राज्यों में काबिज तो दिल्ली हासिल: 2018 के उत्तरार्द्ध में पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव लिखेंगे मिशन 2019 की गाथा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को चांस की आस!
राहुल कुमार गुप्त
भारत की राजनीति मौजूदा दौर में भले ही दो ध्रुवों में बँटी दिखाई दे रही हो किंतु क्षेत्रीय दलों ने इन दो राजनीतिक ध्रुवों की महत्ता को कम कर के रखा है। वर्तमान में सत्तापक्ष के साथ जुड़े अधिकांश क्षेत्रीय दलों में आपसी सामंजस्य स्थापित करने की वजह से उसकी एक मुख्य चुनौती चुनावी रण से कम हो जाती है। विपक्ष के सहयोगी दलों व उसके बीच खुद की महात्वाकांक्षाओं की जंग के चलते वो कई जगह छिन्न-भिन्न नज़र आते हैं। इस वजह से इनके समक्ष चुनाव पूर्व ही खुद की एक बड़ी चुनौती खड़ी है।भारतीय गणतंत्र के महापर्व की तैयारी का आगाज हो चुका है। सत्तापक्ष व विपक्ष एक-दूसरे को कमतर दिखाने का बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। वाकयुद्ध का हमला दोनों तरफ से तीव्र हो चुका है। आमजनता इन्हीं तीव्र हमलों से अब भाँप लेती है कि कहीं नजदीक चुनाव होने वाला है। 2018 के उत्तरार्द्ध में पाँच राज्यों में चुनाव होने वाला है। इन्हीं चुनावों से देश की आगामी सत्ता के भविष्य की एक छवि उभरकर जनता के समक्ष आ सकती है। ” राज्यों में काबिज तो दिल्ली हासिल” का सिद्धांत ही 2019 की सफलता का मूलमंत्र हो सकता है। इस मूलमंत्र का अनुगामी है सत्तापक्ष (एनडीए)। वह अर्जुन की तरह लक्ष्य साधने निरंतर प्रयास में लगा है। इसके लिये साम, दाम, दंड व भेद की सारी नीतियों का अनुपालन भी कर रहा है। वहीं विपक्ष के दलों में अपनी-अपनी महात्वाकांक्षाओं के चलते वो खुद के महागठबंधन को कमजोर कर रहा है, या बनने से पहले ही बनने नहीं दे रहा है। इसका फायदा उठाने का भरसक प्रयास एनडीए (सत्तापक्ष) कर रही है।
2014 और मोदी जनउम्मीदों का दौर था। मोदी के आने से पहले मोदी के चर्चों के कारण देश के अंदर जो उत्सुकता की लौ प्रकाशमान थी वह मोदी जी के आने के बाद से बुझ सी गयी। राष्ट्रहित के नाम पर जनता ने वो सब सहा जो उसे असहनीय था। किंतु न नोटबंदी का फायदा निकलकर सामने आया, न अव्यवस्थित जीएसटी का। महँगाई की मार अलग। सांप्रदायिक हिंसा में बढ़ोत्तरी, बेहतरीन योजनाओं से इतर किसानों में परेशानी और आमजनमानस में समस्या अधिक रही।
फिर भी इन सब मुद्दों से हटाने के लिये तत्कालीन सत्ता की तरकश में बहुत से मुद्दे रूपी प्रायोजित तीर मौजूद हैं। जो समय-समय पर जनता के समक्ष प्रस्तुत होते रहते हैं।
यह ऐसा दौर था जब आमजनता सत्ता से असंतुष्ट थी, हाँ! एक बड़ा वर्ग सरकार के समक्ष जरूर खड़ा है। ऐसे में मजबूत विपक्ष के साथ लड़ाई रोचक होती। किंतु राज्यों में होने वाले चुनावों से पहले ही विपक्षी एकता का कथित ताना-बाना अलग सा दिखाई पड़ने लगा। जनता बदलाव चाहती है किंतु उसके समक्ष ” किंतु अगला कौन?” के प्रश्न के साथ वो खामोश सी नज़र आती है। लेकिन यह हालात राज्य चुनावों में कतई नहीं है। वहाँ अब मोदी के नाम से नहीं वहाँ के मुखिया के काम से जनमत प्रभावित होगा। लेकिन इसके अलावा भी
जनमत को प्रभावित करने वाला मीडिया और सोशल मीडिया का काफी हिस्सा जब चारण कवि बन जायेंगे तो जनमत कहीं न कहीं प्रभावित जरूर होगा।
यह प्रभाव किन-किन राज्यों में किस तरह से होगा। देखते हैं उन पर एक नज़र।
‘छत्तीसगढ़’ में जहाँ सत्ता परिवर्तन की बयार चलने लगी थी, वह बयार अब वापस उसी राह में लौटने लगी है।
माया-जोगी गठबंधन भले यहां जादूई आँकड़ा न पार कर पाये किंतु 2013 में बहुमत से मात्र 7 सीटों से पीछे रही कांग्रेस की राह कंटक भरी और चुनौतीपूर्ण जरूर कर देगा। अगर तीनों का गठबंधन होता तो शत-प्रतिशत विजय एकतरफा थी। माया-जोगी के मेल से कमल निखरने लगा शायद यह मेल इस बार रमन सरकार के लिये वरदान सा साबित हो।
हाँ! कुछ आरक्षित और कुछ सामान्य सीटों में भाजपा को भी झटका लगेगा लेकिन कांग्रेस की अपेक्षा कम।। 2013 के चुनाव में लगभग 15-20 सीटों में बसपा काफी वोट लेकर तीसरे स्थान पर थी। जोकि इस बार जोगी का साथ पाकर इन आधी सीटों पर तो विजित हो ही सकती है।
माया और जोगी यहां अपना-अपना वजूद लगातार खो रहे थे। इनके साथ आने से भले सीटों की संख्याओं में बहुत बड़ा इजाफा न हो, अस्पष्ट बहुमत के चलते कर्नाटक का नाटक यहां भी खुद को दोहरा सकता है।
इस स्थिति के लिये गठबंधन की चुनावी रणनीति व टिकट बँटवारा ही काफी कुछ तय कर देगा।एससी-एसटी बाहुल्य व जोगी प्रभाव वाली सीटों पर यह गठबंधन अगर 10 से ऊपर सीटें ले आता है और बीजेपी को 49 से 40-41 पे ले आता है तो छत्तीसगढ़ में माया-जोगी किंगमेकर या खुद ही किंग बनकर उभर सकते हैं। किंतु यह गठबंधन भाजपा के कम और कांग्रेस के वोट ज्यादा काटेगा।
अगर कोई चमत्कार न हुआ तो ऐसी स्थिति में यहाँ भाजपा ही सशक्त दिख रही है।। किंतु मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को चाँस मिलने के काफी आसार दिख रहे हैं।। बसपा का कुछ प्रभाव मध्य प्रदेश व राजस्थान में भी है किंतु यहां अलग-थलग होने से यह मात्र कुछ ही सीटों पर प्रभाव डालेगी। अगर महागठबंधन बनता तो विपक्ष के समक्ष चुनौतियाँ नगण्य सी हो जातीं। किंतु ये महागठबंधन बना क्यों नहीं?? केवल कुछ सीटों के बँटवारे को लेकर या इसके पीछे कोई और वजह है कोई और राज है??







