हेमंत कुमार/जी.के. चक्रवर्ती
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 351 राजभाषा हिंदी की संवैधानिक और प्रचार प्रसार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार राजभाषा हिंदी के प्रसार वृद्धि करना भारत सरकार का उत्तरदायित्व है। इस अनुच्छेद में सरकार को दिशा-निर्देश दिया गया है कि वह राजभाषा हिंदी का विकास और प्रसार किस प्रकार से करें।
अनेकता में एकता भारत की विशेषता है। भारत में भौगोलिक दृष्टि से काफी विविधता है। देश का उत्तरी क्षेत्र हिमालय पर्वत श्रंखला से आच्छादित है। उसकी गोद में कश्मीर, हिमाचल प्रदेश शीतल एवं हरे भरे पहाड़ो से युक्त है। उत्तर पूर्व में मेघालय अधिक वर्षा वाले क्षेत्र हैं तो पश्चिम में राजस्थान, गुजरात और कच्छ के अल्प वर्षा वाले रेगिस्तानी क्षेत्र हैं। दक्षिण का क्षेत्र पठारी है तो बीच में सिंधु और गंगा द्वारा निर्मित हरे भरे मैदान है। धुर दक्षिण-पश्चिम में समुद्र तटीय मैदान है। जलवायु और भूगोल की इस विविधता का प्रभाव यहां के लोगों पर पड़ा है और देश के अलग-अलग प्रान्तों के लोगों का खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा अलग-अलग है। साथ ही यहां पर भिन्न-भिन्न धर्मों, आस्थाओं और मतों को मानने वाले लोग रहते हैं।
हमारे यहां कहावत है कि ‘दो कोस पर पानी और चार कोस पर वानी’ बदल जाती है। हमारे देश में अलग-अलग प्रान्तों में अलग-अलग भाषा-भाषी के लोग रहते हैं। ऐसे बहु आयामी और बहुभाषी देश में राजभाषा हिंदी का विकास और प्रसार करना एक जटिल कार्य है। अनु० 351 कहता है कि राजभाषा हिंदी का विकास व प्रसार इस प्रकार से किया जाए कि वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।
भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। भाषा का आविष्कार भावों को अभिव्यक्त करने के प्रयासों से हुआ है। दूसरी महत्वपूर्ण बात भारत की सामाजिक संस्कृति है। इस अनुच्छेद के अनुसार राजभाषा का विकास और प्रसार इस ढंग से हो कि देश की सांस्कृतिक व भाषिक समरसता बनी रहे और राजभाषा हिंदी सभी घटकों की अभिव्यक्ति का माध्यम बने। विकास और प्रसार के दौरान हिंदीतर भाषा-भाषी को किसी भी प्रकार से यह ना लगे कि उसकी उपेक्षा हो रही है या राजभाषा हिंदी उसपर जबरन थोपी जा रही है।
एक जीवंत भाषा वह होती है जो विभिन्न भाषाओं और बोलियों के शब्दों को आत्मसात करती चलती है। यह कार्य राजभाषा हिंदी में किस प्रकार करें इसके लिए अनुछेद 351 कहता है कि भारत के सामासिक संस्कृति की आत्यमियता में हस्तक्षेप किये बिना हिंदुस्तानी और अष्टम अनुसूची में उल्लेखित संस्था अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली के आत्मसात करते हुए जहां आवश्यक हो वांछनीय हो वहां हिंदी के शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत भाषा से तथा गौणतः अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द ग्रहण करते हुए हिंदी की समृद्धि सुनिश्चित करना, संघ का कर्तव्य है।
इस प्रकार राजभाषा हिंदी के विकास और प्रसार के लिए भारत संघ की सरकार को बहुत महत्वपूर्ण और सारगर्भित दिशा-निर्देश भारतीय संविधान के निर्माताओं के अनुच्छेद 351 के माध्यम से दिया है।







