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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    सामाजिक सांस्कृतिक समरसता का सन्देश

    By April 2, 2019 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    भारत विविधताओं का देश है। इसी में हमारी एकता का सन्देश समाहित है। सभी प्रदेशों की अपनी अपनी स्थानीय विशेषताएं हैं। सभी में अपनत्व का भाव है। एकांगी रहने से पूर्णता नहीं आती। सांस्कृतिक सामाजिक पर्यटन देश को कुटुंब जैसा बनाता है। विभिन्न प्रकार के समारोह अवसर प्रदान करते है। इसी संदर्भ में राज्यपाल राम नाईक ने दो परम्पराए शुरू कराई। एक तो उन्होंने उत्तर प्रदेश दिवस मनाने का सुझाव दिया, जिसे योगी आदित्यनाथ सरकार ने स्वीकार किया। चौबीस जनवरी को उत्तर प्रदेश दिवस समारोह अब परम्परा का रूप ले चुका है। दूसरा यह कि राम नाईक ने महाराष्ट्र दिवस समारोह आयोजित किया। उत्तर प्रदेश में अब यह भी परम्परा का रूप ले चुका है।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी प्रत्येक राज्य से आग्रह किया था कि वह किसी अन्य राज्य के साथ सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा दें। योगी आदित्यनाथ ने इसके लिए महाराष्ट्र का चयन किया था। नरेन्द्र मोदी, राम नाईक और योगी आदित्यनाथ के इन सभी कार्यों का उद्देश्य सांस्कृतिक व सामाजिक एकता को मजबूत बनाना था।  इसी क्रम में यहां उड़िया दिवस प्रतिवर्ष मनाया जाता है। लखनऊ में आयोजित होने वाले उड़िया दिवस समारोह में राम नाईक सहभागिता करते रहे है। इस बार के समारोह में राम नाईक ने सांस्कृतिक सामाजिक समरसता का सन्देश दिया।
    अयोध्या शोध संस्थान एवं लखनऊ उड़िया समाज द्वारा आयोजित ओडिसा दिवस का आयोजन किया था। राम नाईक ने इसका समारोह का उद्घाटन किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि उड़ीसा के वरिष्ठ साहित्यकार  देवदास छोटराय, प्रमुख सचिव संस्कृति  जितेन्द्र कुमार, लखनऊ उड़िया समाज के सचिव  डी आर साहू  सहित बड़ी  लोग उपस्थित थे। राज्यपाल ने उड़िया समाज की स्मारिका निर्माल्या का विमोचन किया। उड़ीसी नृत्यांगना कविता मोहन्ती सहित अन्य कलाकारों को भी सम्मानित किया।
    राज्यपाल ने ओड़िसा दिवस की बधाई देते हुए कहा कि उन्नीस सौ छत्तीस में भाषा एवं संस्कृति के आधार पर बंगाल से अलग होकर उडी़सा को एक राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ। उडी़सा को प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर एवं उसकी उत्सवधर्मी संस्कृति विशेष बनाती है। एक अप्रैल को उड़ीसा स्थापना दिवस तथा एक मई को महाराष्ट्र स्थापना दिवस का आयोजन होता था, पर वर्ष उन्नीस सौ पचास  में उत्तर प्रदेश का स्थापना होने के बावजूद भी कोई सरकारी आयोजन नहीं होता था। स्थापना दिवस आयोजन को लेकर मुख्यमंत्री से चर्चा हुई और अन्ततः वर्ष उन्नीस सौ अठारह में अड़सठ वर्ष के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस का आयोजन हुआ, जिसका मुझे बहुत समाधान है।
    हमारा देश अति विशाल एवं समृद्ध संस्कृति वाला है परन्तु अनेकता में एकता इसके मूल में समाहित है। अपनी विविधता के लिए भारत पूरे विश्व में विख्यात है। जैसे बगीचे में फूलों के अलग-अलग रंग देखने को मिलते हैं और इकट्ठा होकर एक माला का रूप लेते हैं उसी प्रकार सभी प्रदेश मिलकर भारत माता की आकृति का रूप लेते हैं और हम सब उसी भारत माता के सपूत हैं। विभिन्न भाषा और संस्कृति के बावजूद सभी भाषाओं में एकरूपता दिखाई पड़ती है , संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है।  भाषा और वेष अलग-अलग हो सकते हैं पर हम सब की संस्कृति की मूल धारणा एक है। विशिष्ट अतिथि  देवदास छोटराय ने उड़ीसा की संस्कृति, साहित्य एवं लखनऊ से अपने रिश्ते पर विस्तार से प्रकाश डाला।
    प्रमुख सचिव संस्कृति जितेंद्र कुमार ने कहा कि विविधता हमारी विशेषता है तथा उत्तर प्रदेश से उड़ीसा का पुराना रिश्ता है। कार्यक्रम में ओड़िसी बैले सीता का मंचन  कविता मोहन्ती तथा लोक नृत्य: घोड़ा नाच गुरू नरेन्द्र प्रसाद परिड़ा द्वारा प्रस्तुत किया गया।
     इसी प्रकार होली भी सामाजिक सांस्कृतिक समरसता का पर्व है। इससे संबंधित समारोह कई दिन तक चलते है। होली के कुछ दिन बाद फर्स्ट अप्रैल हो तो उमंग बढ़ जाती है। ऐसे ही एक  घोंघा बसन्त सम्मेलन’ का लखनऊ में राज्यपाल ने उद्घाटन किया। उन्होंने बेढब बनारसी रंग भारती सम्मान कवि  कमलेश द्विवेदी को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित  किया। इस अवसर पर विधि एवं न्याय मंत्री  बृजेश पाठक सहित बड़ी संख्या में श्रोतागण उपस्थित थे। राम नाईक ने कहा कि  घोंघा बसन्त सम्मेलन वास्तव में एक प्रसिद्ध हास्य कवि सम्मेलन है, जिसका लोग साल भर इन्तजार करते हैं। हास्य कवि सम्मेलन तनाव भरी जिन्दगी में हंसने-हंसाने का माध्यम है। व्यंग्य का आशय हंसाने और विनोद के लिए होना चाहिए न कि किसी का अपमान करने के लिए। कटाक्ष करना और व्यंग्य करने में मौलिक अन्तर है।
    व्यंग्य समाज सुधार के लिए होना चाहिए।  एक अप्रैल को पूरे विश्व में व्यंग्य के कोई न कोई कार्यक्रम आयोजित होते हैं। ‘घोंघा बसन्त सम्मेलन’ जिसे मूर्खों का सम्मेलन भी कहा जाता है, उसी परिपाटी का एक हिस्सा है। छत्रपति शिवाजी के गुरू स्वामी समर्थ गुरू रामदास जी की बात करते हुए कहा कि गुरू रामदास ने ‘दासबोध’ नाम से एक ग्रन्थ लिखा है, जिसमें मूर्ख होने के इकहत्तर  लक्षणों को उल्लिखित किया है। स्वामी रामदास द्वारा बताये गये लक्षणों को पढ़कर लगता है कि वह अपने आप में समाज सुधार का संदेश देने वाला अध्याय है। इस प्रकार ये दोनों ही समारोह समाज को सकारात्मक संदेश देने वाले थे।

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