परदे पर तवायफों का भी एक दौर था!

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हेमंत पाल

हाल के सालों में सिनेमा में जो बड़े बदलाव हुए हैं, उनमें एक है परदे से तवायफों का गायब होना। याद किया जाए तो बीते कई सालों में दर्शकों ने किसी फिल्म में तवायफ को नहीं देखा होगा। शायद इसलिए कि पिछले कुछ सालों से नवाबों और मध्यकालीन भारत से जुड़ी फिल्में नहीं बनी। संजय लीला भंसाली ने कुछ साल पहले ‘देवदास’ की कहानी को फिर दोहराकर तवायफ के किरदार को जरूर जिन्दा किया था। इसे ‘पाकीजा’ में तवायफ बनी मीना कुमारी और ‘उमराव जान’ में तवायफ का दर्द बयान करने वाली रेखा के बाद की एक कड़ी भी माना गया। ‘देवदास’ की तवायफ यानी चन्द्रमुखी बनी माधुरी दीक्षित के अभिनय व सौंदर्य को देखकर कहा जा सकता है कि सिनेमा की बहुचर्चित तवायफों के किरदार में मीना कुमारी और रेखा के बाद माधुरी दीक्षित का ही नाम लिया जाएगा। 

  सिनेमा में ब्लैक एंड व्हाइट के जमाने से तवायफों को एक ग्लैमरस किरदार के रूप में देखा जाता रहा है। हर दौर में तवायफों को अलग-अलग नजरिए से पेश किया जाता रहा। लेकिन, जिस संजीदगी से ‘पाकीजा’ और ‘उमराव जान’ में तवायफ की जिंदगी की परतें खोली गई, वह अपने आपमें मिसाल है। यही कारण है कि इन दोनों फिल्मों को सिनेमा इतिहास की अमर कृतियां माना जाता हैं। ‘पाकीजा’ में मां-बेटी के किरदार को निभाने वाली मीना कुमारी और ‘उमराव जान’ बनी रेखा के फिल्मी जीवन की सर्वश्रेष्ठ फिल्म होने का सम्मान इन दोनों फिल्मों ने ही हांसिल किया।
  ब्लैक एंड व्हाइट के समयकाल में कई तवायफों ने ही फिल्मों में अभिनेत्री की कमी पूरी की थी। इसलिए बाद के दौर की अभिनेत्रियों द्वारा पर्दे पर तवायफ की भूमिका साकार करना कोई अहम बात नहीं थी। लेकिन, आजादी के बाद जन्म हुआ एक नए सिनेमा का, जिसमें फिल्मों से जुड़े लोगों ने न सिर्फ शोहरत और लोकप्रियता का स्वाद चखना शुरू किया, बल्कि उनके अभिनय को सामाजिक तौर पर सम्मानित भी किया जाने लगा। लेकिन, समस्या यह थी कि कई अभिनेत्रियां परदे पर तवायफ की भूमिका निभाने से कतराती थीं। फिर भी नरगिस और मधुबाला जैसी सफल अभिनेत्रियों ने किसी भी भूमिका के साथ पक्षपात न करने की अच्छी मिसाल पेश की।
  देखा जाए तो सही मायने में पाकीजा पहली ऐसी फिल्म थी जिसमें दर्शकों ने तवायफ के हुस्न के पीछे छुपी तड़प, प्रेम और समर्पण भाव से परिचित करवाया। इस फिल्म में निर्देशक कमाल अमरोही ने तवायफ का घृणित सामाजिक जीवन जीने को विवश औरतों की समस्याओं का समाधान खोजने का भी प्रयास किया था। फिल्म की सफलता में यदि निर्देशक की सही पकड़ , भव्य सैट और मधुर संगीत की अहम भूमिका रही तो इसमें कोई दो राय नहीं कि मीना के अभिनय का सम्मोहन भी दर्शकों को बार-बार सिनेमा घर तक खींच लाया।
  इसके बाद उर्दू कथाकार रुसवा के उपन्यास ‘उमराव जान’ से प्रेरित होकर मुजफ्फर अली ने इसी नाम से फिल्म का निर्माण किया। फिल्म में तवायफ की भूमिका निभाने वाली रेखा ने इसके अलावा मुकद्दर का सिकंदर, प्यार की जीत, उत्सव, दीदार-ए-यार और जाल जैसी फिल्मों में भी तवायफ की भूमिका निभाई। लेकिन, उमराव जान के किरदार में रेखा के अभिनय ने जो जौहर दिखाए उस करिश्मे के फिर दोहराने में रेखा भी सफल नहीं हो सकीय। इस फिल्म के लिए रेखा को सर्वश्रष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। लेकिन, आज परदे की दुनिया से तवायफ हाशिए पर है। लगता नहीं कि अब कोई फिल्मकार संजय लीला भंसाली की तरह तवायफ की जिंदगी पर फिल्म बनाने का साहस कर पाएगा।
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