- खरी बात: राहुल कुमार गुप्त
अगर सच कहने पर सियासत हमसे नाराज होती है तो हो।
हम तो कहेंगे कि वो सुन लें और देश में कुछ अच्छा हो।।
कोविड-19 को देश में आने से रोकने के लिये पर्याप्त समय था, सरकार को जानकारी भी थी, लेकिन इस विषय में सरकार शुरुआती दौर में ज्यादा गंभीर नहीं दिखी। लॉकडाउन का ये प्रभाव जरूर दिखा है कि लोगों में खौफ भर गया है और करोड़ों लोगों का रोजगार छिन गया। भारत की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है लेकिन संक्रमण तालाबंदी से कम न हुआ, बढ़ता ही गया।
इस दुःखद काल में कितने कष्ट मजदूरों ने सहे हैं न जाने कितनों की मौत हो गयी। ये दुःखद घटनाएं सरकार के पास दूरदर्शिता न होने के कारण भी हुई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने फरवरी में ही कोरोना को लेकर सरकार को चेताया था लेकिन उनकी बातों को नानसेंस समझ कर इग्नोर कर दिया गया। जब कि विश्व कोरोना की ताबाही से बर्बाद हो रहा था। फिर भी यहाँ सरकार आत्ममुग्ध थी और आज भी है। जब 500 लोग संक्रमित थे तो बिना होमवर्क के तब तालाबंदी की याद आयी। सरकार जनता के थाली बजाने से खुश थी कि जनता साथ है। पर जनता भूखे पेट कब तक साथ रहेगी। इतना खौफ फैला दिया गया कि लोग घरों व गाँवों की ओर हर कठिन परिस्थितियों में आने को विवश हो गये। गुजरात मॉडल दो दिन खाना पानी नहीं दे सका मजदूरों को।
इसी तरह अन्य प्रदेशों में। हेल्प लाईन नंबरों पर फोन लगाओ तो इंगेज, मदद माँगों तो मदद का पता नहीं। हाँ, कई जगह लोगों को मदद भी मिली है। दो लाख लोग यहाँ कोरोना से संक्रमित हो गये। वो भी लॉकडाउन में। सरकार को क्या लगभग हर जानकार को ये पता है कि वैक्सीन बनाने में कम से कम आठ माह से साल भर का वक्त लगता है। और वैक्सीन बनती भी है या नहीं इसमें भी असमंजस पहले भी थी, आज भी है। यहाँ लॉकडाउन से पहले लगभग बहुत लोगों को पता हो चुका था कि सैनेटाईजर, मास्क, साबुन से हाथ धुलना, सोशल डिस्टेंसिंग की एहतियायत से हम कोरोना से बच सकते हैं। तो सबका रोजगार छीनने की क्या जरूरत थी, जब आप दो लाख संक्रमण पर पूरी ढील दे चुके हैं।
लॉकडाउन के वक्त कई जगह प्रशासन की चूक से भी केसेज बढ़े हैं। मीडिया ने इस दुःखद परिस्थिति में भी हिंदू-मुस्लिम का भी रंग खोज लिया है। अब इन केसों को बढ़ते जाना बहुत ही भयावह स्थिति को दर्शाता है। उस पर सरकार जुलाई से बच्चों के स्कूलों को चालू करने में लगी है। जबकि यहाँ अभी हर सुरक्षा के उपाय आसान नहीं हैं। चाईना व अन्य विकसित देशों ने जहाँ मास्क की जगह फेस सील्ड का उपयोग करना शुरू कर दिया है वहीं हमारे देश में गमछा व रूमाल कोरोना से युद्ध लड़ने को तैयार हैं।
एन 95 मास्क की जगह आप ने गमछा और रूमाल से तुलना कर जनता को आश्वस्त किया। यह झूठा आश्वासन इसलिये भी था कि यहाँ ऐसे मास्क उपलब्ध नहीं थे। और अब भी इनकी कमी है। कई जगह कपड़ों के मास्क बैंक बनाये जा रहे हैं। क्या कोई चिकित्सक एन 95 की जगह गमछा या रूमाल का प्रयोग कर सकता है? क्या यह एन95 का सही विकल्प है? सैनेटाईजर बनाने में घपला किसी से छिपा नहीं। कई कंपनियों ने आनन-फानन बिना मानक के सैनेटाईजरों की बाजार में उतार दिया है। इसकी भी कमी, तो साबुन से हाथ धुल लेना सही है। सोशल या फिजिकल डिस्टेंसिंग आप सब मीडिया के माध्यम से देख ही रहे हैं या आप खुद निकलिये तो बाजारों में देखने को मिल जायेगी। अस्पतालों, पीपीई किट व जाँच किट की कमी भी किसी से छिपी नहीं है। ये सब पहले से ही सरकार को पता है, यह भी पता था कि लॉकडाउन से देश की आर्थिक व्यवस्था भी चौपट हो जायेगी।
हम न तो संक्रमण रोक पाये न ही देश की आर्थिक तबाही। लगभग हर क्षेत्र में एफडीआई 100 प्रतिशत करने वाली सरकार को अचानक आत्मनिर्भरता की याद आ गयी। फिलहाल अब लॉकडाउन में इतनी ढिलाई हो गयी है कि उसे अनलॉक-1 का नाम दे दिया गया है। घातांकी संक्रमण अपनी ऊंचाईयों को छूने का भारत में भरसक प्रयास कर रहा है। कई लोगों को इस मौत के संक्रमण में भी अवसर दिख रहे हैं और वो इसे अवसर समझ लाभ उठा रहे हैं। इन सबसे भटकाने के लिये भी सरकार के पास तमाम मुद्दे हैं जो मीडिया में आपको देखने को मिलते रहेंगे। तमाम लोग ये कहते मिल जाते हैं, सरकार की चुटकी लेते मिल जाते हैं कि क्या कोरोना दो माह के लिये ही खतरनाक था? अब यह खतरनाक नहीं है? न तो तब इसका सही ईलाज था और न अब। न तो तब सुरक्षा व सावधानी के पुख्ता इंतेजाम थे न अब। तो एक बहुत बड़ा खौफ जाने-अंजाने में क्यों फैला दिया गया? क्यूँ छिन गया करोड़ों लोगों का रोजगार, क्यूँ दुःखद मौतों से हजारों ने अपनी जानें गंवाँ दीं? देश के सर्वेसर्वा आप हैं मोदी जी।
संवैधानिक रूप में न सही वास्तविक रूप में तो हैं ही। ऐसे मामलों में जहाँ देश के राष्ट्रपति का रोल अहम् हो जाता है वहाँ भी लगातार मोदी जी आप ही काम करते रहे। यह आपके काम के प्रति निष्ठा ही है। आपने 21 दिन में युद्ध जीतने का शंखनाद बिल्कुल उसी तरह किया था जैसे कि नोटबंदी में, लोगों की समस्या दूर करने के लिये किया था। न वो शंखनाद सही हो पाया और न ये। काश् आप और लोगों के विचारों को भी सामने आने देते। विपक्ष के विद्वान लोगों के विचारों को भी सुनते आप तो शायद आज कोरोना का डरावना संक्रमण देश में कहर न बरपाता।
अर्थव्यवस्था पटरी से न उतर गयी होती। करोड़ों लोग यूँ न परेशान होते। ऐसी स्थितियाँ जरूर हर किसी सरकार के लिये चुनौतियाँ होती हैं। यह चुनौतियाँ और भी जटिल हो जाती हैं जब सरकार के पास अपनी जनसंख्या का सही डाटा न हो। श्रमिकों का भी सही डाटा नहीं उपलब्ध है। मीडिया, बॉलीवुड जैसे चमक-धमक की दुनिया में भी शीर्ष लेबल के पत्रकारों व कलाकारों को छोड़ दीजिये तो अन्य पत्रकारों और कलाकारों को मनरेगा मजदूरों से भी कम सैलरी पड़ती है महीने में। ऐसे कई अन्य प्राईवेट कंपनियाँ हैं जहाँ लोग 8-10 हजार में जीवन यापन कर रहे हैं तथा खुद को आत्मनिर्भर बनाते हुए, देश की अर्थव्यवस्था में मदद कर रहे हैं। खुद को गरीबी की लिस्ट से बाहर निकालते हुए निम्न मध्य वर्ग में ही समझ रहे हैं। लेकिन वर्तमान केंद्रीय वित्त मंत्री जी ने ऐसे आंकड़े पेश किये जिससे निम्न मध्य वर्ग मदद के लिये हाथ न फैला सके।
वित्त मंत्री जी ने तो उन्हें एक ही आंकड़ा पेश कर लखपति बना दिया। जब तक सरकार गंभीर नहीं होगी अपनी जनसंख्या की सही जानकारी, जिनमें सही आय सबसे ज्यादा अहम् है उसका डाटा नहीं बनायेगी तब तक ऐसे विषम हालातों में गलतियाँ जरूर होंगी। फिर सरकार चाहे किसी भी दल की क्यूँ न हो? लेकिन हो सकता है इस दौर में मौजूदा सरकार से ज्यादा, या हो सकता है मौजूदा सरकार से कम गलतियाँ होतीं। ये तो सब कल्पना में है लेकिन जो हकीकत में मौजूद सरकार है वही इस वक्त देश की भाग्य निर्माता है, बिगाड़े या बनाये! ऐसी विषम परस्थितियों से निपटने के लिये जनसंख्या का सही डाटा होना भी सरकार के पास जरूरी है। एनपीआर क्यूँ आवश्यक है, आज विपक्ष को भी समझ आ रहा होगा।
विपक्ष ने जहाँ एनपीआर में राजनीति खेल कर एक पक्ष को उकसाया व भड़काया है, अब समझाने का वक्त है कि देश की सरकार के पास अपनी जनसंख्या का सही डाटा उपलब्ध होगा तो विषम परिस्थितियों में सब तक सही मदद पहुँच सकती है। एनपीआर का एक पहलू यह भी है। सरकार को भी उन लोगों को विश्वास में लेना होगा, उनको सही जानकारी देनी होगी जो समझते हैं कि एनपीआर एक धर्म के विरोध में है। सरकार भी सही नियत के साथ एनपीआर से संबंधित पूर्ण जानकारी दे कि एनपीआर देश की समस्त जनसंख्या के हित में है।
इस आपदा से निपटने के साथ सरकार को कई ऐसे कदम उठाने पड़ेंगे, जो वर्तमान के साथ भविष्य में भी जमीनी तौर पर जनहित से संबंधित हों। अपनी एक-एक जनसंख्या का सही डाटा सरकार को अपने पास रखना होगा। अब आगे की रणनीति सबके साथ मिलकर तय कीजिये जिससे और अधिक जन-धन का नुकसान न होने पाये। अब कोशिश ये हो कि हर जिले में महानगर जैसी संपूर्ण सुविधाएं देने की प्रक्रियायें अपनायी जायें। जिससे भविष्य में लोगों का महानगर की ओर रूझान कम हो सके और लोग अपने जिले में ही रह सकें। जिससे इस तरह के विषम हालातों में देश बहुत अधिक जन-धन की हानि से बच सके। – राहुल कुमार गुप्त







