पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाते बांध

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बांधों से हो रहे पर्यावरण विनाश को लेकर बरसों से पर्यावरणविद चेता रहे हैं, लेकिन हमारी सरकार उनकी बातों को बराबर अनसुना करती रही है और बांधों को विकास का प्रतीक बताने का ढिंढोरा पीट रही है जबकि असलियत इसके उलट है। कैग की रिपोर्ट ने कई साल पहले यह साबित भी कर दिया है। इस सबके बावजूद सरकार पूर्वोत्तर में बड़े बांधों को बनाकर पूर्वोत्तर को विकास का नमूना दिखाना चाह रही है। पूर्वोत्तर में कुल 250 से अधिक बांध बनने की प्रक्रिया जारी है।

इन बांधों से समूची ब्रrापुत्र नदी पर आने वाले भीषण संकट को नकारा नहीं जा सकता। उस हालत में जबकि यह समूचा क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र पांच में आता है और यहां भू-स्खलन हमेशा होता ही रहता है। सच यह है कि बांधों ने पर्यावरणीय शोषण की प्रक्रिया को गति देने का काम किया है जबकि बांध समर्थक इसके पक्ष में सिंचाई, जल, विद्युत आदि सुविधाओं, रोजगार और मत्स्यपालन आदि कायरे में बढ़ोतरी का तर्क देते हैं। विश्व बांध आयोग के सव्रेक्षण से स्पष्ट होता है कि बांध राजनेताओं, प्रमुख केंद्रीयकृत सरकारी-अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बांध निर्माता उद्योग के अपने निजी हितों की भेंट चढ़ जाते हैं। हमारी सरकार है कि वह दूसरे देशों से सबक लेने को तैयार नहीं है जो अपने यहां बांधों को खत्म करते जा रहे हैं।

गौरतलब है कि आज भारत समेत दुनिया के बड़े बांधों को ग्लोबल वार्मिग के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। ब्राजील के वैज्ञानिकों के शोध इस तय का खुलासा कर इसकी पुष्टि कर रहे हैं। उनसे स्पष्ट हो गया है कि दुनिया के बड़े बांध 11.5 करोड़ टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं। भारत के बांध कुल ग्लोबल वार्मिग के पांचवें हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। वे सालाना तीन करोड़ 35 लाख टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं। इससे स्थिति की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

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सभी फोटो: गूगल से साभार

वैज्ञानिकों का दावा है कि दुनिया के कुल 52 हजार के लगभग बांध और जलाशय मिलकर ग्लोबल वार्मिग पर मानव की करतूतों के चलते पड़ने वाले प्रभाव में चार फीसद का योगदान कर रहे हैं। भारत में बड़े बांधों से कुल मीथेन का उत्सर्जन 3.35 करोड़ टन है, जिसमें जलाशयों से 11 लाख टन, स्पिल-वे से 1.32 करोड़ टन और पनबिजली परियोजनाओं के टरबाइनों से 1.92 करोड़ टन मीथेन का उत्सर्जन होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत के जलाशयों से कुल मीथेन का 4.58 करोड़ टन उत्सर्जन हो सकता है।

ब्राजील के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च के वैज्ञानिकों इवान लीमा एवं उनके सहयोगियों द्वारा किया गया शोध यह मिथक तोड़ता है कि बड़ी पनबिजली परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली साफ होती है और वह पर्यावरण पर दुष्प्रभाव नहीं डालती है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि बिजली बनाने में बांध में पानी जमा कर के उससे टरबाइनों को चलाना सभी दृष्टि से सबसे सुरक्षित होता है। असल में बांधों के निर्माण से लोगों के विस्थापन और कुछ पर्यावरणीय अड़चनों के अलावा अभी तक बांधों के सामने कोई बड़ी समस्या आड़े नहीं आई है। लेकिन बदली स्थिति में वैज्ञानिकों के अनुसार बांधों में जमा होने वाली गाद के साथ-साथ अधिकाधिक मात्रा में आग्रेनिक मैटीरियल भी जमा होते हैं, जिनका विघटन मीथेन पैदा करता है। बांधों की आयु के अनुसार मीथेन की मात्रा भी बढ़ती जाती है।

यह सही है कि ग्रीन हाउस गैसों में मीथेन दूसरी बड़ी प्रदूषक गैस (कार्बन डाईऑक्साइड का भाग 72 फीसद व मीथेन का 23 फीसद) है। यदि भारत में बड़े बांधों से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि भारत के बांधों से उत्सर्जित मीथेन का यह अनुपात थोड़ा ज्यादा हो सकता है। इसके बावजूद अनुमानत: यह 1.7 करोड़ टन सालाना के आस-पास तो है ही। यदि इसकी भारत में सन् 2000 में अधिकारिक तौर पर उत्सर्जित 184.9 करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड से तुलना करें, जिसमें बड़े बांधों से होने वाला उत्सर्जन शामिल नहीं है, तो स्पष्ट है कि भारत में कुल कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन का 18.7 फीसद बड़े बांधों से होने वाला मीथेन होता है।

भले भारत ऊर्जा की नई तकनीक अपनाने में लगा है, फिर भी अब भारत सरकार के ऊपर निर्भर है कि वह बड़े बांधों से ग्लोबल वार्मिग के असर का पता लगाने की दिशा में क्या कदम उठाती है क्योंकि औद्योगिक दुनिया में तेजी से अपनी हैसियत बढ़ा रहा भारत ग्लोबल वार्मिग के लिए कम जिम्मेवार नहीं है। आज इस पर विचार किया जाना चाहिए कि ऊर्जा के लिए बांध कहां तक उचित हैं और ये पर्यावरण के लिए कितना बड़ा खतरा साबित हो रहे हैं? जबकि दुनिया के वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिग के लिए बांधों को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। 

  • ज्ञानेन्द्र रावत से साभार  
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