छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मोर्चा बन सकता है किंग मेकर!

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शाहिद राईन
महागठबंधन की आवश्यकता जताने वाले यूँ पलटी मार जायेंगे। यह शायद ही किसी को विश्वास रहा हो। मोदी शासन से तंग आये गैर भाजपाई दलों के नीचे से निरंतर जमीन खिसकती रही। वजह थी राज्य दर राज्य भगवा शासन की वृद्धि।
कांग्रेस और क्षेत्रीय दल अपने सफाये से चिंतित हो एकजुट होकर इस बड़ी ताकत से लड़ने के लिये महागठबंधन का ऐलान किया। यूपी के उपचुनावों में इस महागठबंधन के परों मे जान आ गयी और महागठबंधन ऊँची-ऊँची उड़ानों की महत्वाकांक्षा में इतना उड़ा कि आपस में ही छोटे-बड़े की भावना ने पैठ बना ली। यह महागठबंधन मृगमारीच सा दिखा। 2018 के उत्तरार्द्ध में पाँच राज्यों में होने वाले चुनाव में असली रूप सामने आ गया। महागठबंधन की सबसे ज्यादा हिमायती रही देश की एक बड़ी पार्टी को छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जब खुद की मजबूती दिखी (सर्वे और निजी सर्वे के अनुसार) तो उसके सुर बदल गये। वह इतनी अतिविश्वास में हो गयी कि उसे सहयोगी दल बोझ लगने लगे। इन राज्यों में सत्ता की मलाई अब वो अकेले हजम करना चाहती है। बसपा और सपा खुद को ठगे से महसूस करने लगे।
बसपा के लिये तो कांग्रेसी दिग्गजों ने यह कह दिया कि सीबीआई के चलते बसपा महागठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहती किंतु सपा के लिये क्या यही शब्द हैं जबकि सपा सुप्रीमो निरंतर खुद झुकने की बात करते चले आये हैं। या यह शब्द सीबीआई का डर कहीं अपने लिये तो नहीं बता रही थी। सपा-बसपा को जितना लचकना था लचके भी किंतु कांग्रेस ने उनके लचकने को महत्वहीन कर दिया। यह या तो हो सकता है डर हो सरकारी तोते का या फिर इतना अतिविश्वास हो चुका है कि बिना महागठबंधन के छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश व राजस्थान में सत्ता का शिखर चूम लेंगे।
अगर यह अतिविश्वास है तो भी सहयोगियों को इतना नीचा दिखाने का दाँव कहीं उल्टा न पड़ जाये। इन्हें तो सीख लेनी चाहिये अपने सामने वाली प्रबल प्रतिद्वंद्वी दल से। जिसने अपने सहयोगी छोटे-छोटे दलों को भी महत्व देकर उनका कद बढ़ाते हुए अपना कद बढ़ा लिया। किंतु एमपी कांग्रेस अध्यक्ष व कांग्रेस की तरफ से प्रस्तावित मुख्यमंत्री के दावेदार कमलनाथजी ने अतिविश्वास के साथ ही कहा कि वो बिना गठबंधन के भी सरकार बनायेंगे। जनता भले भाजपा के दीर्घ शासन से ऊबी हो, भले बड़े-बड़े सर्वे ऐसा दिखा रहे हों
 किंतु इन सर्वेक्षणों का खेल तो ऊपर बैठे लोग बाखूबी समझते होंगे कि सर्वे को किस तरह मोड़ना है क्योंकि सर्वे से ही जनमत भी प्रभावित होता है। किंतु कहीं यह सर्वे कहीं प्रतिद्वंद्वी का फेंका मायाजाल तो नहीं, इस बारे में भी कांग्रेस को विचार करना चाहिये था। खैर सपा-बसपा सीटें ज्यादा लेतीं तो हो सकता था दूरगामी वक्त में यह प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़े हो आने वाले वक्त में कांग्रेस के लिये इन प्रदेशों में रोड़ा बन सकते थे। क्योंकि इनके वोटर और नीतियों में समानता जो है।
छत्तीसगढ़ के बदले समीकरण कांग्रेस के दाँव को उल्टा करने का दमखम रखते हैं। यहाँ का पूर्वगामी सर्वे अब ढलान पर है। धीरे-धीरे वक्त के साथ कुछ ऐसे ही समीकरण मध्य प्रदेश और राजस्थान में न बन जायें जो कांग्रेस के अतिविश्वास और खुशफहमी को पश्चाताप में बदल दे। इन प्रदेशों में कांग्रेस का दूरगामी डर अगर वाजिब है तो उसे वर्तमान में अदृश्य भय से भी बचने के तरीके ढूँढने होंगे।
यूपी से सटे मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र, बघेलखंड और बुंदेलखंड में सपा-बसपा दोनों का प्रभाव है बसपा का प्रभाव अधिक और सपा का भले ही कम है लेकिन इन क्षेत्रों में पासा पलटने के लिये पर्याप्त है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी भले कम वोटर हो किंतु छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में इसका विस्तार है। नवोदित जन अधिकार पार्टी की भी यूपी से सटे क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ी है। इस दल की अतिपिछड़ी जातियों में अच्छी खासी पकड़ है जो कहीं-कहीं बसपा को काफी कमजोर कर देगी क्योंकि इन क्षेत्रों में जो बसपा के वोटर थे वो भूत में बसपा के कुछ कद्दावर नेताओं के भी समर्थक थे। अब वो अलग हो जन अधिकार पार्टी का गठन कर यहाँ सक्रिय हो चुके हैं।
अगर सपा-बसपा व गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठबंधन हुआ तो इन तीनों क्षेत्रों में यह संयुक्त मोर्चा कोई कमाल दिखा सकता है कमल की ताजगी और सुगंध छीनने के साथ हाथ को सलाम करवाने के लिये उठा सकता है।
यूपी से सटे क्षेत्रों में ‘जाप’ की सक्रियता संभावित संयुक्त मोर्चा के वोटों पर काफी प्रभाव डालेगा। मोर्चा बनने के बाद इन क्षेत्रों में ‘जाप’ का बाट जिधर रख जायेगा वही दल इन क्षेत्रों में भारी पड़ जायेगा।
मध्य प्रदेश में बन रहे नये समीकरण से इस नवोदित दल ‘जाप’ की रणनीति ही तय करेगी कि जनअधिकार पार्टी किस पाले में जा रही है।
राजस्थान में कांग्रेस खुद को अभी भी खतरे से बाहर महसूस कर रही है। उसका निजी सर्वे यहाँ पूर्णतः सत्य के करीब है। किंतु महागठबंधन की भूमिका तैयार करने के लिये कुछ छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना भी एक बड़ा दिल रखना भी जरूरी था।

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