यह शिक्षा माफिया पढाई के नाम पर इस नवम्बर में अभिवावकों को फिर लूट लेंगे

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सरकार को चाहिये की इस लूट से अभिवावकों को बचाए जो कमिटी बनी थी उसने क्या काम किया उसे तलब किया जाये ताकि मार्च आने से पहले कोई ना कोई रास्ता निकल जाये



मोहम्मद फैजी सिद्दीकी


नवम्बर माह की शुरुआत होते ही लूट का मौसम आ गया है, एक तरफ गुलाबी मौसम का मजा तो दूसरी तरफ लूट के मौसम की तकलीफ। घर में जब किलकारी गूंजती है तभी से घरवालों को लूट के मौसम का इंतज़ार रहता है, लोग बच्चे पर कम बच्चे की उम्र पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं जैसे ही बच्चा 2 साल का होता है तभी से उसके उज्जवल भविष्य के लिए स्कूलों का चयन शुरू कर देते हैं पहले तो प्ले ग्रुप के स्कूलो में खुद को लूटवाते हैं फिर साल भर के भीतर ही नर्सरी कक्षा में नामांकन के लिए दौड लगाते हैं, ज्यों -ज्यों बच्चा बड़ा होता जाता है वैसे ही लूट की रकम बढती जाती है।
माह नवम्बर से अभिवावक लुटने को विवश हो जाते है और स्कूल वाले लूटने को तैयार बैठे रहते हैं, अभी से निजी विद्यालयों में नामांकन के लिए अप्लाई फॉर्म मिलना शुरू हो गया है यह सिलसिला जनवरी तक चलेगा उसके बाद बच्चों का टेस्ट होगा अगर बच्चे टेस्ट पास कर जाते हैं तो फिर उनका नामांकन होगा अन्यथा नहीं होगा। इसलिए अभिवावक एक नहीं कई स्कूलो के फॉर्म खरीदते है, अभी से जनवरी तक 20-25 हजार रूपया अभिवावक सिर्फ फॉर्म खरीदने में लगा देंगे। फॉर्म खरीदने के लिए अभी से लम्बी लम्बी लाइने लगनी शुरू हो गयी, भूखे प्यासे अभिवावक सुबह से लाइन लगाना शुरू कर देते हैं फिर भी स्कूल के पत्थर दिल संचालक का दिल भी नहीं पसीजता, कमाई बढाने के लिए साथ ही अपने आपको सबसे बेहतर दिखाने के लिए विमान के किराये की तरह ही तारीख के अनुसार फॉर्म की कीमत बढ़ाते रहते हैं जिससे अभिवावकों के ऊपर और दवाब बनता है, जल्दी से जल्दी फॉर्म नहीं मिला तो कीमत बढ़ जाएगा, बड़े स्कूल वाले सिर्फ नामांकन के लिए अप्लाई फॉर्म की कीमत 5000 रखते हैं और क्षमता से अधिक फॉर्म बेचते हैं, बच्चा सेलेक्ट हो या ना हो उस फॉर्म के पैसे की वापसी नहीं होती, क्या करे निरीह व मजबूर मा बाप अगर बच्चे का भविष्य बनाना है तो अपनी चैन के साथ साथ अपनी गाढ़ी कमाई भी गवानी ही पड़ेगी. अभी तो बस शुरुआत है अभी सिर्फ अप्लाई फॉर्म के लिए जेबें ढीली करनी पर रही अभी तो नामांकन कराना है पता नहीं सुरसासुर कितना बड़ा मुंह खोलेगा उसके बाद किताबे हैं ड्रेस है किराया भाड़ा है ट्यूशन फीस है, इतनी ज्यादा फीस देने के बाद भी अगर बच्चे को खुद से या ट्यूशन देकर नहीं पढाया जाये तो बच्चा पढ़ ही नहीं पायेगा।
स्कूल वाले पेरेंट्स मीटिंग करते हैं और कहते हैं आपका बच्चा पढने में बहुत कमजोर है बच्चे पर ध्यान दीजिये आपसे नहीं पढता है तो ट्यूशन लगाइए, तो फिर इतने पैसे किस बात के लेते हैं स्कूल वाले? लाचार  अभिवावकों ने विगत मार्च-अप्रैल माह में धरना दिया, घेराव किया तब भी इन शिक्षा माफियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई, एक आम आदमी को क्या चाहिए? वो रोटी कपडा और मकान के लिए कमा ही लेता है। बस उसे बेहतर शिक्षा और स्वास्थ थोड़ी रियायत दर पर मिल जाये यही तो चाहता है।
2014 में परिवर्तन की बयार चली थी लोगों में विश्वास जगा था। लोगों को लग रहा था कि पहली बार कोई राजा आएगा जिसने खुद तकलीफ झेला है वो आम आदमी की हर तकलीफ को जानता है, अब शिक्षा और स्वास्थ पर ध्यान दिया जायेगा।
आम आदमी की तकलीफों को समझा जायेगा। फिर 2017 का चुनाव आया एक योगी सत्तासीन हुए लोगों में और भरोसा जगा की अब तो अच्छे दिन की शुरुआत हो ही जाएगी, लेकिन इसी वर्ष विद्यालय संचालकों ने 15-20 प्रतिशत तक फीस बढ़ा दी जो गत वर्ष के मुकाबले 5-10 प्रतिशत ज्यादा थी,लोगों में आक्रोश जगा,लोग सड़क पर उतरे, उनका साथ कई संस्थाओं ने दिया,सरकार भी हरकत में आई, एक टीम का गठन किया गया, लेकिन 6 महीने से ज्यादा बीत जाने के बाद भी उस टीम का कोई अता पता नहीं है आम आदमी अभी भी इंतज़ार में बैठा है लेकिन सरकार की तरफ से अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।
काल चक्र तो चलायमान है वो तो चलते चलते फिर लूट के मौसम में प्रवेश कर चूका है। अभिवावकों से लूट का समय आ गया है, इसी माह से लूट शुरू होगी और हंगामा मार्च के महीने में होगा जब स्कूल वाले फीस में भारी भरकम वृद्धि करेंगे । इसी वर्ष मार्च अप्रैल के महीने में लुटेरों के खिलाफ अभिवावको ने महामहिम राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक को ज्ञापन सौपा लेकिन नतीजा वादे और आश्वासन के रूप में ही निकले। शिक्षा माफियाओं का नाम खुलकर उछाला गया लेकिन फिर भी शिक्षा माफियों के खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत हमारे राजा नहीं जुटा पाए। भाषण, आश्वासन सब धरे के धरे रह गए, अभिवावक करे भी तो क्या करे जिस राजा को राज काज चलाने के लिए कर देता है वही राजा उसके बच्चों के लिए शिक्षा की भी व्यवस्था नहीं करवा पा रहे है।
सरकार को चाहिये की इस लूट से अभिवावकों को बचाए जो कमिटी बनी थी उसने क्या काम किया उसे तलब किया जाये ताकि मार्च आने से पहले कोई ना कोई रास्ता निकल जाये। सरकारी स्कूलों की सेहत सरकार चाहकर भी इतनी जल्दी नहीं सुधार सकती क्योंकि विगत कई वर्षों से सरकारी स्कूलों पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया जिसकी वजह से सरकारी स्कूलों की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है। सरकारी स्कूलों की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार को कई वर्षों का समय लग जायेगा लेकिन निजी विद्यालयों पर प्रभावी रूप से सिकंजा कस तत्काल अभिवावक को राहत प्रदान किया जा सकता है।

एक अभिवावक का दर्द यह भी :

स्कूल में एडमिशन, डोनेशन और शिक्षा के नाम पर कदम- कदम पर धन उगाही के नित नए हथकंडे अपनाये जा रहे है कभी कल्चरल एक्टिविटी तो कभी ड्रेस कोड यानि ऑरेंज डे, ग्रीन डे या फलाने डे या किसी अन्य बहाने से पैसा हथिया लिया जाता है और बात जब बच्चे की शिक्षा गुणवत्ता की आती है तो कह देते है आपका बच्चा पढ़ने में बहुत कमजोर है या फिर आपका बच्चा स्कूल तो आता ही नहीं है ऐसे मे बच्चों का स्कूल बैग तो बढ़ा लेकिन पढाई में अधिकांश बच्चे फिसिड्डी ही साबित हुए। याद है आज भी वह दिन जब चंद किताबों के साथ के पूरा साल कट जाता था और गुरूजी बेसिक खूब रटा देते थे तब के रटायें गिनती, पहाढ़ें, कवितायेँ मैथ के फार्मूले और जनरल नॉलेज आज भी याद हैं लेकिन आज वास्तव में स्कूल में पढाई के नाम पर टीचर और अविभावक अक्सर बाहें चढ़ाएं आमने -सामने आ जाते हैं इसकी वजह साफ़ हैं स्कूल को सिर्फ पैसा बटोरना हैं और अविभावक को अपने बच्चे की चिंता शिक्षा की गुणवत्ता से हैं। यदि सरकार ने इसके समाधान के लिए इस ओर जल्द ही कोई प्रभावी कदम नहीं उठायें तो स्थिति कभी भी विस्फोटक हो सकती हैं।

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