कव्वे जैसा कोई नहीं!

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कहावतें का अपना एक ठोस आकार प्रकार होता है और वह सच्चाई के बहुत ही करीब होती हैं। ऐसी ही एक कहावत है पंछियों में कौवा और आदमियों में नौव्वा। इस कहावत का आधा अंश फिलहाल हमारे काम का है। जिस पर हमें विस्तार से चर्चा करनी है और इसका दूसरा पक्ष जिस पर और कभी चर्चा की जा सकते हैं।

वैसे दूसरा अंश पहले अंश से इस तरह जुड़ा हुआ है कि उसे उससे अलग कर पाना थोड़ा कठिन कार्य सा प्रतीत होता है। दूसरे अंश पर अपने बातचीत दो चार पंक्तियों में ही कह कर समाप्त की जा सकती है। मान ले सौ आदमी हैं। आदमियों में नवा यानी कि एक या फिर 9 आदमियों को हमें अलग करना पड़ेगा।

बचे 11 -11 में एक आदमी ऐसा होता है जो 10 पर अपना प्रभुत्व कायम रखकर शासन का तंत्र चलाता है। इसी एक आदमी का हम अपनी कहानी में लेकर पहले वाक्यांश से जोड़ने का प्रयास करेंगे। तब जाकर पूरी कहावत का अर्थ हमें अच्छी तरह पकड़ में आएगा।

कौवे का अपना चरित्र होता है जिसका वर्ग का वर्गीकरण हम बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसमें उसकी बुद्धिमता, दूरदर्शिता, धूर्तता, चालाकी, लंपटता कर्कशक्ता एवं साथ ही सेवा भाव आदि का समावेश कर सकते हैं। आश्चर्य होता है कि इतने सारे गुण- दोष और वह भी एक सात कौवे को छोड़कर किसी और पंछी में नहीं पाए जा सकते हैं।

अतः पंछियों में सिरमौर बने रहने का सौभाग्य यदि किसी को प्राप्त होता है तो वह एकमात्र पंछी कौवा ही है यदि घड़े में पानी कम है तो वह उस उस में कंकड़ डालकर पानी पीकर उड़ जाएगा। यदि भूखा है तो निडर होकर रोटी लेकर भाग जाएगा। यदि किसी पेड़ पर उसका घोंसला है तो क्या मजाल आप पेड़ पर चढ़ जाएं। कांव-कांव की कर्कश आवाज निकालकर वह अपनी टोली इकट्ठे कर लेगा और आप पर आक्रमण कर बैठेगा।

यदि धोखे से वह सिर पर बैठ जाए तो समझ लो कि आप पर पहाड़ टूट पड़ेगा। मौत को नजदीक जानकर आपको ठंडा पसीना आने लगेगा। यदि आपको अपने पुरखों से मिलना हो तो भी आपको इसी से संपर्क बनाए रखना होता है। कीड़े मकोड़ों को बड़े चाव से चढ़ कर जाता है। इस तरह वह प्रकृति संतुलन बनाए रखने में भी अपना योगदान देता है।

कहीं काक भूसुंडी बनकर कन्हैया के हाथ से रोटी छीनकर खाने का सौभाग्य भी प्राप्त कर लेता है तो कहीं वह रात के अंधेरे का फायदा उठाकर अपने अंडों को कोयल के घोसले में छोड़ आता है, और बदले में उसके अंडे चुराकर अपनी भूख मिटा लेता है। अंडे काम कोयल करती है और बच्चे पैदा होते हैं कौवे के!

इस तरह वह बड़े शान से जीता है ऐसी ही एक मान्यता है कि जिस पेड़ पर कौए का घोंसला हो उसे कृष्ण पक्ष में काटकर इसी पक्ष में उस की कुर्सी बना दी जाए, तो उस पर बैठने वाले व्यक्ति के अंदर कव्वे के सारे गुण धर्म प्रकट होने लगते हैं। जैसा कि हमने आदमियों की संख्या में से एक आदमी को अलग छाठ लिया था।

वह आदमी जो नेतृत्व दे रहा होता है। उसमें गुणधर्म हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। एक ऐसा ही पेड़ जिस पर कौए का घोंसला था। कृष्ण पक्ष में काटा गया और सहयोग से उसको उसी पर बिठाया गया। उस कुर्सी पर एक आदमी बैठा और बैठते ही उसके आदमीयत के गुण लोप होते चले गए और कौवे के गुणधर्म उभर कर सामने आने लगे और अब यह विशिष्ट व्यक्ति जनप्रिय नेता कहलाने लगा।

अब नेता के चरित्र को लीजिए यदि उसकी कुर्सी पर कोई और आकर बैठ जाता है तो पहले वाला नेता दूसरे पर सांप्रदायिक, देशद्रोही, चरित्रहीन होने का लांछन लगाने लगता है और अपना एक रूप बनाकर दूसरे वाले को कुर्सी छोड़ने पर विवश कर देता है या फिर उसकी पार्टी के कुछ लोगों को साम, दाम, दंड और भेद की नीति से अपनी और मिला लेते हैं तो यह है कि खासियत है।

– गोवर्धन यादव

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