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जी के चक्रवर्ती
एक समय अमेरिका एवं उत्तर कोरिया के तानाशाह शासक किम जोंग-उन के बीच एक दूसरे के खिलाफ लगातार वाक्य युद्ध के होते रहने से तीखी बयानबाजी अपने चरम पर पहुंचने लगी थी उस वक्त उत्तर कोरिया ने अमेरिका को ऐसी धमकीयां दे डाली कि वह अपनी आत्मरक्षा के लिए उठाये जाने वाले कदमो में कहा कि अमेरिकी द्वीप गुआम (प्रशांत महासागर में कोरियाई प्रायद्वीप के पास स्थित) स्थान पर आक्रमण कर सकता है। यह धमकी कोरिया के किम जोंग द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के जवाब में दिया गया था कि उत्तर कोरिया ने अमेरिका को धमकाना बंद नहीं किया तो वहां ऐसा विध्वंस मचेगा जैसा पहले इतिहास में कभी नहीं हुआ है। और अब किम जोंग की एक बार फिर परमाणु टेस्ट की धमकी ने अमेरिका को ही नहीं वरन समूचे सयुंक्त राष्ट्र को हिला दिया।
इसके पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा उत्तर कोरिया के ऊपर नए प्रतिबंध लगाए गए थे। जिसमे उसका सालाना निर्यात जो कि लगभग तीन अरब डॉलर का है, वह घटकर मात्र एक अरब डॉलर तक जा पहुंचा था जिसकी वजह से दोनों राष्ट्र प्रमुखों के बयानों के बाद पूर्वी एशियाई क्षेत्रों में तनाव कई गुना तक बढ़ गया था। उत्तर कोरिया एवं ट्रम्प प्रशासन इस तरह से एक दूसरे के आमने-सामने खड़े थे जहां से दोनों देश एक दूसरे को अपने लिए बड़े खतरे के रूप में देख रहे थे।
जबकि यह मान लेना उचित नहीं लगता है कि इस तरह के हालात पैदा हो जाने के कारणों में केवल उत्तर कोरिया को ही पूरी तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, उत्तर कोरिया में मौजूदा समय में एकल पार्टी के शासन की स्टालिनवादी विचार धारा वाली व्यवस्था है, यहाँ पर देश के सर्वोच्च नेता के पास सभी तरह शक्तियां होती हैं। वहीं पर इस देश के पास संसाधनों की भारी संख्या में अभाव होने के कारण कोरियाई सरकार को यह डर सता रहा था कि उससे कहीं ताकतवर दक्षिण कोरिया और अमेरिका कभी-भी उत्तर कोरिया सरकार का तख्तापलट न कर दें।

दूसरे देश के शासकों जैसा हश्र न हो इसके लिए तैयार:
उत्तर कोरिया के तानाशाह शासक किम जोंग-उन इस बात से अनभिज्ञ नहीं थे कि उनके जैसे दूसरे देश के शासकों जैसे इराक के सद्दाम हुसैन एवं लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी का किस तरह का हश्र हुआ था। यही वजह है कि उत्तर कोरिया द्वारा अपने परमाणु कार्यक्रमों को बंद करने की संभावना न के बराबर है।
किम जोंग-उन के लिए परमाणु हथियार ही उनकी बहुत बड़ी सुरक्षा की गारंटी हैं, लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगाकर एवं उसकी मदद के बदले नियंत्रित नहीं जा सकता।
यदि हम अपने पड़ोस देश की तरफ देखें तो पाकिस्तान का रवैया उत्तर कोरिया के मुकाबले कहीं ज्यादा खतरनाक कहना पड़ेगा। वह न सिर्फ चोरी-छिपे अपने देश में लगातार परमाणु प्रसार में लगा हुआ है बल्कि वह अपने पड़ोसी देशों में आतंकवाद के जरिये आतंकी निर्यात करता है, (जो उत्तर कोरिया नहीं करता) है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उसके साथ संयम से पेश आई और उसकी मदद भी की।
अमेरिका यदि उत्तर कोरिया पर हमला कर देता तो उसे लेने के देने पड़ सकते थे, क्योंकि युद्ध की स्थिति में चीन को हर हाल में उत्तर कोरिया का साथ देना पड़ता कियुंकि उसकी अमेरिका और उत्तर कोरिया के साथ हुई दो संधियां हैं। वर्ष 1950 से लेकर 1953 तक उत्तर और दक्षिण करिया के बीच हुए युद्ध में चीन एवं रूस ने उत्तर कोरिया का साथ दिया था। 27 जुलाई 1953 को संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में एक युद्धविराम संधि हुई इसी के साथ यह युद्ध खत्म हुआ था। इस संधि में वाशिंगटन एवं बीजिंग के बीच एक समझौता यह हुआ था कि यदि अमेरिका भविष्य में उत्तर कोरिया पर हमला करता है तो युद्धविराम संधि टूट जाएगी।
इसके अलावा 1961 में चीन और उत्तर कोरिया की वामपंथी सरकारों ने आपस में एक और महत्वपूर्ण संधि किया था जिसका नाम ‘चीन-उत्तर कोरियाई पारस्परिक सहायता और सहयोग मित्रता संधि’ था। इस संधि में यह कहा गया था कि यदि चीन और उत्तर कोरिया में से किसी भी देश पर अगर कोई अन्य देश हमला करता है तो दोनों देशों को तुरंत एक-दूसरे का सहयोग करना पड़ेगा। अभी पिछले ही वर्ष में इन दोनों देशों ने मिलकर इस संधि की वैधता की अवधि को बढ़ाकर वर्ष 2021 तक कर दिया था। विदेशी मामलों के जानकारों का येसा मनना हैं कि इस संधि की वजह से दोनों देशों को बड़ा फायदा मिला। इससे जहां चीन ने अपने व्यापारिक हित साधे वहीं पर उत्तर कोरिया इस संधि के हिने के बाद अपने आप को और अधिक सुरक्षित करने में कामयाब हो गया।
उत्तर कोरिया के मामले में अमेरिका के विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने कहा था कि वहां की सरकार से बातचीत की जासकती है यदि वह अपने मिसाइलों का परीक्षण करना रोक दे। इस तरह के प्रस्ताव पर चीन किम जोंग-उन पर दबाव भी बनाया जा सकता था कि वे बातचीत की टेबल पर आएं जिससे तनाव को कम किया जा सके यही एक मात्र तरीका था कि दबाव के साथ-साथ बातचीत भी जारी रखी जाये, लेकिन यदि दोनों पक्षों की ओर से धमकियों का दौर इसी तरह लगातार जारी रहता तो निश्चित तौर पर इसके नतीजे के रूप में युद्ध होना तय था जिससे भारी विनाश ही देखने को मिलता।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है