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    राज्यपाल की सकारात्मक सक्रियता का दस्तावेज

    By July 25, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    राम नाईक का चतुर्थ कार्यवृत्त उनकी सकारात्मक सक्रियता का दस्तावेज है। राज्यपाल से संवैधानिक सीमा में रहते हुए व्यवस्था संचालन में महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है। राम नाईक ने यह सन्देश अपने आचरण से दिया है। यह जगजाहिर है कि राम नाईक का सक्रिय राजनीतिक जीवन रहा है। तीन बार विधायक, पांच बार लोकसभा सदस्य, केंद्र में सर्वाधिक समय तक रहने वाले पेट्रोलियम मंत्री आदि उनकी राजनीतिक जीवन के पड़ाव है। लेकिन राज्यपाल बनने के साथ उन्होंने अपने को दलगत राजनीति से अलग कर लिया।
    चतुर्थ कार्यवृत्त से इसे समझा जा सकता है। इसका उर्दू व अंग्रेजी संस्करण भी उपलब्ध है। वह व्यापक नजरिये से कार्य करते है। कुछ दिन पहले काशी में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उनकी पुस्तक चरैवेति चरैवेति के संस्कृत संस्करण का लोकार्पण किया था। इसमें करीब एक हजार संस्कृत के विद्वान सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। इस पुस्तक का जर्मनी भाषा में भी अनुवाद चल रहा है। जिन बातों पर वर्षो तक लाखों लोगों का ध्यान नहीं गया, राम नाईक की नजर से वह नहीं बचते है। यह इनकी सतत जागरूकता का ही परिणाम है। चार वर्ष पहले जब वह राज्यपाल बने थे, तब उनसे दो प्रश्न किये गए थे। पहला क्या जनता दरबार लगायेगे। दूसरा आपका लक्ष्य क्या है। तब राम नाईक ने कहा था कि राज्यपाल जनप्रतिनिधि नहीं होता। इसलिए जनता दरबार लगाने का औचित्य नही  है। लेकिन आमजन के लिए राजभवन के दरवाजे खुले रहेंगे। चार वर्ष तक इस कथन का निर्वाह किया।

    उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में योगदान करने का लक्ष्य था। इस दिशा में भी कार्य किया। राष्ट्रीय महत्व के विधेयक राष्ट्रपति को संदर्भित करने का प्रावधान है। ऐसे अठारह विधेयक राष्ट्र्पति को प्रेषित किये। संविधान के शिल्पी का सही नाम लिखने की सार्थक पहल राम नाईक ने ही की।
    उनका पूरा नाम भीमराव राम जी आंबेडकर था। लेकिन भीम और राव को अलग करके लिखा जाने लगा, अंबेडकर भी सही नहीं था। राम नाईक ने मूल संविधान में उनके हस्ताक्षर का उल्लेख किया। जिसमें संविधान निर्माता ने पूरा नाम लिखा था। राम नाईक ने इसकी तरफ देश का ध्यान आकृष्ट किया। यह प्रचनल में आया। शिवा जी का जन्म तिथि पर विवाद था। फिर शोध से तय हुआ कि उनका जन्म सोलह सौ तीस में हुआ था। मुम्बई शिवजी टर्मिनल पर शिवाजी के चित्र के नीचे उनका जन्म सोलह सौ सत्ताईस लिखा था। लाखों लीग इस टर्मिनल पर आते है। लेकिन राम नाईक का इस गलती पर ध्यान गया। उनकी सलाह पर इसमें सुधार किया गया।
    लखनऊ के एक पार्क में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और उत्तर प्रदेश की प्रथम राज्यपाल सरोजनी नायडू की मूर्ति लगी है। इसका मुंह सड़क की विपरीत दिशा में है। इसे भी लोग वर्षो से देख रहे है। राम नाईक ने मूर्ति को ठीक करने और और पार्क के सुन्दरीकरण हेतु लिखा। इस पर कार्य हो रहा है। बालगंगाधर तिलक ने लखनऊ में ही अपने ऐतिहासिक नारे -स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, का उद्घोष किया था। राम नाईक ने इस के शताब्दी वर्ष आयोजन का सुझाव दिया। जिस पर योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अमल किया। राम नाईक की सलाह पर उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन शुरू हुआ। महाराष्ट्र दिवस की यहाँ शुरुआत का श्रेय भी उन्हीं को है।
    उनका कार्यकाल सक्रियता की मिसाल पेश करता है। चार वर्ष में चौबीस हजार नौ सौ अड़सठ नागरिक से मुलाकात की,एक लाख बयासी हजार पांच सौ छत्तीस उनको प्रेषित किये गए, जिन पर उचित कार्यवाई की गई। इसमें चार वर्ष में राजभवन में सौ बाइस  कार्यक्रम, लखनऊ में सात सौ नब्बे कार्यक्रम, लखनऊ से बाहर प्रदेश में चार सौ छत्तीस कार्यक्रम तथा प्रदेश के बाहर एक सौ बाईस कार्यक्रम में राज्यपाल शामिल हुए। बानवे पत्र राष्ट्रपति को, एक सौ सत्तर पत्र प्रधानमंत्री को, चार सौ बीस पत्र उपराष्ट्रपति एवं केन्द्रीय मंत्रियों को, एक हजार दो सौ चौरानबे  पत्र मुख्यमंत्री को तथा चार सौ उनतीस पत्र प्रदेश के मंत्रीगण को लिखें।
    राज्यपाल राज्य का संवैधानिक मुखिया होने के साथ-साथ केन्द्र एवं राज्य सरकार के बीच सेतु की भूमिका में होते हैं। राज्यपाल जहाँ एक ओर राज्य सरकार की गतिविधियों में नजर रखते हैं तो वहीं दूसरी ओर आवश्यकता के अनुरूप राज्य सरकार की बात को केन्द्र तक सशक्त ढंग से प्रस्तुत करने का भी कार्य करते हैं। इस वर्ष राज्य विधान मण्डल  के प्रथम सत्र के लिए आहूत संयुक्त अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए अड़तीस पृष्ठों का अपना पूरा अभिभाषण पढ़ा। अभिभाषण के समय विधान मण्डप में विपक्षी राजनैतिक दलों द्वारा विरोध प्रदर्शन तथा व्यवधान डाला गया परन्तु राज्यपाल ने  संयमपूर्वक अपना अभिभाषण पूर्ण किया। दो हजार सात के बाद यह प्रथम अवसर था जब किसी राज्यपाल ने सदन में अपना पूरा भाषण पढ़ा।
    वर्ष में दो बार कुलपति सम्मेलन के आयोजन के साथ विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन करने के लिये एक समिति बनायी गयी। समिति ने चवालीस बैठकों में विचार विनिमय करके रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।जो कार्यवाही हेतु राज्य सरकार को प्रेषित की गई। छब्बीस विश्वविद्यालयों के दीक्षान्त समारोह प्रस्तावित हैं, उनके दिनांक भी तय हो गये है, जो चौबीस अगस्त से पन्द्रह  नवम्बर तक पूरे कर लिये जायेंगे।
    राज्यपाल की अध्यक्षता में महात्मा गांधी की एक सौ पचासवीं जयंती समारोह समिति और कुम्भ मेला समारोह की समिति  बनाई गई है। इसमें भी उनके उपयोगी सुझाव देखने को मिलेंगे। राज्य सरकार के प्रतीक चिन्ह के अनधिकृत प्रयोग का संज्ञान लिया। इसपर नियमानुसार कार्यवाई के लिए सरकार को लिखा। म्यांमार में आयोजित द इंटरफेथ डाॅयलाग फाॅर पीस विषयक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। जाहिर है कि राज्यपाल राम नाईक द्वारा जारी कार्यवृत्त उनकी सक्रियता और जागरूकता को प्रमाणित करता है।

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