जुडे गांठ रहि जाए 

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
सपा और बसपा के संस्थापकों ने जिस दोस्ती की गांठ को हमेशा के लिए तोड़ दिया था, उसे उत्तराधिकारियों ने पुनः गठबन्धन का स्वरूप प्रदान किया है। मुलायम सिंह यादव ने इसे किस रूप में देखा, वही बता सकते है। वह भी अनुभवी है। जानते है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, जिन्हें एक दूसरे की शक्ल देखना गवाँरा नहीं होता, उनके बीच भी गठबन्धन हो सकता है। दावा चाहे जो किया जाए, ऐसे गठबन्धन अंतरात्मा की आवाज से नहीं सदैव  विवशता में ही किये जाते  है।
मायावती ने कुछ दिन पहले ही इस बात को अपने ढंग से कहा था। उन्होंने कहा था कि ना वह किसी की बुआ है, ना उनके लिए कोई बबुआ है। सम्मानजनक सीट मिलेगी तो समझौता होगा, अन्यथा नहीं।  दोनों पार्टियां भाजपा से अकेले लड़ने की स्थिति में होती तो यह गठबन्धन कदापि न होता। सन्योग देखिये गठबन्धन का ऐलान वही हुआ जहाँ दो वर्ष पहले कांग्रेस और सपा ने सदैव साथ रहने की कसम खाई थी। यह उद्घोष किया गया था कि उत्तर प्रदेश को यह साथ पसंद है। अब उसी जगह से कांग्रेस पर हमला बोला गया, और बसपा अच्छी हो गई। उसका साथ पसंद आने लगा।
पिछले लोकसभा चुनाव से ही इनके लिए कठिन दौर शुरू हो गया था। बसपा का खाता नहीं खुला था, सपा को पांच सीट पर सन्तोष करना पड़ा, फिर विधानसभा चुनाव भी इनके लिए बेहद निराशाजनक रहे। अकेले लड़ने में जोखिम था। गठबन्धन के अलावा दूसरा कोई विकल्प इनके सामने नहीं था। डेढ़ दशक तक एक दूसरे पर हमला बोलने में राजनीतिक लाभ मिल रहा था, इस दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति सपा और बसपा में सिमटी थी, भाजपा तब हाशिये पर थी।
भाजपा के उभार ने इन पार्टियों को हाशिये पर पहुंचा दिया। नफरत को दोस्ती में बदलना ही था। उन्नीस सौ तिरानबे में ऐसा ही प्रयोग हुआ था। कांशीराम और  मुलायाम सिंह ने गठबंधन किया था। इस गठबन्धन को बहुमत मिला था। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार बनी थी। लेकिन मुलायम का एक दिन भी चैन से नहीं बीता था। बसपा के दबाब ने उन्हें हर पल बेचैन रखा था।
बड़ी कड़वाहट के साथ गठबन्धन टूटा था। अब मायावती ने कहा कि उन्होंने जनहित में ही दो जून उन्नीस सौ पंचानवे को हुए लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस को भुलाकर हुए सपा के साथ गठबंधन करने का फैसला किया है। वैसे गठबन्धन की वास्तविक वजह को समझना कठिन नहीं है।
पिछले विधानसभा चुनाव तक एक दूसरे पर जम कर तीर चलते रहे। बुआ और बबुआ के संबोद्धन से सदैव परस्पर आहत करने वाली वाणी ही निकलती थी। अखिलेश अपनी प्रत्येक जनसभा में यह कहना नहीं भूलते थे कि पत्थर वाली बुआ से सावधान रहना, ये कभी भी भाजपा के साथ जा सकती है। दूसरी तरफ मायावती ने बबुआ की पार्टी का अलग नामकरण किया था, जिसका संबन्ध कानून व्यवस्था से था।
बसपा और सपा अड़तीस अड़तीस सीट पर लड़ेंगी। कांग्रेस के प्रति दया का भाव प्रदर्शित किया गया। अपरोक्ष रूप से यह सन्देश दिया गया कि रायबरेली व अमेठी तक ही उनकी सीमा है। इससे अधिक की उम्मीद उन्हें नहीं करनी चाहिए। दो सीटें अन्य सहयोगी दलों के लिए छोड़ी गई हैं। कयास थे कि  अजित सिंह के लोकदल को भी दोस्ती में जगह मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अखिलेश कांग्रेस से इतना नाराज नहीं थे। लेकिन उन्हें मायावती का रुख देखते हुए अपना नजरिया बदलना पड़ा।  बसपा का कहना था कि  कांग्रेस के साथ उन्नीस सौ छियानवे में गठबंधन कर विधानसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें हमारा वोट तो कांग्रेस को ट्रांसफर हुआ, लेकिन उनका वोट हमको नहीं मिला। इसी तरह से उन्नीस सौ सत्रह के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन उसका भी फायदा सपा को नहीं नहीं हुआ। इन बातों से यह भी जाहिर हुआ कि यह गठबन्धन किसी सिद्धान्त या विचारधारा तहत नहीं हुआ है। इसमें केवल वोट का फायदा और ट्रांसफर को ही ध्यान में रखा गया है। यह वह बिंदु है जो भविष्य में सपा और बसपा में भी दरार पैदा कर सकता है। यदि अनुमान के अनुरूप वोट ट्रांसफर न हुए तो गठबन्धन का मूल उद्देश्य ही विफल हो जयेगा।
वोट ट्रांसफर के मामले में भी अब पहले जैसी स्थिति नहीं है। एक तो बसपा का वोट बैंक अब पहले जैसा नहीं है। अति दलित वर्ग का समर्थन भाजपा को मिला था। सपा को वोट बसपा को पूरी तरह ट्रांसफर होगा, इसकी भी गारंटी नही है। बीस वर्षों तक दोनों पार्टियों के समर्थक वर्ग ने एक दूसरे के शासन में परेशानी झेली है। क्या अब सब कुछ सामान्य हो जाएगा, यह भविष्य में पता चलेगा। गठबन्धन की असली परीक्षा भविष्य में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर होगी। यह स्थिति गठबन्धन में गांठ बनकर मौजूद रहेगी।
उन्नीस सौ तिरानवे के विधानसभा में सपा बसपा गठबन्धन ने कोई बड़ा चमत्कार नहीं दिखाया था। यह गठबन्धन दो सौ का आंकड़ा भी नहीं छू सका था। सपा को एक सौ दस और बसपा को मात्र सड़सठ सीट मिली थी।
मायावती ने गेस्ट हाउस कांड भुला दिया, ठीक किया। लेकिन राजनीतिक जीवन में  भाजपा और निजी जीवन में भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी का योगदान भुलाना मुश्किल होगा। सपा के साथ गठबन्धन से बसपा को कोई लाभ नहीं हुआ था। वह सरकार में शामिल भी नहीं हुई थी। भाजपा ने उन्हें अल्पमत के बाद भी तीन बार मुख्यमंत्री बनाया। मायावती की प्रशासनिक छवि इसी दौरान बनी, जिसका लाभ उन्हें दो हजार सात में मिला। गेस्ट हाउस कांड में भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपनी जान पर खेल कर मायावती की जान बचाई थी। ये बातें कोई भी व्यक्ति कभी भुला नहीं सकता। लेकिन राजनीति में असंभव भी संभव हो जाता है।
वैसे गठबन्धन के मामले में सपा और बसपा का रिकार्ड एक जैसा है। इनकी दोस्ती में  निष्ठा को कभी जगह नहीं मिली। सपा का चरखा दांव और बसपा का पलटी मारना बहुत चर्चित हुआ था। अखिलेश और राहुल गांधी साथ भी राजनीति की भेंट चढ़ चुका है। अब जो दोस्ती हुई है , उसे भी एक राजनीतिक प्रयाग मानना चाहिए। यह भी संभव है कि इससे किसी एक पार्टी को ज्यादा लाभ मिल जाये, दूसरी को इसकी कीमत चुकानी पड़े। वैसे प्रजातंत्र है, गठबन्धन बनाने और तोड़ने का सभी राजनीतिक पार्टियों को अधिकार है, लेकिन इनके भविष्य का निर्णय मतदाता ही करेंगे।

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