससे अयोध्या की जनता ने राहत की सांस ली थी। नवाब वाजिदअली शाह से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसका जवाब इस शेर से दिया-

    “इश्क के बंदे हैं,
    मजहब से नहीं वाकिफ 
    गर काबा हुआ तो क्या,
    बुतखाना हुआ तो क्या” 
    नवाबी दौर के मुसलमानों ने मंदिर बनवाये तो हिंदुओं ने मस्जिदें बनवाई। और मुहर्रम के ताजिये रखे। नवाबों द्वारा बनवाये मन्दिर अलीगंज, टिकैतगंज, नवलगंज और सरायेशेख में देखा जा सकता है। इसी प्रकार अमीनाबाद, मौलवीगंज, मेहंदीगंज और ठाकुरगंज में हिंदुओं की बनवाई गई मस्जिदें आज भी सिर उठाये खड़ी है जो गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है।
    -(ये एक लखनऊ की पुरातात्विक व ऐतिहासिक विवेचना है जिसे इतिहासकार हेमंत जी और पत्रकार जीके चक्रवर्ती ने लिखा है)

    Keep Reading

    Trump's Stern Ultimatum to Iran: 'Complete Surrender' on Nuclear Missiles—or an Attack?

    दुनिया युद्ध की आग में घिरी: शांति की उम्मीद कमजोर

    Fire rains from the sky! India's 50 hottest cities are ranked, with Uttar Pradesh leading again.

    आसमान से बरस रही आग! भारत के 50 सबसे गर्म शहरों पर कब्जा, यूपी फिर से सबसे आगे

    Not swearing in a councilor declared elected is highly condemnable, undemocratic, and unconstitutional: SP leader Vandana Mishra,

    निर्वाचित घोषित किए गए पार्षद को शपथ न दिलाना बेहद निंदनीय, अलोकतांत्रिक और संविधान विरोधी कृत्य: सपा नेत्री वंदना मिश्रा पूर्व महापौर प्रत्यासी

    Chowk Santoshi Mata Temple is the center of faith and belief

    आस्था और विश्वास का केन्द्र है चौक सन्तोषी माता मन्दिर

    A gift from the Yogi government! A massive job fair offering 2,500+ jobs for youth.

    योगी सरकार का तोहफा! युवाओं के लिए 2500+ नौकरियों का विशाल रोजगार मेला

    भीषण लू का अलर्ट! किसानों के लिए जारी हुई महत्वपूर्ण सलाह, फसल-पशु बचाओ

    Add A Comment
    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts

    फुकेट के ‘एंडामंडा वाटर पार्क’ ने पर्यटकों के लिए पेश किए शानदार ‘प्रीमियम अनुभव’

    May 25, 2026
    K.C. Bokadia’s ‘Teesri Begum’: A Fierce Revolt by Three Wives!

    के सी बोकाडिया की ‘तीसरी बेगम’: तीन पत्नियों की जोरदार बगावत!

    May 24, 2026
    The world's largest free old-age home will become a support for 5,000 elderly people.

    5000 बुज़ुर्गों का सहारा बनेगा दुनिया का सबसे बड़ा मुफ्त वृद्धाश्रम

    May 24, 2026
    Trump's Stern Ultimatum to Iran: 'Complete Surrender' on Nuclear Missiles—or an Attack?

    दुनिया युद्ध की आग में घिरी: शांति की उम्मीद कमजोर

    May 23, 2026
    Fire rains from the sky! India's 50 hottest cities are ranked, with Uttar Pradesh leading again.

    आसमान से बरस रही आग! भारत के 50 सबसे गर्म शहरों पर कब्जा, यूपी फिर से सबसे आगे

    May 23, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading