उपरोक्त शीर्षक से ही साफ है कि आज का दर्द क्या है। सही यह भी है कि केवल आज का ही दर्द नहीं बल्कि काफी पहले से लोग इससे परेशान हैं। देश के सभी नागरिक उपभोक्ता है, क्योंकि तमाम वस्तुएं खरीदने से ही मिलती है। जिससे वस्तुएं खरीदी जाती हैं। वह इनका ही कारोबार व्यापार करते हैं और कारोबारियों व्यापार में सबसे अहम चीज मुनाफा होता है। मुनाफा पाप नहीं है बल्कि व्यापार का मूल आधार है।
समस्या पैदा होती है जबकि लालच बढ़ जाती है और व्यापार करने वाला व्यक्ति कंपनी, फर्म आदि इसकी रकम को अधिक अधिक बढ़ा देते हैं समस्या यहीं से शुरू होती हैं। स्थिति यह होती है कि कई बार एक ही सामान अलग अलग दुकानों व फर्मों पर अलग-अलग दामों पर मिलता है। हालाँकि ऐसे मामलों में तर्क यह दिए जाते हैं कि सस्ते दामों वाला सामान किसी ना किसी मामले में खराब है, और महंगा अच्छा!
लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। वैसे यह बात भी पुरानी हो गई है, क्योंकि अब संगठित रूप से महंगा बेचना चलन बन चुका है। कई धन्देबाज इससे भी आगे बढ़कर सामान का निर्माण उत्पादन किसी ऐसी कमी के चलते करते हैं कि उसकी लागत कम रहे हैं और बढ़े दामों पर उसी को बेचकर मुनाफा बढ़ाया जा सके।
कई मामले हैं जिनमें सामान की गुणवत्ता की घोषणा तो बहुत लुभावनी होती है लेकिन एक बार पैसा ले लेने के बाद उपभोक्ता को इस तरह फुटबॉल बनाया जाता है कि वह कुढ़ कर रह जाता है। इस मामले में ऑनलाइन खरीदारी लोगों को खास सबक दे रही है। स्पेशल डिस्काउंट, सेल जैसे बोर्ड तो लोगों को खूब आकर्षित करते हैं लेकिन बाद में अधिकतर पछतावा ही हाथ आता है सबसे ज्यादा तो लूट तो बिल्डरों और मोबाइल कंपनियों इ मचाई हुई हैं। इनमे कई नामी बिल्डरों के पेंच न्यायलय तक को कसनी पड़ी है इन्ही सबके बीच संसद ने गुरुवार को उपभोक्ता संरक्षण विधेयक तो पारित कर दिया लेकिन इसकी सर्तकता तभी होगी जब उपभोक्ताओं को छोटे से लेकर बड़े स्तर पर ठगने की प्रवर्ति पर लगाम लगेगी।







