आस्ट्रेलिया के जंगलों की आग पृथ्वी की भावी पारिस्थितिकी के लिए एक मार्गदर्शिका है. इस देश के लगभग तीन-चौथाई भूभाग को शुष्क, अर्ध शुष्क अथवा मरुभूमि की श्रेणी में रखा गया है. जलवायु जनित चालू अग्निकांडों के बाद इस अनुपात में एक खतरनाक बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि इसका हमारे उत्तराखंड राज्य से बड़ा एक इलाका, जो देश के अपेक्षाकृत रिहायश के माकूल और घनी आबादी वाले दक्षिण-पूर्वी तट से लगा है, जो इस अग्निकांड में स्वाहा हो चुका है. मानवीय गतिविधियों की वजह से उपजाऊ भूमि के मरुभूमि में तब्दील होने की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है.

ऑस्ट्रेलिया आप्रवासियों की भूमि से प्रवासियों जलवायु के प्रकोप से बने शरणार्थियों की भूमि में बदल रहा हो या नहीं, क्या इसकी हमारे लिए कोई अहमियत है? ऑस्ट्रेलिया का यह परिवर्तन कोई अटकलबाजी का विषय न रहकर एक वास्तविकता में बदल चुका है, क्योंकि 2.60 करोड़ आबादी के इस देश की आधी से अधिक जनसंख्या इस अग्निकांड से प्रभावित हुई है.

अमेरिकी जलवायु विशेषज्ञ माइकल मैन का कहना है, ‘अब यह समझ में आनेवाली बात है कि ऑस्ट्रेलिया का बड़ा हिस्सा सीधी तौर पर अत्यधिक गर्म एवं सूखा होकर मानवीय बसावट के प्रतिकूल बन जाये.’
अभूतपूर्व सूखे की वजह से उल्लेखनीय 2010 का दशक ऑस्ट्रेलिया के इतिहास में सबसे गर्म दशक के रूप में जाना जाता है. उल्लेखनीय रूप से अधिक तापमान और गर्म हवाएं वनों और बाकी भूमि को इस कदर सुखा देती हैं कि वे आसानी से आग के शिकार बन जाते हैं. नतीजा यह है कि पूरा पारिस्थितिक तंत्र और कई समुदाय तहस-नहस हो चुके हैं. हजारों लोगों ने अपने घर और खेत खो दिये हैं. सिडनी यूनिवर्सिटी के भूपारिस्थितिकी वैज्ञानिक क्रिस डिकमैन के एक दकियानूसी अनुमान के मुताबिक भी इस लंबे अग्निकांड में मारे जानेवाले जानवरों और पक्षियों की संख्या एक अरब के लगभग है. यह पूरी तरह एक मानव जनित कयामत है.

file photoकिसी को भी इस पर कोई विशेष संदेह नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया के तेजी से चढते तापमान की जडें इसकी ऊर्जा संबंधी नीतियों में हैं. यहां की सियासी पार्टियों को इस देश की जीवाश्म ईंधन लॉबी से बड़ा चंदा मिला करता है… इसलिए इसमें कोई अचरज नहीं कि ऑस्ट्रेलिया विश्व में कोयले, तेल तथा गैस के उपयोग के सबसे बड़े पैरवीकारों में एक है. यहां की राज्यव्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं. प्रायः यहां के प्रधानमंत्रियों का निहित स्वार्थ जलवायु परिवर्तन से इनकार करने में न्यस्त रहा करता है.
सऊदी अरब के बाद ऑस्ट्रेलिया ही विश्व में दूसरा सबसे बड़ा प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जक देश है. यह चीन, भारत और अमेरिका के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक भी है. यही नहीं, यह विश्व का सबसे बड़ा कोयला निर्यातक भी है. इसके अलावा, यह विश्व का सबसे बड़ा तरलीकृत प्राकृतिक गैस निर्यातक भी है. ये सारे तथ्य इसे सऊदी अरब तथा रूस के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा जीवाश्म कार्बन निर्यातक बना देते हैं. इन सबका अर्थ यह है कि यदि ऑस्ट्रेलिया जीवाश्म ईधन के विस्तार से संबद्ध अपनी योजना के लक्ष्य हासिल कर लेता है, तो विश्व 2015 के पेरिस समझौते में वर्णित जलवायु संबंधी लक्ष्यों को कभी भी हासिल नहीं कर सकेगा. इन सबके बावजूद, ऑस्ट्रेलियाई सरकार की पूरी राजनयिक शक्ति यह सुनिश्चित करने में लगी रहती है कि इसकी ऊर्जा संबंधी नीतियां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा से बाहर ही रहें.
आग से इतने बड़े विनाश के बाद भी यहां की सरकार द्वारा 53 नयी कोयला खाने प्रस्तावित की गयी हैं. अंतरराष्टीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015 में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने करदाताओं के लगभग 29 अरब डॉलर कोयला उद्योग को सब्सिडी देने में खर्च किये. इसका मतलब यह था कि प्रत्येक ऑस्ट्रलियाई नागरिक प्रति वर्ष एक हजार डॉलर से भी ज्यादा अपने ही विनाश के लिए चुकाता है.

ऑस्ट्रेलिया के इस महाविनाश से भारत सबक सीख सकता है. पहला तो यह है कि हमें अपने जीवाश्म कारोबारियों को हमारे यहां और विदेशों में भी निरंकुश होने से रोकना चाहिए. हमारे ही देश का एक कारोबारी घराना ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में इतनी बटी कोयला खदान विकसित कर रहा है, जो ऑस्ट्रेलिया ही नहीं, विश्व की भी सबसे बड़ी कोयला खदान होगी. यह कोयला भारत में भी आयात किया जायेगा. नतीजा यह होगा कि यह खदान वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय योगदान तो करेगी ही, क्वींसलैंड तट के समीप स्थित विख्यात ग्रेट बैरियर कोरल रीफ की पारिस्थितिकी का भी विनाश कर देगी. भारत की जलवायु तथा पारिस्थितिक तंत्र ऑस्ट्रेलिया सरीखी ही है. जलवायु के बोते तापमान की वजह से जंगलों की आग की संभावनाएं बस्ती ही जायेंगी. हाल में ही उत्तराखंड एवं कर्नाटक के जंगलों की आग इस दिशा में संकेत करती हैं.
नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार जंगलों की आग हमारे ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार और भी बढा देगी. ऑस्ट्रेलिया की आग भविष्य की भीषणता का संकेत करती है. यह सिर्फ उम्मीद ही की जा सकती है कि जलवायु परिवर्तन के खतरों से इनकार करने की प्रवृत्ति रुकेगी, वरना सभ्यता अपने अवश्यंभावी अंत को प्राप्त होगी.
- असीम श्रीवास्तव







