ईवीएम पर तकरार क्यों?

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imaging: shagunnewsindia.com

राजनीतिक दल चुनाव हारते ही अपना ठीकरा ईवीएम पर ही क्यों फोड़ते हैं इस बात की पड़ताल में जब देखा जाता हैं तो वह महज सिर्फ अपनी भड़ास ही साबित होता हैं जिसे हार का गुबार भी कह सकते हैं लेकिन जब विपक्ष जीतता हैं तब वह शांत रहता हैं।

सही बात कहें तो ईवीएम को लेकर जारी तू-तू-मैं-मैं निस्संदेह, ह्रदयविदारक है। हमारे नेतागण संकीर्ण राजनीतिक सोच के तहत हर संस्था और व्यवस्था पर जिस तरह चोट कर रहे हैं, उनका अंत कहां जाकर होगा कहना कठिन है। एक हैकर, जिसका चेहरा तक हमारे सामने नहीं, वह अमेरिका में बैठने का दावा करता हुआ लंदन के कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सामने आता है, बिना किसी प्रमाण के आरोप लगाता है कि 2014 के आम चुनाव में व्यापक पैमाने पर ईवीएम की हैकिंग हुई थी और उसे सच मानकर भारत में राजनीतिक मोर्चाबंदी हो रही है।

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ऐसा लग रहा है जैसे वह हैकर न होकर ऐसा विश्वसनीय प्राणी है, जिसके मुख से केवल सत्य बाहर निकला हो। उसके सामने हमारा चुनाव आयोग गलत, सर्वोच्च न्यायालय गलत, विशेषज्ञ गलत। वह तो यह भी कह रहा है कि भारत की कई पार्टियों ने चुनाव के दौरान उससे संपर्क किया था। हंगामा करने वाली पार्टियों एवं उनके नेतागण क्या उसके इस आरोप से सहमत हैं? क्या उन्होंने ईवीएम हैक करने के लिए उससे संपर्क किया था? अजीब स्थिति है। कोई यह सोचने को तैयार ही नहीं है कि कहीं उस व्यक्ति के पीछे कुछ भारत विरोधी शक्तियां तो नहीं, जो इस तरह राजनीतिक विभाजन का लाभ उठाकर टकराव पैदा करना चाहती हो।

चुनाव आयोग ने उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराकर एकदम सही कदम उठाया है। उसे पकड़कर भारत लाने की पूरी कोशिश होनी चाहिए। अगर पुलिस टालमटोल करती है तो आयोग को सर्वोच्च न्यायालय जाना चाहिए। आखिर ईवीएम को संदेहास्पद बनाने का अर्थ चुनाव आयोग को संदेहास्पद बनाना है। ईवीएम में गड़बड़ी बगैर चुनाव आयोग की व्यापक संलिप्तता के संभव नहीं। जब चुनाव आयोग बार-बार ईवीएम को हर दृष्टि से विश्वसनीय होने का बयान दे रहा है, देश को आास्त कर रहा है तो इस तरह हंगामों का मतलब क्या निकाला जाए? सर्वोच्च न्यायालय भी चुनाव आयोग की बातों को सही कह चुका है।

कायदे से चुनाव आयोग का आश्वासन अंतिम होना चाहिए था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक दल अपनी लड़ाई में ईवीएम और चुनाव आयोग को घसीट रहे हैं। जिन लोगों ने लंदन में कॉन्फ्रेंस बुलाई थी, उनके खिलाफ भी जांच होनी चाहिए। हालांकि ऐसा करते ही हंगामा मच जाएगा किंतु समय की मांग यही है। जब तक ऐसे लोगों को कठघरे में खड़ा नहीं किया जाएगा चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली को शंका के घेरे में लाने का अमर्यादित खेल चलता रहेगा।

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