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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    राजनितिक दल चुनाव आयोग का करें सम्मान

    By June 1, 2018 Hot issue No Comments5 Mins Read
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     डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    भारत के संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग को बहुत अहमियत दी थी। उन्होंने बहुत सोच समझ कर अनुछेद 324 के माध्यम से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को दी थी। समय के साथ चुनाव प्रक्रिया में अनेक सुधार हुए। चुनाव संचालित करने की दृष्टि से भारतीय चुनाव आयोग विश्व में बेजोड़ है। सबसे बड़े प्रजातन्त्र में चुनाव करना अद्भुत है।
    सुधार की गुंजाइश सदैव रहती है। लेकिन कुछ समय ईवीएम पर राजनीति के तहत आरोप लगाए जा रहे है। ऐसा लग रहा है जैसे ईवीएम से जितने चुनाव हुए वह गलत थे। आरोप लगाने वाले यह भूल जाते है कि वह भी इसी ईवीएम से हुए चुनाव में मुख्यमंत्री बने थे। अभी हुए उपचुनाव से  ईवीएम को अवश्य राहत मिली है। यदि यहाँ से विपक्ष को बढ़त न मिलती तो फिर ईवीएम की खैर नहीं थी। तब कहा जाता कि अब तो बैलेट से ही चुनाव होने चाहिए। इस प्रकार की बाते हमारे नेता सहज रूप में कह देते है। लेकिन बिना किसी प्रमाण के ऐसी बातें चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचती है। जबकि भारतीय चुनाव आयोग की विश्व मे प्रतिष्ठा है। कहीं भी इतने विशाल चुनाव इतने सुचारू ढंग से नहीं होते है।
    ये बात अलग है कि सुधार के प्रस्तावों का सदैव स्वागत होना चाहिए। नेता ही नहीं आम नागरिक भी कोई सुझाव दे तो उस पर चुनाव आयोग को विचार करना चाहिए । लेकिन किसी पार्टी विशेष की जीत को झुठलाने के लिए ईवीएम पर हमला ठीक नहीं है। अब तो लगातार कहीं न कहीं चुनाव होते है। चुनाव परिणाम के आधार पर ईवीएम की आलोचना करना,या मौन रह जाना ठीक नही कहा जा सकता। इस समय यही दिखाई दे रहा है। कुछ नेताओं ने इस पर हमला बोलना अपनी फितरत बना ली है। कतिपय आरोप पहले भी लगे है। लेकिन चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण के बाद लोगों का समाधान हुआ । लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद इस प्रवत्ति ने जोर पकड़ा है। तब लगातार मिल रही पराजय से बचाव के लिए ईवीएम पर हमला बोला गया था। फिर क्या था। कुछ अन्य नेता भी इसमें कूद गए। यह सब उत्तर प्रदेश में ही ज्यादा दिखाई दे रहा था। इसमें वह नेता सबसे आगे थे।
    जिन्हें ईवीएम के माध्यम से हुए चुनाव में पूर्ण बहुमत मिला। लेकिन जब भाजपा को बहुमत मिला तो कहा गया कि ईवीएम में गड़बड़ी है। बैलेट से चुनाव होने चाहिए। लेकिन यह नहीं बताया गया कि बैलेट से होने वाले चुनाव में भी पराजय मिली तब क्या होगा। ईवीएम के विरोध ने अनेक बार हास्यस्पद स्थिति भी उतपन्न की है। कुछ दिन पहले ही बंगलुरू में विपक्षी नेता जुटे थे। यहां भाजपा बहुमत से पीछे रह गई थी। ऐसे में किसी को ईवीएम की याद नहीं आई। फिर कांग्रेस और जेडीएस ने सरकार बना ली ,तो कहा गया लोकतंत्र जीत गया, यदि भाजपा सरकार बना लेती ,तब कहा जाता कि ईवीएम में गड़बड़ी थी। लोकतंत्र की हत्या हो गई। बैलेट से चुनाव होने चाहिए। पंजाब में भाजपा हार गई , मतलब ईवीएम ठीक थी। गोवा, मेघालय, मणिपुर में उसे बहुमत नहीं मिला, ईवीएम ठीक थी। इस प्रकार के मापदंड आमजन की समझ से परे होते है।
    ऐसा नहीं कि चुनाव आयोग ने इस प्रकार के आरोपों का संज्ञान नहीं लिया था। उसने सभी  पार्टियों  को आरोप प्रमाणित करने के लिए बुलाया था। लेकिन आरोप लगाने वाले चुनाव आयोग की चुनौती से भाग खड़े हुए। कोई  यब बताने भी नहीं गया कि उन्होंने की किस आधार पर आरोप लगया था। देश के विभिन्न हिस्सों में जिस प्रकार के चुनाव परिणाम आ रहे है , उनमें मिश्रित जनादेश है। उत्तर प्रदेश के मतदाता पूर्ण बहुमत दे रहे है। बसपा,सपा के बाद भाजपा के साथ यही हुआ। जब बसपा और सपा को बहुमत के समय ईवीएम ठीक थी। तो भाजपा को बहुमत मिलने पर गड़बड़ कैसे हो गई। कहा गया कि विकसित देश बैलेट से चुनाव करा रहे है। इस संबन्ध में दो बातों पर गौर करना होगा। उन विकसित देशों में भारत जैसी विविधता नहीं है। हमारे यहां बैलेट से चुनाव के समय बूथ कैप्चरिंग के भी आरोप लगते थे। दूसरी बात यह कि अनेक देश अपने यहां चुनाव कराने के लिए भारतीय चुनाव आयोग की सहायता लेते है। वहा ईवीएम से प्रमाणिक चुनाव कराए गए।
    इतना अवश्य है कि एक साथ बड़ी संख्या में मशीनों के खराब हो जाने का समाधान अवश्य होना चाहिए। मतदाताओं को परेशान न होना पड़े,इसका पूरा इंतजाम होना चाहिए। लेकिन यह समझना होगा कि मशीन खराब होने का यह मतलब नहीं कि इसका सत्ता पक्ष को लाभ मिल रहा था। मशीन खराब थी, वहां चुनाव बन्द थे। मशीन बदलने के बाद पुनः चुनाव हुए। किसी भी व्यवस्था के संचालन में कतिपय कठिनाइया भी आती है। लेकिन अपनी हार और जीत के हिसाब से चुनावी प्रक्रिया की अलग अलग व्याख्या अनुचित है। आलोचना में भी संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा का ध्यान रखना चाहिए।

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